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कांग्रेसी बेचैन, सत्ताइस साल यूपी बेहाल का क्या होगा

उत्तर प्रदेश में सपा के साथ गठबंधन में गुम हो जाएगा कांग्रेस की वापसी का नारा

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Sanjeev Mishra

Jan 18, 2017

27 saal up behaal

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डॉ.संजीव


लखनऊ.
छह माह भी नहीं हुए हैं, जब कांग्रेस प्रदेश में वापसी के लिए सड़क पर संघर्ष कर रही थी। एक नारा तेजी से उछला था, सत्ताइस साल यूपी बेहाल। अब जब सपा के साथ कांग्रेस का गठबंधन होने जा रहा है, कांग्रेसी बेचैन हैं कि उनके सत्ताइस साल यूपी बेहाल नारे का क्या होगा। उन्हें लगता है कि गठबंधन में कांग्रेस की वापसी का यह नारा गुम हो जाएगा क्योंकि इन सत्ताइस में से बारह साल सूबे में समाजवादी पार्टी की ही सरकार रही है। अब अपने ही गठबंधन सहयोगी की सरकार को कांग्रेसी कैसे कोसेंगे, यह सवाल खड़ा हो रहा है।


उत्तर प्रदेश में आखिरी कांग्रेसी मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी रहे हैं। पांच दिसम्बर 1989 को उन्होंने कार्यभार छोड़ा था, तो मुलायम सिंह यादव ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी। कांग्रेसी तब से ही अब तक के सत्ताइस साल की सरकारों को कोसते हुए अभियान चला रहे थे। इस अभियान का आगाज भी कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने जोर-शोर से राजधानी लखनऊ के रमाबाई अम्बेडकर मैदान में किया था। राहुल स्वयं इस दौरान रही सपा की सरकारों को लगातार कोस रहे थे। कांग्रेसी भी गांव-गांव तक जाकर किसानों, युवाओं, मजदूरों आदि से फीडबैक फार्म्स भरवा रहे थे। अब जबकि समाजवादी पार्टी के साथ कांग्रेस का गठबंधन होने जा रहा है, कांग्रेसियों के बीच ही सत्ताइस साल यूपी बेहाल नारे को लेकर सवाल उठने लगे हैं। दरअसल इस सत्ताइस साल में बारह साल से अधिक तो समाजवादी पार्टी ही सत्ता में रही है। इनमें मुलायम सिंह यादव ने तीन बार में सात साल और अखिलेश यादव ने पांच साल की मौजूदा सरकार का नेतृत्व किया है। इन स्थितियो में सत्ताइस साल की बेहाली का दावा करते नारे के साथ चुनाव मैदान में जाना कांग्रेसियों के लिए मुश्किल होगा। अभियान के दौरान सपा नेताओं के साथ मंच साझा करने की स्थिति में कांग्रेसी नेताओं को भी सपा सरकार की तारीफ करनी पड़ेगी और फिर बेहाली का नारा बेअसर हो जाएगा।


क्या होगा दीवालों का

कांग्रेस ने पूरे प्रदेश में दीवालों पर सत्ताइस साल यूपी बेहाल नारा लिखवा रखा था। अब यह सवाल उठ रहे हैं कि उन दीवालों का क्या होगा, जहां यह नारा लिखा है। क्या कांग्रेस उन्हें साफ कराएगी, या फिर कहीं विरोध, कहीं समर्थन के साथ चुनाव अभियान चलेगा। एक कांग्रेस विधायक का इस संबंध में कहना था कि गठबंधन होने के बाद अब सपा की आलोचना तो कठिन होगी ही, यह नारा भी प्रभावी नहीं रहेगा। उन्होंने उम्मीद जताई, जिस तरह प्रशांत किशोर (पीके) ने यह नारा दिया था, उसी तरह कोई नया नारा भी आएगा। हां, तमाम कांग्रेसी उत्साहित जरूर हैं। उन्हें लगता है कि गठबंधन के बाद सरकार बनी तो सूबे की सत्ता से दूरी का सूखा टूटेगा।


