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जसवंत नगरः  बाप-बेटे की लड़ाई में बढ़े बसपा के हौसले

यदुवंश के महाभारत से जनता असमंजस में, सबको फैसले का इंतजार

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Sanjeev Mishra

Jan 10, 2017

jaswant nagar voters

jaswant nagar voters

डॉ.संजीव

जसवंतनगर (इटावा).
यह सीट समाजवादी पार्टी के शीर्ष पुरुष मुलायम सिंह यादव की सीट है। उन्होंने भाई शिवपाल को विरासत सौंपी तो उन्होंने इसे सहेज कर रखा, पर अब चुनाव की रणभेरी बज जाने के बाद भी यदुवंश का महाभारत न थमने से जनता असमंजस में है। हर किसी को फैसले का इंतजार है, वहीं बहुजन समाज पार्टी (बसपा) इस स्थिति का लाभ उठाकर बाजी पलट देना चाहती है और बसपा नेताओं के हौसले बुलंद भी हैं।

आज बेटे और भाई के बीच द्वंद्व से जूझ रहे मुलायम ने 1967 में इटावा की जसवंत नगर सीट से ही पहला चुनाव लड़ा था। दरअसल उनका पैतृक गांव सैफई इसी विधानसभा क्षेत्र का हिस्सा भी है। 1967 के बाद सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव संयुक्त सोशलिस्ट पार्टी (संसोपा) से विधानसभा चुनाव जीते थे। उसके बाद इस सीट पर 1974, 1977, 1984, 1989 और 1993 में उन्होंने जीत दर्ज की। इसके बाद 1996 के विधानसभा चुनाव में उन्होंने यह सीट अपने छोटे भाई शिवपाल को सौंप दी। तब से वह लगातार जीत दर्ज करते आ रहे हैं। इस बार चुनाव से ठीक पहले जसवंत नगर असमंजस में है। यहां के लोग तय नहीं कर पा रहे हैं कि वे किसके साथ जाएं। इटावा से जसवंत नगर जाने वाली सड़क पर एक चाय की दुकान पर बैठे शराफत, रशीद व बन्ना खां इसी चर्चा में मशगूल दिखे। उनका कहना था कि आपस की लड़ाई समर्थकों के लिए मुसीबत बनी है। यदि बाप-बेटा एक हो जाएं, तो जिसे भी टिकट दे दें, स्थितियां उसके ही पक्ष में होंगी। कटरा बिल्लो शान गांव के शहाबुद्दीन कहते हैं कि काम शिवपाल ने बहुत किया है किन्तु युवा अखिलेश के साथ हैं। उन्होंने उम्मीद जताई की चुनाव से पहले सब एक हो जाएंगे।


...उनके घर की बात है
सैफई सेॆ कुछ दूरी पर स्थित है गांव राय हार। यहां रहने वाले उमेश हों या प्रवीन कुमार और सुखवीर सिंह, सभी को इस लड़ाई के कारण हो रहे बंटवारे के फैसले का इंतजार है। उनका कहना है कि इस कारण वोट बंटेगा और लगातार जीत के लिए संघर्ष कर रही बसपा को फायदा होगा। वैसे भी शिवपाल के अलावा कोई यहां नहीं आता और मुलायम समर्थक उनके बेटे अखिलेश के साथ खड़े होंगे। वहां मौजूद लोगों ने बताया कि बसपा प्रत्याशी दुर्गेश शाक्य तेजी से सक्रिय हुए हैं। उन्हें लगता है कि इस बार वे हर हाल में चुनाव जीत ही लेंगे।


विकास का विस्तार जरूरी
सैफई जाने वाले मुख्य मार्ग के मोड़ पर मिले रामसुंदर कहते हैं कि इस बार चीजें बदल सकती हैं। वे साफ कहते हैं कि हर बार मुलायम सिंह के कहने पर परिवार के लिए वोट पड़ते थे। इस बार परिवार ही एक नहीं तो वोट कैसा। वैसे बातचीत में उनका दर्द भी मुखर होता है। वे बताते हैं, पड़ोसी गांव में डॉ.अम्बेडकर प्रतिमा पर छत पड़नी थी किन्तु अब तक नहीं पड़ी। इस तरह विकास महज सैफई तक सीमित रह गया है, यह स्थिति ठीक नहीं है। इस बार लड़ाई में अन्य लोग इसका फायदा जरूर उठाएंगे।


अखिलेश का प्रत्याशी नहीं!
सैफई के भीतर भी इस चुनाव की चर्चाएं कम नहीं हैं। नगला चतरी निवासी सतीश हों या सैफई निवासी सोनू, दोनों का मानना था कि यदि अखिलेश व शिवपाल अलग-अलग चुनाव लड़े, तो भी वहां अखिलेश अपना प्रत्याशी नहीं उतारेंगे। चाचा के लिए रास्ता खुलेगा। हां, इतना जरूर है कि शिवपाल इस बार बेटे आदित्य को प्रत्याशी बनाना चाहते थे, बदली परिस्थितियोॆं में उनके इस सपने पर गाज गिर सकती है।