मायावती के लिए यह दौर राजनीतिक धर्मसंकट का दौर बन गया है। एक तरफ विपक्षी जुटान से दूरी और दूसरी तरफ कांग्रेस से गठबंधन में मुश्किल यह आ रहा है कि खुद कांग्र्रेस महागठबंधन में शामिल हो रही है।
UP POLITICS: विपक्षी एकजुटता के लिए जो प्रयास किया जा रहा है, उसे लेकर कांग्रेस गंभीर नजर आ रही है। इसके नफा नुकसान का फायदा तो लोकसभा चुनाव के बाद पता चलेगा लेकिन उत्तर प्रदेश में कांगे्रस के लिए यह गठबंधन नुकसानदेह साबित हो सकता है।
सीमित सीटों पर चुनाव लडऩे का दुष्परिणाम देख चुकी कांग्रेस के लिए अपनी जमीन छोडऩा नुकसान का सौदा हो सकता है। आजमगढ़ और मैनपुरी जैसे स्थानों पर कांग्रेस के चुनाव नहीं लडऩे से पार्टी मृतप्राय हो चुकी है। यूपी में कांग्रेस तीन दशक से सत्ता से बाहर है, वर्तमान में 80 लोक सभा सीटों में सिर्फ एक रायबरेली सोनिया गांधी के पास है तो 403 विधान सभा में कांग्रेस के दो विधायक हैं।
समाजवादी पार्टी से गठबंधन रहा नुकसान देह
कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी से गठबंधन किया जिसका खामियाजा उसे भुगतना पड़ा। दोनों दलों ने चुनाव बाद एक रदूसरे पर आरोप प्रत्यारोप किया। इस दौरान चुनावी रणनीतिकार पीके को आजमाया गया लेकिन कोई फायदा नहीं हुआ। विधान सभा में कांग्रेस महज 114 सीटों पर चुनाव लड़ी लेकिन परिणाम बेहद खराब रहा। आजमगढ़ में कांग्रेस 25 सालों से कोई चुनाव नहीं लड़ी है, वहीं हाल मैनपुरी का है जहां सपा से समझौते के कारण सीट छोडऩा पड़ा। इटावा में फ्रेंडली फाईट के नाम पर भी कांग्रेस को कोई फायदा नहीं हुआ।
मायावती का धर्मसंकट
मायावती पिछले कई दिनों से अपने वक्तव्यों और प्रेस से बातचीत में कांग्रेस के प्रति नरत रुख अपनाए हुए हैं। राजनीति पंडितों का मानना है कि बसपा का कांग्रेस से गठबंधन हो सकता है। मायावती के सामने भी कोई ठोस विकल्प इसके अलावा नहीं दिखाई दे रहा है। जबकि धर्मसंकट यह कि कांग्रेस और सपा दोनों महागठबंधन और विपक्षी एकजुटता के लिए प्रयास कर रहे हैं।
यदि मायावती इस एकजुटता में शामिल होती है तो उनके सामाजिक समीकरणों के बिखरने का डर है। दूसरी तरफ सपा के गठबंधन में रहते मायावती का इसमें शामिल होना भी मुश्किल दिखाई देता है। ऐसे में बसपा का गठबंधन कांग्रेस के साथ अधर में दिखाई देने लगा है।