बारह साल सपा सरकार

पांच दिसंबर 1989 को मुख्यमंत्री बने मुलायम सिंह यादव एक वर्ष 201 दिन सूबे के मुख्यमंत्री बने। इसके बाद वे चार दिसंबर 1993 को दोबारा मुख्यमंत्री बने और इस बार एक साल 181 दिन मुख्यमंत्री रहे। तीसरी बार मुलायम ने 29 अगस्त 2003 को मुख्यमंत्री पद संभाला और तीन साल 257 दिन इस कुर्सी पर रहे। इसके बाद मौजूदा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव के नेतृत्व में 15 मार्च 2012 को उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी की सरकार बनी और तब से अब तक यह सरकार कायम है।



​​​​​पहले भी आए ऐसे मौके

उत्तर प्रदेश में गठबंधन की मजबूरियों के मौके पहले भी आ चुके हैं। 1967 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को 199 सीटें मिली थीं और पार्टी बहुमत से 14 सीटें पीछे रह गयी थी। उस समय चौधरी चरण सिंह ने कांग्रेस से बगावत की और अन्य दलों की मदद से प्रदेश की पहली गैरकांग्रेस सरकार बनाई। यह सरकार एक साल भी न चल सकी और पहले राष्ट्रपति शासन लगाया गया, फिर 1969 में विधानसभा भंग कर नए चुनाव कराए गए। 1969 के चुनाव में वे सभी महारथी आमने-सामने थे, जो 1967 का चुनाव मिलकर लड़े थे। इसी तरह 1969 का चुनाव आमने सामने होकर लड़े चंद्रभानु गुप्त और चरण सिंह 1970 आते-आते एक हो गए और चरण सिंह को समर्थन देकर चंद्रभानु ने मुख्यमंत्री बनवा दिया। अभी तक अलग-अलग लड़ रहे जनसंघ सहित सभी कांग्रेस विरोधी 1977 में जनता पार्टी के बैनर तले एक होकर चुनाव ल़ड़े और उन्हें चुनाव अभियान में पुरानी अदावतें भूलनी पड़ीं। 1980 में कांग्रेस फिर पूरी ताकत से सत्ता में आई और 1989 में दोबारा गठबंधन का दौर शुरू हुआ। भाजपा के समर्थन से 1989 में मुलायम सिंह यादव प्रदेश के मुख्यमंत्री बने, हालांकि यह साथ दो साल ही चल सका और 1991 के चुनाव में दोनों आमने सामने थे। यह भी संयोग है कि तब मुलायम का विरोध करने वाले अजित सिंह आज उनके बेटे अखिलेश के साथ गठबंधन की पींगें बढ़ाते नजर आ रहे हैं। 1993 का विधानसभा चुनाव आज के कट्टर दुश्मन राजनीतिक दलों समाजवादी पार्टी व बहुजन समाज पार्टी ने मिल कर ल़ड़ा था। यह अलग बात है कि यह गठबंधन लंबा नहीं चला और 1995 में भारतीय जनता पार्टी के समर्थन से बहुजन समाज पार्टी की सरकार बनी और मायावती मुख्यमंत्री बनीं। 1996 के विधानसभा चुनाव में बसपा व कांग्रेस का गठबंधन हुआ किन्तु सरकार बनाने लायक बहुमत नहीं जुटा सके। 1997 में एक बार फिर भाजपा-बसपा में समझौता हुआ और छह-छह माह मुख्यमंत्री बनने की शर्त पर मायावती मुख्यमंत्री बनीं। 2002 का विधासभा चुनाव आने तक ये दोनों दल फिर आमने सामने आ चुके थे, किन्तु किसी को स्पष्ट बहुमत न मिलने पर भाजपा की मदद से मायावती की सरकार बनी। हालांकि यह सरकार ज्यादा दिन नहीं चली और 2003 में मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बन गए। अब एक बार फिर एक दूसरे को कोसने वाले गठबंधन की राह पर हैं, ऐसे में यह देखा जाएगा कि यह राह कितनी सुकून भरी होगी।