
लखनऊ. राजधानी के मशहूर युवा कवि पंकज प्रसून का कहना है कि लखनऊ में मुस्कुराने की कई वजह हैं। उन्हीं में से एक ये भी है कि लखनऊ हास्य कवियों का शहर है। एक किस्से के जरिए भी उन्होंने इसे कहने की कोशिश की है-
फागुन होता ही ऐसा है शहर के बाहर आम बौराते हैं, शहर के अंदर कवि। लखनऊ की ख़ास बात है या यूँ कहें नक्खास बात है की यहाँ का हर तीसरा श्रोता कवि होता है।
मीर मजाज और जोश की जमीन पर या तो ठेले वालों का अतिक्रमण है या फिर शायरों का।
तो होली आ गयी है जनाब। आयोजक बन्धु कवियों की आवभगत में तल्लीन हो गए हैं और कवि आत्मलीन हो गए है। शहर के हर गली नुक्कड़ में लोग कवि सम्मेलन कराने पर आमादा हैं।
आयोजक के बन्दे चंदे की रसीदें धड़ाधड़ काट रहे हैं। हास्य को छोड़कर अन्य रस सुप्तावस्था में चले गए हैं। ऐसे में कुछ ओज और श्रृंगार के कवि अपनी विधा से भटक हास्य लिखने पर उतारू हैं।
काश्मीर समस्या पर दहाड़ने वाला और मुंह से गोलियां बरसाने वाला ओज का कवि भी शहद पीकर पति और पत्नी के संवाद बाचने लगा है। रावलपिंडी को ललकाने वाला घर की भिन्डी की बात कर रहा है।
श्रंगार रस के कवि ने प्रेमिका को छोड़ कर Jija और Saali पर कंसंट्रेट करना आरम्भ कर दिया है। कवियों का स्टेटस अपडेट हो गया है,और ढाई कवि सम्मलेन पर डे के औसत से कविता पढ़ने लगा है। ढाई इसलिए की तीसरा कवि सम्मलेन बीच में छोड़कर वह अगले दिन के कवि सम्मलेन के लिए अन्यत्र प्रस्थान कर जाता है।
कवि कविता पढ़ने से पहले अध्यक्ष जी से अनुमति माँगता है फिर बीच में जाने की ।मैंने आज ऐसा अध्यक्ष नही देखा जिसने कवि को इन दोनों स्थितियों में अनुमति न दी हो।
मेरे कालोनी समिति के सचिव महोदय होली मिलन हेतु कवियों की खोज में भटक रहे हैं,इतना तो वो दामाद खोजने के लिए न भटके होंगे। उनको मालूम नहीं था कि यहाँ के प्रसिद्द कवियों की बुकिंग कम से कम दो महीने पहले करनी होती है. ऐसे में उनको कम जमाऊ और ज्यादा उबाऊ कवियों से काम चलाना पड़ रहा है।
इन दिनों कवि अपने पेमेंट के साथ भी कोई समझौता नहीं करता। शहर के व्यस्ततम आउटडोर कवियों में से एक कवि ने बताया कि मेरी कविता बहुत महंगी है और लोकल पेमेंट बहुत कम है ऐसे में बाहर जाता हूँ वहां का पैसा मेरे शहर में आता है इससे शहर की इकोनामिक ग्रोथ बढ़ती है.
एक बार एक वेल रेटेड कवि को एक संयोजक ने फोन किया.कवि जी बोले-‘आप को मेरा पेमेंट मालूम है न’संयोजक बोले –क्या बात करते हैं कवि जी, कविता तो बेशकीमती है.मैं क्या कीमत लगा लाऊंगा. आप पेमेंट की चिंता बिलकुल न करें.कवि को लगा कि जम कर पेमेंट मिलने वाला है..कवि सम्मलेन के बाद संयोजक फरार हो गए..काफी खोजने पर नहीं मिले.
तभी एक श्रोता एक पर्ची लेकर आया जिस पर लिखा था -माफ करियेगा,मैं कविता की कीमत लगा नहीं पाया.आप पेमेंट की चिंता बिलकुल न करें,साहित्य की करें.कवि महोदय ने भी उनके ऊपर आरोप लगाते हुए उसी पर्ची पर लिख दिया -मिश्रा जी माना आप जीवन मूल्यों के बीज बो रहे हैं पर मूल्य के प्रति असहिष्णु ही रहे हैं। एक कवि ने कविता सुनायी श्रोताओं ने ताली नही बजाई। कवि ने आरोप लगा दिया -आप अपनी सहनशक्ति खो रहे हैं कविता के प्रति असहिष्णु हो रहे हैं।
इन दिनों हास्य कवि आपको हंसा कर पेट फुला रहा है ।आपके फूले पेट का बढ़ा हुआ आयतन मोहल्ले की भाभियो की गुझियों के लिए शुभ संकेत है। आप खूब होली मिलन कराइये। फागुन की मादकता बढ़ाइए। मुख्य अतिथि कोई नेता बुलाइये।उससे विकास की घोषणाएं भी कराइये। मादकता उतरने पर सब भूल जाइए। क्योंकि नेता आखिरकार विकास तो हास्य व्यंग्य का ही करेगा न।मुस्कुराइए की आप लखनऊ में हैं।
(पंकज प्रसून)
Updated on:
08 Oct 2017 11:18 pm
Published on:
08 Oct 2017 08:02 pm

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