
समाजवादी पार्टी संरक्षक मुलायम सिंह यादव का इलाज के दौरान 82 वर्ष की उम्र में आज गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में निधन हो गया। नेताजी के निधन से समूचे यूपी में शोक की लहर दौड़ गई है। 5 दशक से अधिक के राजनीतिक जीवन के दौरान उन्होंने परिवार के कई सदस्यों और रिश्तेदारों को सियासी ककहरा सिखाकर पार्टी में शामिल किया, जो यूपी विधानमंडल के दोनों सदनों के साथ संसद तक पहुंचे हैं। हालांकि मुलायम सिंह यादव को जीवन के अंतिम 6 वर्षों में तब बड़ा व्यक्तिगत झटका लगा, जब परिवार सदस्य परस्पर विरोधी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के चलते दो खेमों में बंट गए।
देशभर में समाजवाद के वटवृक्ष के रूप में जाने जाने वाले मुलायम सिंह ने कड़ी मेहनत कर राजनीति में अपनी पहचान बनाई थी। आर्थिक तंगी के हालातों का सामना करते हुए एक मामूली शिक्षक फर्श से अर्श तक का सफर करते हुए आज दुनिया को अलविदा कह चुका है। बता दें कि मुलायम सिंह तीन बार 5 दिसंबर 1989 से 24 जनवरी 1991, 5 दिसंबर 1993 से 3 जून 1996 और 29 अगस्त 2003 से लेकर 11 मई 2007 तक यूपी के मुख्यमंत्री रहे। वे 8 बार विधायक और सात बार सांसद रहे। वह यूपी के एकमात्र ऐसे नेता थे, जो यूपी विधानमंडल के दोनों सदनों में विपक्ष के नेता रहे। अपनी लंबी राजनीतिक पारी के दौरान उन्होंने भाइयों के साथ बेटे-बहू, चचेरे भाई, भतीजे-भतीजी और पोते समेत परिवार के कई सदस्यों के राजनीतिक करियर निर्माण किया है।
अखिलेश के सीएम बनते ही मुलायम के कुनबे में पड़ी दरार
मुलायम सिंह जब जनता दल के नेता के रूप में पहली बार मुख्यमंत्री बने तो 1992 में जनता दल के विघटन के बाद मुलायम ने बेनी प्रसाद वर्मा और रेवती रमन सिंह जैसे सहयोगियों के साथ मिलकर सपा का गठन किया। उसी वर्ष उनके चचेरे भाई रामगोपाल यादव राज्यसभा के लिए चुने गए तो छोटे भाई शिवपाल यादव इटावा सहकारी बैंक के अध्यक्ष बनाए गए। 2012 के विधानसभा चुनावों में सपा ने पहली बार पूर्ण बहुमत हासिल किया और पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की सलाह को दरकिनार करते हुए मुलायम ने अखिलेश को यूपी का मुख्यमंत्री बनाया। कहा जाता है कि शिवपाल यादव इसके खिलाफ थे। बस यहीं से मुलायम के कुनबे में दरार पड़ने की शुरुआत हुई।
2014 के लोकसभा चुनाव में बढ़ी रार
2014 में शिवपाल यादव और रामगोपाल यादव के बीच मतभेद बढ़ने की चर्चाएं शुरू हो गईं, क्योंकि मुलायम ने 2014 के चुनाव में फिरोजाबाद सीट से रामगोपाल के बेटे अक्षय को मैदान में उतारा था। जबकि शिवपाल बेटे आदित्य के लिए टिकट चाहते थे। शिवपाल ने कथित तौर पर इसमें अखिलेश का हाथ बताया था। वहीं, 2016-17 में अखिलेश और शिवपाल के बीच विवाद बढ़ा तो शिवपाल खुद अलग हो गए।
राष्ट्रपति चुनाव में भी दिखे मतभेद
शिवपाल ने इसके बाद प्रगतिशील समाजवादी पार्टी (लोहिया) का गठन किया। हालांकि वह सपा के टिकट पर 2022 में जसवंतनगर से विधानसभा चुनाव जीते। विधानसभा चुनाव के बाद हुए राष्ट्रपति चुनाव में भी शिवपाल और अखिलेश यादव के बीच मतभेद देखने को मिले। सपा ने जहां यूपीए प्रत्याशी के समर्थन वोट डाले तो वहीं शिवपाल यादव ने क्रॉस वोट करते हुए एनडीए उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू के पक्ष मतदान किया।
अखिलेश यादव सबसे बड़े सियासी वारिश
मुलायम सिंह के सियासी वारिस की बात करें तो अखिलेश यादव का नाम सबसे आगे है। अखिलेश ने वर्ष 2000 में राजनीति में पहली बार कदम रखा था। उस दौरान वह कन्नौज लोकसभा सीट से सांसद चुने गए थे। 2012 में पूर्ण बहुमत मिलने पर मुलायम सिंह ने सीएम पद पर अखिलेश की ताजपोशी की। अखिलेश यादव हाल ही में तीसरी बार समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने हैं।
मुलायम के राज में शिवपाल की बोलती थी तूती
शिवपाल सिंह यादव की भी सपा मजबूत बनाने में बड़ी भूमिका रही है। मुलायम सिंह के राजनीति में सक्रिय रहने के दौरान पूरे यूपी में शिवपाल की तूती बोलती थी, लेकिन अब आए दिन उनके अखिलेश के साथ मतभेद सामने आते रहते हैं। यही वजह है कि शिवपाल यादव अपनी अलग प्रगतिशील समाजवादी पार्टी भी बनाई है, जिसके वे अध्यक्ष हैं।
अखिलेश के सबसे करीबी हैं रामगोपाल
मुलायम सिंह के कुनबे में तीसरा बड़ा नाम रामगोपाल यादव का आता है। रामगोपाल यादव मुलायम सिंह के चाचा के बेटे यानी चचेरे भाई हैं। रामगोपाल यादव वर्तमान में सपा से राज्यसभा सांसद हैं। रामगोपाल को अखिलेश यादव के सबसे करीबियों में गिना जाता है।
मुलायम के कुनबे इनका भी दबदबा
मुलायम सिंह के कुनबे में अगला नाम आता है डिंपल यादव का, जो कि अखिलेश यादव की पत्नी है। वह कन्नौज से सांसद रह चुकी हैं। भतीजे धर्मेंद्र यादव भी बड़ा नाम है। पूर्व सांसद धर्मेंद्र यादव मुलायम सिंह के बड़े भाई अभय राम यादव के पुत्र हैं। धर्मेंद्र ने 2019 में बदायूं और उसके बाद आजमगढ़ से उपचुनाव लड़ा लेकिन वह दोनों ही चुनाव हार गए। वहीं अपर्णा बिष्ट यादव मुलायम सिंह यादव के बेटे प्रतीक यादव की पत्नी है। 2017 के चुनाव में सपा ने कैंट से चुनाव लड़ाया, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। फिलहाल वह बीजेपी में हैं।
Published on:
10 Oct 2022 05:10 pm
बड़ी खबरें
View Allलखनऊ
उत्तर प्रदेश
ट्रेंडिंग
