
आज ही की तारीख यानी 6 दिसंबर को 1992 में अयोध्या में बाबरी मस्जिद को गिरा दिया गया था। ये एक ऐसी घटना थी कि इसने ना सिर्फ यूपी बल्कि देश या कहिए कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप को प्रभावित किया। पाकिस्तान और बांग्लादेश में इस घटना की काफी प्रतिक्रिया हुई थी। दोनों देशों में अल्पसंख्यक इस घटना के बाद निशाना बने थे।
छह दिसंबर 1992 की घटना के लिए उस समय की उत्तर प्रदेश की कल्याण सिंह की सरकार, विश्व हिंदू परिषद और भारतीय जनता पार्टी के अयोध्या में जुटे नेताओं और केंद्र की कांग्रेस सरकार पर सवाल उठते रहे हैं। इनके सबके साथ एक बड़ा वर्ग है, जो राजीव गांधी का इस पूरी घटना में बड़ा रोल मानता है। ऐसा मानने वालों में ना सिर्फ विपक्ष के नेता बल्कि उस समय के अधिकारी भी शामिल हैं। इसकी वजह देखें तो पाते हैं कि अयोध्या के इस विवाद में जो बड़े बदलाव या पड़ाव हैं, उनमें एक राजीव गांधी के समय ही हुआ था।
बाबरी विवाद के 3 बड़े पड़ाव
साल 1990-92 तक लाल कृष्णा आडवाणी की रथयात्रा और इसके बाद हजारों लोगों का अयोध्या में जुटना विवाद की शायद आखिरी कड़ी थी। इस साल तो ढांचा गिरा दिया गया था। इससे पहले भी दो अहम पड़ाव इसमें माने जा सकते हैं।
पहला साल 1949 में मूर्ति रखना
बाबरी विवाद के बड़ा होने की पहली कड़ी थी साल 1949। मस्जिद में नमाज बंद होने के बाद इसी साल 22 दिसंबर की रात कुछ लोगों ने मस्जिद परिसर में मूर्ति रखी थी। मूर्ति रखे जाने के बाद इनको हटाया नहीं गया लेकिन परिसर को बंद कर दिया गया।
दूसरा साल 1986 में परिसर का ताला खुलना
37 साल तक मस्जिद परिसर में ताला था लेकिन 1986 में अचानक ये बड़ा हो गया। अयोध्या में राम मंदिर को लेकर आंदोलन तो चलते रहे थे लेकिन ये बहुत बड़े बने 80 के दशक में।
1984 में विहिप और कुछ दूसरे संगठनों ने राम मंदिर को आक्रामकता दे दी थी। इस बीच इंदिरा गांधी की हत्या हुआ और इसके बाद हुए आम चुनाव में राजीव गांधी प्रधानमंत्री बने।
आज अर्जी कल सुनवाई और ताला खोलने का दे दिया आदेश
1 फरवरी 1986 को फैजाबाद जिला न्यायाधीश केएम पांडेय ने सिर्फ 24 घंटे पहले दाखिल एक अर्जी पर सुनवाई करते हुए 37 साल से बंद पड़ी बाबरी मस्जिद का गेट खोलने का आदेश दे दिया। ये अर्जी भी उमेश चंद्र पांडेय नाम के ऐसे शख्स ने लगाई थी, जिसका बाबरी विवाद के मुकदमों से कोई संबंध नहीं था।
1986 में केंद्र और उत्तर प्रदेश, दोनों जगह कांग्रेस की सरकार थी। ताला खुलने के बाद विपक्ष ने कहा था कि ये सब राजीव गांधी के इशारों पर हुआ है क्योंकि वो 'हिन्दुओं को खुश' करना चाहते हैं। इस बात को आज भी लोग कहते हैं और बाबरी गिरने के पीछे बड़ा 'विलेन' राजीव गांधी को मानते हैं।
राजीव गांधी के कहने पर ये हुआ या वो पर्सनली इसे देख रहे थे। ऐसा कोई सबूत कभी नहीं मिला लेकिन इस घटना में कई ऐसी बाते थीं। जिनसे ये माना गया कि बिना राजीव गांधी मतलब पीएमओ के दखल के ये सब नहीं हो सकता था।
सबसे पहला हड़बड़ी में लिया गया फैसला
31 जनवरी को अर्जी दाखिल की गई। अगले दिन 1 फरवरी को 4 बजकर 20 मिनट पर फैसला आया। एक घंटा भी नहीं लगा और 5 बजे ताला तोड़ दिया गया। अभी फैसले की कॉपी भी टाइप होकर नहीं आई थी कि ताला टूट गया। ऐसे में ये सवाल उठा कि सबकुछ पहले से तय था। इसके साथ-साथ कांग्रेस सरकार की ओर से इस फैसले के खिलाफ कोई अपील भी नहीं की गई।
दूरदर्शन की टीम को किसने बताया?
