
लक्ष्मीशंकर मिश्र 'निशंक' की 101वीं जयन्ती पर विशेष, स्वामी गणेशानन्द से मिली थी विता लिखने की प्रेरणा
लखनऊ. राजधानी के साहित्यिक परिदृश्य मेंं वह कोई 60 वर्षों तक निष्णात-कवि के रूप में अवधी व ब्रजभाषा के साथ खडी़ बोली में कविताएं, साथ ही हिन्दी में कुशल-गद्यकार के नाते राजधानी लखनऊ के मान्यगण व प्रतिष्ठित साहित्यकार की भूमिका में रहे हैं। अन्तर ये था कि लखनऊ के पूर्वोक्त कथाकार-चतुष्टय ने हिन्दी कहानी और कथेतर-गद्य साहित्य को बडी़-पहचान दी तो कवि 'निशंक'ने कविता, विशेषतः खडी़ बोली हिन्दी में सवैया, घनाक्षरी, कवित्त आदि की छान्दस-परम्परा के प्रति समर्पित-जीवन रहते हुए, उसे निरन्तर परिपुष्ट व संवर्द्धित भी किया। लेकिन, इससे यह मान लेना गलत होगा कि 'निशंकजी' हिन्दी की गीत-कविता या कि मुक्त-छन्द की रचनाधर्मिता के प्रति अरुचिशील थे।
कितनों को पता है कि नागर जी ने 12 वर्ष की अल्पायु में पहली कविता ब्रजभाषा में लिखी थी। बाद में कविताएं व कई प्रसिद्ध कवियों की प्रसिद्ध कविताओं का सफल-रोचक विडम्बन (पैरोडी) लिखने के लिये प्रसिद्ध नागर जी, 1939 से 1947 तक बम्बई में रहकर फिल्मों के लिये संवाद-कहानी समेत अनेक फिल्मों में गीत भी लिख रहे थे। इसी तरह गंगा प्रसाद मिश्र, छात्रजीवन में कविताएं गीत लिखने, सस्वर गाने के लिये भी जाने जाते थे, किन्तु ये दोनों ही रचनाधर्मी बाद में हिन्दी कहानी-उपन्यास-लेखन में विख्यात हुए। यह तीनों (नागर जी,गंगाप्रसाद मिश्र व निशंक) निरालाजी के अत्यन्त निकट व स्नेहभाजन भी रहे हैं। अक्सर ही निराला जी के घर यह तीनों जाते और मिलते-बैठते। अमीनाबाद में भी इन सब की मुलाकातें हुआ करतीं। आयोजनों में भी ये लोग साथ रहा करते थे।
गयाप्रसाद 'सनेही' को 'काव्य-गुरु' मानते निशंकजी 'सनेही-मण्डल' से उसके अस्तित्त्ववान रहने तक एकनिष्ठता से जुडे़ रहे। यही नहीं, 'सनेहीजी' द्वारा सम्पादित कविता की विख्यात् पत्रिका 'सुकवि' बन्द हुई तो 'निशंकजी' मनोयोग पूर्वक उसे 'सुकवि-विनोद' मासिक के रूप में अनवरत१०वर्षों(१९७३- १९८३)तक सम्पादित-प्रकाशित करते रहे। इससे 'निशंकजी' छन्दोबद्ध-काव्य-सर्जना की छीजती-टूटती परम्परा सशक्त बनाने व उसे अग्रगामिता देने की महत्-भूमिका में दिखायी देते हैं।
पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं
लक्ष्मीशंकर मिश्र का जन्म 21 अक्तूबर 1918 को भगवन्त नगर (हरदोई) में हुआ। कविता लिखने की प्रेरणा उन्हें स्वामी गणेशानन्द से मिली। आरम्भ में श्लोक, कविताएं, रत्नाकर जी, वचनेशजी आदि के छन्द याद कर उस समय की अंत्याक्षरी प्रतियोगिताओं में खूब हिस्सेदारी की। जूनियर हाई-स्कूल में प्रविष्ट होने तक विद्यार्थी लक्ष्मीशंकर की कविता व साहित्य में घनिष्ट-रुचि जाग चुकी थी। अध्यापक ने एक बार कविता-पाठ करने को कहा तो कविता का वह पठन व वाचन,दोनों; एक छात्र की प्रत्युत्तपन्न-मति के नाते बेहद प्रभावप्रद था। सो प्रश्न हुआ,'कविता भी लिखते हो?' रन्तु उत्तर सकारात्मक नहीं था। लेकिन, कछ अन्तराल बाद,एक दिन कक्षा-कार्य की अवधि में इस विद्यार्थी का काव्य-कर्म उजागर हो गया। एक कविता काॅपी में लिख रहे थे। इस पर नाराज़ होने के बजाय प्रतिभा-पारखी प्रधानाध्यापक ने तब अपने क़लमदान की एक क़लम पुरस्कार में दीं व अन्तर्मन से शुभकामनाएं भी। यहीं से नवोदित हिन्दी-कवि 'निशंक' का प्रादुर्भाव हुआ। इसे ही कहते हैं,'पूत के पांव पालने में ही दिख जाते हैं। 'इसी क्रम में हाईस्कूल की शिक्षा गवर्नमेण्ट काॅलेज, हरदोई में पूरी हुई। साथ ही कवित्त्व की प्रतिभा भी विकसित होती,उभरती-निखरती रही!
