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पुरुष नसबंदी दिवस विशेष : जब संजय गांधी ने लोगों को पकड़-पकड़ कर कराई थी नसबंदी

बताते चलें कि 5 जून 1975 को देश में जब इंद्रा गांधी ने इमरजेंसी की घोषणा कर दी। तब देश नहीं बल्कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी मुश्किल में थीं।

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Rohit Singh

Jun 21, 2016

sanjay gandhi

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लखनऊ। आज 21 जून को पुरुष नसबंदी दिवस मनाया जा रहा है। इस
अवसर पर हम आपको देश में इमरजेंसी के दौरान की ऐसी घटना के बारे में बताने
जा रहे हैं जिसे सुनकर आप हैरान रह जाएंगे।

sanjay gandhi

बताते चलें कि 5 जून
1975 को देश में जब इंद्रा गांधी ने इमरजेंसी की घोषणा कर दी। तब देश नहीं
बल्कि तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी मुश्किल में थीं। उस वक्त
जनसंख्या नियंत्रण के लिए लोगों को पकड़-पकड़ कर नसबंदी करवाई जा रही थी।
खासकर सरकारी नौकरी वालों के लिए नसबंदी कराना बेहद आवश्यक था, नहीं तो
उनकी नौकरी खतरे पड़ सकती थी। हालांकि जनसंख्या रोकने के लिए नसबंदी किए
जाने के फैसले के पीछे इंदिरा
नहीं, उनके बेटे संजय गांधी जिम्मेदार थे।

sanjay gandhi

'द
कांग्रेस एंड द मेकिंग ऑफ द इंडियन नेशन' नाम की किताब में भी कहा गया है
कि 'शुरुआत में जनता के एक बड़े वर्ग ने इमरजेंसी का स्वागत किया था, लेकिन
बाद में संजय गांधी के मनमाने और तानाशाही रवैये से जनता नाराज हो गई। आगे
कहा गया है कि ज्यादा उत्साह की वजह से नसबंदी को अनिवार्य कर दिया गया और
झुग्गियां हटाने के कार्यक्रम लागू किए गए।

तानाशाही रवैये से चलाया नसबंदी कार्यक्रम
इन्द्रा गांधी के बेटे संजय गांधी ने तानाशाही रवैये से परिवार नियोजन
की मुहिम पूरे देश में चलाना शुरू कर दिया। झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले लोगों को पकड़-पकड़कर जबरदस्ती नसबंदी की। जिससे लोगों में कांग्रेस सरकार के प्रति रोष व्याप्त हो गया।

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आखिर इमरजेंसी लगी क्यों थी?
दरअसल, 5 जून 1975
की सुबह इलाहाबाद हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया है कि इंदिरा गांधी ने 1971
में रायबरेली चुनाव जीतने के लिए सरकारी मशीनरी का इस्तेमाल किया था और इस
कारण हाईकोर्ट ने उनका चुनाव रद्द कर दिया था और उन्हें छह साल के लिए
चुनाव लड़ने के लिए के लिए अयोग्य घोषित कर दिया था। इंदिरा उस समय ताकत से
लबरेज थी। 1971 में बांग्लादेश का निर्माण और 1974 में परमाणु परीक्षण
करने के बाद इंदिरा गांधी को लगता था कि वह अब भारत में तानाशाह की तरह
हुकूमत कर सकती हैं। उनकी यह गलतफहमी 1977 के चुनाव में दूर हो गई और जनता
ने तीन साल की सजा के बाद 1980 में उन्हें फिर सत्ता सौंप दी।

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