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गुमनामी में गुम हुए अवध के आखिरी नवाब

राजकुमार की दिल्ली में हुई मौत

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लखनऊ

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Hariom Dwivedi

Nov 07, 2017

awadh prince ali raza died

महेंद्र प्रताप सिंह
लखनऊ. जी हां, आपको आश्चर्य होगा, लेकिन यह सच है। अवध के शासक और लखनऊ की शान नवाब वाजिद अली शाह के वंश की आखिरी निशानी अवध के राजकुमार रियाज (अली राजा) अब नहीं रहे। उनकी गुमनामी में मौत हो गयी। वे राजकुमारी सकीना के साथ सन् 1984 से दिल्ली में रह रहे थे। तीन सितंबर को दिल्ली के चाणक्यपुरी स्थित रिर्साटनुमा एक हवेली में उनकी मौत हो गयी। शहर से दूर जंगल में बने इस रिसार्ट में वे इस समय अकेले रहते थे। पुलिस को तहकीकात में इस बात का पता चला कि जिस व्यक्ति की मौत हुई वह अवध के आखिरी राजकुमार अली रजा थे।

रिश्तेदारों को भी नहीं दी जा सकी सूचना
चाणक्यपुरी के लोग अवध के राजकुमार की इस हालात में मौत से विस्मय में थे। लोग हैरान थे कि आखिर वह किस तरह वहां रहते थे। पुलिस के मुताबिक राजकुमार अली रजा के शरीर पर किसी प्रकार की चोट के निशान नहीं थे। यानी उनकी स्वाभाविक और प्राकृतिक मौत हुई। दिल्ली पुलिस राजकुमार के निधन की सूचना उनके रिश्तेदारों को देना चाहती थी, पर हवेली से जो फोन नंबर मिले हैं उनसे पुलिस संपर्क नहीं कर पा रही है। क्योंकि, सभी नंबर स्विच आफ हैं। पांच सितंबर को वक्फ बोर्ड को सूचित करने के बाद राजकुमार वहीं परंपरागत तरीके से दफना दिया गया। राजकुमारी सकीना कहां हैं और किस हालात में हैं यह किसी को नहीं पता।

मालचा महल जर्जर
दिल्ली के सरदार पटेल मार्ग स्थित रिज में पहाड़ी पर स्थित है राजकुमार अली रजा का मालचा महल। महल के प्रवेश द्वार पर लगे पत्थर पर लिखा है, 'रूलरस ऑफ अवध: 'प्रिंसेस विलायत महल। यह 700 साल पुराना है। मालचा महल अब खंडहर बन चुका है। इस विशालकाय महल के चौड़े ईंट और बड़े पत्थर इस बात के सुबूत हैं कि इसे बहुत ही शानदार और मजबूत तरीके से बनाया गया था। अब इस महल में न दरवाजे हैं और न ही बिजली और पानी की व्यवस्था। यह खंडहर में तब्दील हो गया है। मलचा महल सन् 1885 को रॉयल्स ऑफ अवध को आवंटित कर दिया गया था। अब वहां न कोई दरवाजे हैं और न खिड़कियां। जगह-जगह पेड़ उग अए हैं। इस महल के लिए प्रिंस रियाज अवध की मां ने सरकार से सालों मुकदमा लड़ा था। बाद में सरकार ने उन्हें और महल के रखरखाव के लिए 500 रुपए महीना देना स्वीकार किया था।

महल में न बिजली न पानी
इस टूटे-फूटे महल में अवध राजघराने के राजकुमार अली राजा रियाज और राजकुमारी सकीना रहते थे। कभी इस महल में विदेशी कुत्तों की रौनक देखी जा सकती थी। लेकिन, आज इस महल में न तो बिजली है, न पानी और न ही कोई पलंग। पूरे महल में एक फोन और एक साइकिल ही मिली है।। पूरे महल में कांटेदार झाडिय़ों उग आई हैं। कमरों को देखकर यह लगता है महल बारिश में टपकता है। पिछले 25 सालों से इन्हीं हालतों में यहां राजकुमार रह रहे थे। रियासत छिनने के बाद इनकी मां बेगम विलायत महल इन दोनों को लेकर इस महल में पहुंची थीं। जंगली झाडिय़ों से महल की बाउंड्री बनी है। महल में कैक्टस और कांटेदार पेड़ उगे हैं।

