
जनसभा में प्रधानमंत्री मोदी और गृह मंत्री अमित शाह (प्रतिकात्मक)
UP में लोकसभा के पिछले दो चुनावों में जीती BJP ने इस बार सूबे की सभी 80 सीटों को जीतने का प्लान बनाया हैं। BJP जानती है कि अगर राज्य में सभी सीटों को जीतना है तो OBC नेताओं को आगे करना ही पड़ेगा। तभी वह विपक्ष को काउन्टर कर पाएगी। इस बात को ख्याल में रखकर पार्टी ने अपने पिछड़े नेताओं को सरकार के साथ ही संगठन में महत्वपूर्ण पद देना शुरू कर दिया हैं।
UP पर बाज की नजर गड़ाए बैठी है BJP
भाजपा ने 2014 में यूपी की 80 में से 73 सीटें जीती थीं। फिर 2019 में 80 में से 64 जीतीं। वो भी तब जब अखिलेश और माया एक साथ थे। यानी सपा-बसपा का गठबंधन था। इस बार BJP पहले से ही फॉर्मूला बनाए बैठी है। जरूरी बात ये है कि ये सिर्फ CM योगी लेवल पर नहीं हो रहा है। बल्कि हाईकमान इस वक्त यूपी पर बाज जैसी नजर गड़ाए हुए है। कुछ लोग तो ये भी कह रहे हैं कि बाज ने मछली भी पकड़ ली है। बस सही समय का इंतजार हैं।
क्या है ये बीजेपी की बाज और मछली की कहानी
अभी यूपी की दूसरी पार्टियां सोच भी नहीं रही थी, तभी 22 जनवरी 2023 को बीजेपी ने एक प्रदेश कार्यकारिणी की बैठक की। जानते हैं किसलिए? सिर्फ और सिर्फ 2024 के लिए। प्रदेश अध्यक्ष भूपेंद्र चौधरी ने तो यह भी दावा किया था कि 2024 में दूसरी पार्टियों का खाता तक नहीं खुलेगा।
किस बात के दम पर इतना बड़ा दावा कर गए बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष?
2019 के लोकसभा चुनाव में पूरे प्रदेश में प्रधानमंत्री मोदी के नाम का जादू चल रहा था। इसके बावजूद BJP 2014 में जीती हुई कई सीटों पर चुनाव हार गई। लेकिन इस बार के चुनाव में पार्टी ने अपना सबसे ज्यादा फोकस इन हारी हुई सीटों को जीतने पर लगाया है। एक तरफ अभी जहां विपक्षी पार्टियों ने चुनाव प्रचार के बारे में सोचना भी शुरू नहीं किया। उस वक्त BJP पूर्वांचल में प्रचार करने में लगी हुई है।
भाजपा ने अपने बड़े नेताओं को प्रचार के लिए अभी से जिम्मेदारी सौंप दी है। इसका उदाहरण जनवरी में देखने को मिला। उस वक्त पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष JP नड्डा ने गाजीपुर में जनसभा को संबोधित करने के साथ ही अगले चुनाव में BJP के जीतने का दावा भी किया था।
पता है ये फॉर्मूला क्यों बना है? असल में बहुत बड़ा खेल है इसके पीछे…
आने वाले चुनाव में बीजेपी के एलाएंस में नीतीश बाबू नहीं होंगे। मतलब समझते हैं? इसका सीधा मतलब हैं कि NDA की 16 सीटें गईं। बात समझे। असल में अगले चुनाव में नीतीश एनडीए से अलग चुनाव लड़ेंगे। पिछली बार उन्होंने 16 सीटें जीती थीं। बीजेपी को ऐसा लगता है कि इस बार भी नीतीश नुकसान पहुंचाएंगे। इसी लिए पार्टी यूपी में सीटें बढ़ा कर बिहार में होने वाले अपने नुकसान की भरपाई करने के चक्कर में है।
फॉमूले के मूल-फैक्टर हैं एक खास वर्ग से आने वाले नेता, क्यों?
यह तो सबको पता है कि भाजपा के विरोधी उसे सवर्णों की पार्टी कहते हैं। लेकिन पार्टी इस बार के लोकसभा के चुनाव में अपने एक खास वर्ग के नेताओं को ज्यादा महत्व दे रही हैं। दरअसल मोदी और शाह भी यह बात अच्छे से जान गए है कि बिना OBC नेताओं को आगे बढ़ाए वह जीत नहीं सकते हैं। इसलिए वह उनकी नाराजगी मोल नहीं ले सकते हैं।
इसका उदाहरण लोगों को विधानसभा 2022 के चुनावों में भी देखने को मिला। योगी कैबिनेट में नंबर दो की हैसियत रखने वाले केशव प्रसाद मौर्य सिराथू से अपना चुनाव हार गए। इसके बावजूद पार्टी ने ना सिर्फ उन्हें योगी कैबिनेट में फिर से डिप्टी सीएम बनाया। बल्कि उन्हें विधानपरिषद में नेता सदन भी बनाया। इसके साथ ही योगी कैबिनेट में करीब 20 मंत्री पिछड़े समाज से ही आते हैं।
जाट नेता को बनाया पार्टी का प्रदेश अध्यक्ष
पार्टी ने 2022 के विधानसभा चुनाव में जीत मिलने के बाद तब के प्रदेश अध्यक्ष स्वतंत्र देव सिंह को मंत्री बना दिया। इसके बाद पार्टी ने मुजफ्फरनगर से आने वाले पिछड़े समाज के बड़े जाट नेता भूपेंद्र चौधरी को पार्टी की कमान सौंपी। इसके पीछे मकसद यह था कि जाट लैंड में पिछले चुनाव के मुकाबले कमजोर हुई पार्टी को फिर से मजबूत किया जाए। साथ ही राज्य के OBC वोटरों को यह मैसेज दिया जा सके कि प्रदेश में अब उनके प्रजेंस को नकारा नहीं जा सकता हैं।
Published on:
15 Mar 2023 08:48 pm
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