जब ताला टूटा तो दूरदर्शन की एक टीम वहां मौजूद थी। ये सब रिकॉर्ड हुआ और शाम को देशभऱ में समाचार चल गया। इसने लोगों के बीच ये धारणा मजबूत कर दी कि ये सब दिल्ली से प्रायोजित था। केंद्र को इस बात की जानकारी थी कि आज ताला खुलने वाला है।
उस वक्त की घटनाओं को देखने वाले पत्रकार और अफसर क्या कहते हैं
80 के दशक में बीबीसी के लिए उत्तर प्रदेश में रिपोर्टिंग कर रहे रामदत्त त्रिपाठी ने कई लेख इसपर लिखे हैं। उनका मानना था, "बाबरी मस्जिद मामले में राजीव गांधी सरकार पर कई-तरफ़ से दबाव थे। शाहबानों मामले में उन पर मुस्लिम तुष्टिकरण का भी आरोप लग रहा था। दशकों से हाईकोर्ट में लंबित इतने बड़े मामले में फैजाबाद प्रशासन या जिला जज अपने स्तर पर इतना बड़ा निर्णय नहीं ले सकता था, जबतक कि ऊपर से कोई इशारा ना हो।
आंदोलन को करीब से देखने और कवर करने वाली नीरजा चौधरी ने भी मई 1986 में लिखे एक लेख में ताला खुलने की घटना को सीधे-सीधे सरकार की सांप्रदायिक तो बढ़ावा देने वाली कार्रवाई बताया था। उन्होंने लेख में इस घटना के पीछे सरकार को माना था।
अपनी किताब 'माय इयर्स विद राजीव ऐंड सोनिया' में पूर्व गृह सचिव आरडी प्रधान लिखते हैं, "उस दौर तक राजीव गांधी दूसरे नेताओं के मुकाबले कहीं तेजी से आगे बढ़े थे लेकिन इस फैसले के बाद वह राजनीतिक जटिलताओं में फंसते चले गए। शायद यह साबित करना चाहते थे कि उन्हें जितना मुस्लिमों की भावनाओं का ख्याल है, उतना ही हिंदुओं का भी।"
कैसे इस घटना ने आग में डाला घी?
1949 से 1986 तक जो बाबरी मस्जिद विवाद एक कोने में था। इस घटना के बाद देश का मुद्दा बन गया। एक ओर हिन्दू संगठन इस पर आक्रामक हो गए तो दूसरी ओर बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी का गठन भी हुआ। मुस्लिम भी इसको लेकर आक्रामक हुए। इसके बाद देश, खासतौर से उत्तर भारत की राजनीति बाबरी के इर्दगिर्द सिमटने लगी। तेज होते आंदोलनों का नतीजा हुआ कि 1992 में बाबरी मस्जिद की विवादित इमारत गिरा दी गई।
इस अफसर ने राजीव गांधी पर आरोपों को माना गलत
बाबरी का ताला खुलने में राजीव गांधी को दोष देने वाले कई हैं लेकिन एक अफसर उन पर ये आरोप एकदम गलत मानते हैं। राजीव गांधी के प्रधानमंत्री कार्यालयमें तत्कालीन संयुक्त सचिव और दून स्कूल में उनके जूनियर रहे वजाहत हबीबुल्लाह अपनी किताब 'माई ईयर्स विद राजीव गांधी ट्रायम्फ एंड ट्रैजेडी'में कहते हैं कि राजीव गांधी को इस सबका एकदम कोई जानकारी नहीं थी। उनको इसका दोष देना गलत है।
Published on:
06 Dec 2022 11:11 am
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