लखनऊ

हाय-हाय न किच किच, भगवती प्रसाद दीक्षित

चुनावी किस्से

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Mar 16, 2019
Loksabha election : Kanpur Bhagwati Prasad Dixit- ghodewala dixit


लखनऊ . करीब तीन दशक तक कानपुर के भगतवी प्रसाद दीक्षित देश की सियासत में अपना नाम हर बार दर्ज कराते रहे हैं। चुनाव चाहे लोकसभा को या राष्ट्रपति का। भगवती प्रसाद दीक्षित का पर्चा जरूर दाखिल होता था। अब वह नहीं, लेकिन उनके चर्चे अभी जनता जुबान पर हैं। 1951 से 1958 तक उन्होंने कानपुर डेवेलपमेंट बोर्ड में बतौर अधिकारी काम किया पर भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़े तो उन्होंने 1958 में नौकरी से इस्तीफा दे दिया। वह लोकसभा से लेकर राष्ट्रपति तक के चुनाव मैदान में उतरे। उन्होंने इंदिरा गांधी और राजीव गांधी के खिलाफ भी चुनाव लड़ा।

भगवती प्रसाद दीक्षित का अपना एक स्टाइल था। वह शहर के हर मोहल्ले में अकेले जाते थे। साइकिल, गाड़ी, रिक्शा या टेम्पो से नहीं चलते थे वे। अपना अंदाज था। पूरे हिस्टपुस्ट घोड़े से चलते थे। प्योर लेदर की घोड़े पर बैठने वाली जींस ही होती उनकी। कभी काले घोड़े पर, तो कभी कत्थई घोड़े पर और कभी कभी वह सफेद घोड़े पर सवारी करके आते थे। मोहल्लों के हर उस चौराहे और ठिकाने पर खड़े होते थे जहां भीड़ भाड़ हो। चाय की दुकान हो। घोड़े से उतर कर वह चाय पीते। लोगों से मिलते। बात चीत करते।

उनका पहनावा बिल्कुल फिल्मी था। लोग उन्हें रॉबिनहुड आफ कानपुर कहते थे। सिर पर एक बड़ा सा हैट होता था। हैट में दबे हुए बड़े-बड़े घुंघराले बाल और हल्की सफेद फ्रेंचकट दाढ़ी उनका अलग लुक देती थी। सफेद शर्ट के ऊपर काली हाफ जैकेट और टाइट पतलून और उसके नीचे लांग ***** पहनते थे। उनके घोड़े पर एक सफेद रंग का झंडा लहराता था, जिस पर लिखा होता था एकला चलो रे...। जब वे घोड़े पर चलते थे तो क्षेत्र के युवा उनके पीछे पीछे स्वत: चलने लगते थे और नारे लगाते- हाय-हाय न किच-किच, भगवती प्रसाद दीक्षित।

Published on:
16 Mar 2019 12:01 pm
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