यशस्वी साहित्यकार के रूप में अपनी पहचान बनाई
लक्ष्मीशंकर हाईस्कूल से बाद की शिक्षा के लिये 1938 जुलाई में लखनऊ आये। कान्यकुब्ज काॅलेज में प्रवेश लिया। यहां विद्यालय की पत्रिका 'किरण' के सम्पादन से जुड़ने एवं उसका हस्त-लिखित अंक निकालने का मौका और प्राचार्य बालकृष्ण पांडेय का वरद्हस्त भी मिला। सुपरिचित हिन्दी-सेवी शिक्षाधिकारी भैय्या साहब श्रीनारायण चतुर्वेदी, हिन्दी-निष्ठ राजर्षि पुरुषोत्तम दासजी टण्डन और 'माधुरी' पत्रिका के सम्पादक पं.रूपनारायणजी पाण्डेय से भी सीधे सम्पर्क-संवाद के,विद्यार्थी 'निशंक' को ऐसे अन्य भी अनेक अवसर मिले। जिससे उभरते कवि लक्ष्मीशंकर मिश्र 'निशंक', हिन्दी कविता व हिन्दी की सेवा के प्रति आजीवन समर्पित ही हो गये। अन्तर केवल ये रहा कि लखनऊवासी पूर्वोक्त कथाकारों ने हिन्दी कहानी और कथेतर गद्य को साहित्य में यदि बडी़ पहचान दी तो कवि 'निशंक' ने कविता, विशेषतः छान्दस-हिन्दी-कविता की परम्परा को,अनेक अनुगामियों सहित निरन्तर गम्भीरतःसक्रिय रहकर यशस्वी साहित्यकार के रूप में अपनी पुख्ता-पहचान बनायी।
निशंकजी शिष्य थे लेखक मुद्राराक्षस
इस दौर में लखनऊ से हिन्दी की दो नामी मासिक पत्रिकाएँ 'सुधा'(सम्पादकःनिरालाजी) व 'माधुरी' सम्पादक (रूपनारा-यण पाण्डेय) प्रकाशित हो रही थीं, यद्यपि उनकी आभा क्षीण हो रही थी। 1940 के आसपास निराला जी लखनऊ छोड़ इलाहाबाद चले गये। नागर जी फिल्म-लेखन के लिये बम्बई, सरकारी स्कूल में अध्यापक होकर गंगाप्रसाद मिश्र हरदोई व रामविलास शर्मा प्राध्यापक होकर बलवंत राजपूत काॅलेज, आगरा चले गये थे। अतःअपनी पढा़ई,अध्ययन,लेखन तथा साहित्यिक सक्रियताओं आदि के लिये छात्र एवं उदीयमान कवि 'निशंक' के लिये अब खुला अवसर था कि यथासुविधा वह समय व अपने विवेक का बेहतर उपयोग करें। लखनऊ- निवास की इसी अवधि में इण्टर, साहित्यरत्न,हिन्दी में एम. ए.(लखनऊ विश्वविद्यालय)की पढा़ई के बीच 'निशंक' जब बिरहाना स्थित मुराई पाठशाला में अध्यापन कर रहे थे, तब सुभाषचन्द्र (कालान्तर के जाने माने-लेखक मुद्राराक्षस) इनके छात्र थे। सर्वप्रथम 'निशंकजी' कृति 'लाल सेना'(वीर काव्य,१९४२)व दूसरी 'मुसोलिनी का पतन'(१९४३--अब दोनों ये दोनों ही अप्राप्य) इसी दौर में छपी थी।१९५६ में वह कान्य- कुब्ज कालेज में शिक्षक के पद पर नियुक्त हुए तो विद्यालय के उच्चीकृत होने के साथ ही उनकी पदोन्नति भी होती रही है। लखनऊ विश्वविद्यालय से 'हिन्दी में सवैया का़व्य' पर डाॅ.भगीरथ मिश्र के निर्देशन में शोध कर वह भी साहित्य के डाॅक्टर हो गये।
निशंक जी की रचनाएं
