नवाबों का शहर अपने जिगर में बहुत से इतिहास को समाये हुए हैं जिसको एक शायर ने खूब कहा है। 'यार लखनऊ तुम भी कमाल करते हो बाग को बाद में उलझाकर रखते हो '
नवाब आसफुद्दौला के पसंदीदा बाग ऐशबाग की तरह चारबाग भी शहर के खूबसूरत बाग में से एक था। इतिहास के पन्नों को टटोलें तो पता चलता है यह किसी चौपड़ की तरह चार नहरें बिछाकर चार कोनों पर चार बाग बनवाएं गए थे। इस तरह के बागों को फारसी जबान में चहारबाग कहा जाता है। यहीं चाहर बाग बाद में चारबाग में तब्दील हो गया। आईये जानते हैं लखनऊ के नवाब जाफर मीर अब्दुल्ला से दास्ताने चारबाग
यहीं हुई थी गांधी-नेहरू की पहली मुलाकात
उन्होंने कहा कि देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू की बापू से पहली मुलाकात लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन में हुई थी। महात्मा गांधी 26 दिसम्बर 1916 को पहली बार लखनऊ आए थे। मौका था कांग्रेस के अधिवेशन का जिस दौरान वह पांच दिनों तक शहर में रहे। तकरीबन 20 मिनट की मुलाकात में पंडित जी बापू के विचारों से काफी प्रभावित हुए।
बताया कि जवाहर लाल नेहरू अपने पिता मोतीलाल नेहरू के साथ आए थे। इस मुलाकात का जिक्र नेहरू जी ने अपनी आत्मकथा में भी किया है। जिस जगह पर गांधी नेहरू की मुलाकात हुई वहां आजकल स्टेशन की पार्किंग है। इस मिलन की निशानी के तौर पर उस जगह पर एक पत्थर भी लगा है।
मार्च1914 में बिशप जॉर्ज हर्बर्ट ने इसकी बुनियाद रखी थी। जहाँ ये नींव रखी गयी थी उसे मुनव्वर बाग़ कहते थे। 1923 में ये स्टेशन बनकर तैयार हुआ। जेकब हॉर्नीमैन ने इसका नक्शा तैयार किया था। उस वक़्त ये स्टेशन 70 लाख रुपये में बना था जो कि उस ज़माने में बहुत महँगा था।ये देश के सबसे खूबसूरत स्टेशन में से एक है।
ट्रेन की आवाज़ स्टेशन के बाहर सुनाई नहीं पड़ती
नवाब जाफर मीर अब्दुल्ला ने कहाकि स्टेशन की एक विशेषता यह है कि इसके अंदर से ट्रेनों के आवाजाही की आवाज़ स्टेशन बिल्डिंग से बाहर नहीं आती। ऊपर से देखने पर इस बिल्डिंग के छतरीनुमा छोटे बड़े गुम्बद शतरंज की बिछी बिसात की तरह लगती है। अंग्रेज सरकार ने उस वक़्त मोहम्मद बाग़ से लेकर आलमबाग के बीच का इलाका इस स्टेशन के लिए पसंद किया था। चहार बाग़ और चार महल के नवाबों को मुआवजे में मौलवीगंज और पुरानी इमली का इलाका दिया गया था।
रेलवे की पटरियों के बीच मज़ार
चारबाग़ रेलवे स्टेशन काम्पाउंड में शाह सयीद क़यामुद्दीन का मज़ार स्थित है, जो ख़मभन पीर बाबा का मज़ार के नाम से मशहूर है और ये लगभग 900 साल पुराना है। पहले अंग्रेजों ने इस मजार को कहीं और शिफ्ट करने का मन बनाया था पर यहाँ आने वाले हिंदू और मुसलमान श्रद्धालुओं की भारी भीड़ को देख कर इस मज़ार को यहीं रहने दिया गया और इसके दोनो तरफ से थोड़ी दूरी बनाकर लाइन बिछा दिया गया।