ज्वेलरी बेचकर चल रहा था घर खर्च
पता चला है कि राजकुमार अली रजा के पास कुछ जूलरी बची हुई थी, जिसे बेचकर उनके कुत्तों के लिए हड्डियां और घर के लिए खाना आता था। हफ्ते में एक बार बाजार से खाने का सामान आता था। खाना देसी घी में बनता था। महल में कोई पलंग नहीं है। इससे पता चलता है सभी लोग कालीन पर ही सोते थे। लखनऊ स्थित एक परिवार के लोग राजकुमार के पुस्तैनी नौकर थे। जिसे जरूरत पडऩे पर राजकुमार लखनऊ से बुलाते थे।

बचपन में ही हो गई थी शादी
राजकुमारी सकीना और साथ ही राजकुमार अली रजा की बचपन में ही शादी हो गई थी। राजकुमारी सकीना महल ने ब्रिटिश टीचर्स से अंग्रेजी और दूसरी भाषाओं की तालीम ली थी। राजकुमार ब्रिटेन या विदेशों में होने वाले शादी-समारोह में शरीक होने जाते थे। उनके घराने के ज्यादातर रिश्तेदार ब्रिटेन में रहते हैं। पता चला कि राजकुमार के महल में पहले पर्शियन कारपेट बिछा था, चांदी की टेबल थी, खाने के बर्तन भी चांदी के थे और कीमती जूलरी भी थी। राजकुमार के पास एक तोप भी थी।

प्रिंसेस विलायत महल: अनसीन प्रेजंस
बताया जाता है कि राजकुमारी सकीना महल ने अपनी मां बेगम विलायत महल पर एक किताब लिखी थी, जिसका नाम है प्रिंसेस विलायत महल: अनसीन प्रेजंस। यह बुक नीदरलैंड, फ्रांस और ब्रिटेन की लाइब्रेरी में मौजूद है। बेगम विलायत महल की दादी बेगम ताजआरा का भी इसमें जिक्र है।

लखनऊ छोडकऱ दिल्ली स्टेशन पर बिताए नौ साल
सब जानते हैं कि वाजिद अली शाह को अंग्रेजों ने 1856 में कलकत्ता में नजऱबंद कर दिया था। उनके नाबालिग बेटे बिरजिस कदर(1845-14 अगस्त,1893) को भी अंग्रेजों ने गद्दी नहीं सौंपी थी। बेगम हजरत महल अपने बेटे बिरजिस कदर को लेकरनेपाल चली गयीं थीं। वे कभी हिंदुस्तान नहीं लौट सकी। मां-बेटे की मौत नेपाल में ही हो गई। वाजिद अली शाह के अन्य बेगम व उनके बच्चे बच गए। जिसमें से एक बेटे की शादी बेगम विलायत महल से हुई थी। रियाज व सकीना इसी विलायत महल के बच्चे हैं। विलायत महल, रियाज और सकीना अपना गुजारा चलाने के लिए विलायत महल के पति सरकारी मुलाजिम बन गए। पति की मौत के बाद विलायत महल ने अंग्रेजों से लखनऊ की रियासत में हिस्सेदारी मांगी, लेकिन अंग्रेजों ने उन्हें मना कर दिया। आजादी के बाद बेगम विलायत महल को 500 रुपए प्रति माह की सरकार पेंशन देती थी। जब पेंशन बंद हो गयी तब विलायत महल ने सन् 1975 में अपने दोनों बच्चे रियाज व सकीना सहित 12 कुत्तों और और पांच नौकरों को लेकर लखनऊ से दिल्ली चली आयीं। यहां के नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के एक प्लेटफॉर्म पर पर वह बहुत दिनों तक रहीं। यहां वह करीब नौ वर्ष तक रहीं, जिसमें से लगातार तीन वर्ष धरना देकर अपने अपने अधिकार की मांग करती रहीं। उनका कहना था कि वह नवाब वाजिद अली शाह की परपोती हैं। इसलिए उन्हें रियासत का हिस्सा मिलना ही चाहिए।

इंदिरा गांधी की पहल पर मिला मालचा महल
1984 में इंदिरा गांधी विलायत महल व उनके बच्चों के हालात का जायजा लेने नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पहुंची। इंदिरा गांधी की पहल पर सरदार पटेल मार्ग स्थित सेंट्रल रिज एरिया में मालचा महल को बिलायत महल के लिए एलाट किया गया। 1983 में विलायत महल में हीरा तोड़कर खा लिया और उसके जहर से उनकी मौत हो गई। इसके बाद उनके बच्चे महल में रह रहे हैं। यह एक अनजान स्मारक है, जहां के बारे में आज भी दिल्ली के अधिकांश वासी नहीं जानते हैं। मुताबिक इंदिरा गांधी की मौत के बाद वर्ष 1985 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने विलायत महल को मालचा महल में रहने के लिए स्वीकृति पत्र प्रदान किया था, जिसमें उन्हें नवाब वाजिद अली शाह का वंशज बताया गया था।

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