डाॅ. लक्ष्मीशंकर मिश्र का जीवन बहुआयामी अवदान-प्रवृत रहा है। सन् १९५१ से अब तक उनके पद्य-गद्य व शोधग्रन्थ समेत २५ कृतियाँ प्रकाशित हो चुकी हैं।इनमें 'सिद्धार्ध का गृह त्याग (खण्डकाव्य१९५०) व 'शतदल' (१९५२) में छपे। शान्तिदूत(१९७०),जयभरत(१९७१),कर्मवीर भरत(१९७२) व संकल्प की विजय(१९९७)--सभी खण्ड काव्य प्रकाशित हुए।महाकाव्य 'सुमित्रा'(१९८९)में एवं विभीषण पर आत्म-कथात्मककाव्य 'प्रज्ञा उद्भाष'(२००१)में छपे।मुक्तक काव्यों में 'क्रान्ति राना बेनीमाधव':१९७१,गीत संकलन 'साधना के स्वर-१९७६,छन्द मुक्त 'अनुपमा'-१९७७ एवं 'शंख की साँस' -१९८२,'दर्पण'(दोहावली:१९९२),'रामलला की किलकारी' -१९९५में प्रकाशित हुईं तो सदी के अन्त में 'मेरी प्रारम्भिक कविताएँ ' व तूणीर'(व्यंग्य काव्यः१९९९)पुस्तक सदी के अन्तः१९९८में छपी हैं।'निशंक' का हिन्दी की काव्य शैलियों पर कैसा जबर्दस्त अधिकार है,इसके लिये यहीं उनकी कृति 'अपने मुँह मियाँ मिट्ठू' की चर्चा ज़रूरी है।
हिन्दी में अपने अभिनन्दनों-सम्मानों के बुभूक्षितों की कमी नहीं है।ऐसे लोगों पर साहित्य जगत् में 'भैय्या साहब नाम से 'श्रीवर' श्रीनारायण चतुर्वेदीजी ने व्यंग्यात्मक-प्रहार के लिये 'श्री विनोद शर्मा अभिनन्दन ग्रन्थ' प्रायोजित कर इस ग्रन्थ की उतनी ही प्रतियाँ प्रकाशित करवायीं,जितने लेखकों के नाम से उसमें लेख थे किन्तु;मजे की बात कि इनमें से एक भी अपने नाम से छपे लेखों का लेखक नहीं था!'निशंकजी' ने यही प्रयोग 'अपने मुँह मियाँ मिट्ठू' में भी करके कविता में(दो कवियों की मौलिक को छोड़कर)अनेक कवियों द्वारा लिखी प्रशस्तिपूर्ण रचनाएँ उसी तरह समाहित कीं,जैसेकि श्रीनारायण चतुर्वेदीजी ने पूर्वोक्त "अभिनन्दन-ग्रन्थ" में की थीं।दरअसल यह किसी भी रचनाकार की शैली में हूबहू ढला लेखन करने के रचना-कौशल की चुनौती को साबित करना भी है और प्रशस्ति-बुभूक्षितों के बहाने अपने पर भी व्यंग्य करनि भी। निशंकजी ने अनुकृति-काव्य की परंपरा में साहसिकता से यह चुनौती ली भी और भरपूर रोचकता के साथ उसे साबित भी किया।
101वीं जयन्ती पर याद आ रहे हैं निशंकजी
आज लखनऊ के शतीपार-स्मृति शेष साहित्यकारों के क्रम में जब कविश्रेष्ठ लक्ष्मीशंकर मिश्र 'निशंकजी' की 101वीं जयन्ती पर याद किया जा रहा है, तब अवधी, ब्रजभाषा व खडी़बोली हिन्दी में उनके बहुवि कृतित्त्व के साथ, सार्वजनिक-जीवन, सम्पादकीय अवदान आदि का स्मरण भी ज़रूर करें। उत्तर प्रदेश सरकार, उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान व अनेक संस्थाओं द्वारा समय-समय पर 'निशंकजी' समादृत-पुरस्कृत हुए हैं। उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान द्वारा उन्हें अपने सर्वोच्च सम्मान 'भारत भारती' से समलंकृत किया जाना, डाॅ.लक्ष्मीशंकर मिश्र 'निशंक' के कृतित्त्व और व्यक्तित्व के समग्र अवदान का सारस्वत-समादर रहा है।
Updated on:
22 Oct 2019 06:12 pm
Published on:
22 Oct 2019 06:09 pm
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