
Chandrika Temple
लखनऊ. देशभर में नवरात्रि की धूम हैं। शारदीय नवरात्र रविवार से प्रारम्भ हो गए। यह आठ अक्तूबर तक चलेंगे। इस बार नौ दिन में नौ अद्भुत और मंगलकारी संयोग मिल रहे हैं। दो दिन अमृत सिद्धि, दो दिन सर्वार्थ सिद्धि, दो दिन रवि योग मिलेंगे। दो सोमवार भी होंगे जो शिवा शक्ति के प्रतीक हैं। वहीं प्रदेश भर के मंदिरों में श्रद्धालुओं का तांता लगना शुरू हो गया है। हर जगह मां के जयकारे लग रहे हैं। हर कोई मां के दर्शनों के लिए उतावला हो रहा है। इस मौके पर हम आपको बताने जा रहे हैं यूपी के मां के ऐसे मंदिरों के बारे जहां दर्शनों के लिए देश-विदेश से भक्तों का तांता लगता है।
कालीजी मंदिर-
लखनऊ के चौक इलाके में बड़ी कालीजी मंदिर में भगवान विष्णु और काली जी की मूर्तियां स्थापित हैं। इस तरह का यह दुनिया में अकेला मंदिर है। कहा जाता है कि आदि शंकराचार्य ने करीब दो हजार साल पहले इस मंदिर को बनाया था। बड़ी काली मंदिर की भक्तों में काफी मान्यता है। यहां देश-विदेश से लोग मां के दर्शन करने आते हैं और मां से मन्नतें मांगते हैं। मंदिर में अष्टधातु की मूर्ति को केवल नवरात्रि में अष्टमी और नवमी को दर्शन के लिए निकाला जाता है।
इसे बाद में हजारों साल पुरानी इस मूर्ति को फिर से मंदिर के गर्भगृह में रखा जाता है। कहा जाता है कि इस मूर्ति के सामने मांगी गई हर मन्नत पूरी होती है। यही वजह है कि नवरात्र की अष्टमी और नवमी को यहां पर आस्था का सैलाब उमड़ता है। यह मूर्ति देखने में अर्धनारीश्वर है। मूर्ति ने धोती और जनेऊ पहन रखी है और माथे पर बिंदी और श्रृंगार किया जाता है।
देवी पाटन मंदिर-
देवी पाटन मंदिर यूपी के बलरामपुर जिले के तुलसीपुर शहर में है। यहां नवरात्र पर लाखों की संख्या में भक्त आते हैं। नवरात्र में यहां पूरे एक महीने का मेला लगता है। इस मेले में मिठाई, गहने, जूतों , खिलौने, झूले और चिड़ियाघर, थिएटर की अलग से दुकानें लगती हैं।
तरकुलहा मंदिर-
गोरखपुर से 20 किलोमीटर की दूरी पर तरकुलहा मंदिर है। इस मंदिर का इतिहास भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से जुड़ा है। ये मंदिर हिन्दू धर्म के प्रमुख धर्म स्थलों में से एक है। भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 में बंधू सिंह नामक क्रांतिकारी ने अंग्रेजों को नाके चने चबवा दिए थे। बंधू सिंह गुरिल्ला लड़ाई में माहिर थे। इसलिए जब भी कोई अंग्रेज मंदिर के पास स्थित जंगल से गुजरता था, तो बंधू सिंह उसका सर काटकर देवी मां के चरणों में समर्पित कर देते थे।
मां चन्द्रिका देवी का धाम-
राजधानी लखनऊ से लगभग 32 किलोमीटर दूर स्थित मां चन्द्रिका देवी तीर्थ धाम की महिमा ही न्यारी है। गोमती नदी के पास स्थित महीसागर संगम तीर्थ के तट पर एक पुरातन नीम के वृक्ष के कोटर में नौ दुर्गाओं के साथ उनकी वेदियां चिरकाल से सुरक्षित रखी हुई हैं। यहां हर दिन हजारों भक्त दर्शन करने के लिए आते हैं। नवरात्र में 9 दिनों तक भक्तों की अच्छी खासी भीड़ लगी रहती है।
कालीबाड़ी मंदिर-
बरेली शहर के कालीबाड़ी मंदिर काफी प्राचीन है। शहर के शाहमतगंज इलाके में स्थित इस मंदिर में भक्तों का सैलाब लगा रहता है। यहां लगने वाले मेले में दूर-दूर से लोग आते हैं। हर सोमवार और शनिवार यहां भक्तों की काफी भीड़ होती है।
मां ललिता देवी मंदिर-
लखनऊ से 90 किलोमीटर दूर दक्षिण पश्चिम दिशा में सीतापुर के मिश्रिख के पास नैमिषधाम स्थित मां ललिता देवी का भव्य मंदिर है। यहां मांगी गयी हर मुराद पूरी होती है। नैमिष में बना चक्रतीर्थ और दधीच कुण्ड भी आकर्षण का केंद्र है। यहां मां के दर्शन करने के लिए दूर- दूर से लोग आते हैं, जो पहले चक्रतीर्थ में स्नान करते हैं, फिर मां के दर्शन करते हैं।
वाराणसी में शैलपुत्री का मंदिर -
नवरात्र के पहले दिन मां शैलपुत्री की अर्चना की जाती है। काशी नगरी वाराणसी के अलईपुर क्षेत्र में मां शैलपुत्री का प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर की मान्यता है कि नवरात्र के पहले दिन इनके दर्शन से भक्तों की हर मुराद पूरी होती है। नवरात्र में माँ के दर्शन से वैवाहिक कष्ट दूर हो जाते हैं, इतना ही नहीं यहां नवरात्र के पहले दिन भक्त माँ के दर्शन को इतने आतुर रहते हैं कि नवरात्र के एक दिन पहले से ही मां के भक्त दर्शन के लिए लाइन में लग जाते हैं।
बारा देवी मंदिर-
कानपुर के दक्षिणी इलाके में स्थित बारा देवी मंदिर में नवरात्रों के सभी नौ दिन भारी भीड़ जमा होती है। कहा जाता है कि यहां स्थापित देवी मां की मूर्ति 1700 साल पुरानी है। दूर-दराज से भक्त दर्शन के लिए पहुंचते हैं और अपने परिवार की सुख-शांति की मन्नतें मांगते हैं। लोगों के मन में इस मंदिर के प्रति अटूट आस्था है|
यहां आज भी मां की पूजा करता है अश्वस्थामा-
महाभारतकालीन सभ्यता से जुड़े उत्तर प्रदेश मे यमुना नदी के किनारे मां काली का एक ऐसा मंदिर है, जिसके बारे जनश्रुति है कि इस मंदिर में महाभारत काल का अमरपात्र अश्वश्थामा अदृश्य रूप में आकर सबसे पहले पूजा करता है। यह मंदिर इटावा से मात्र 5 किलोमीटर की दूरी पर यमुना नदी के किनारे बसा हुआ है। इस मंदिर का नवरात्रि के मौके पर खासा महत्व हो जाता है। नवरात्रि की शुरूआत हो चुकी है ऐसे मे इस मंदिर मे अपनी अपनी मनोकामना को पूरा करने के इरादे से दूर दराज से भक्तों के आने का सिलसिला शुरू हो चुका है। कालीवाहन मंदिर के मुख्य मंहत का कहना है कि कालीवाहन नामक इस मंदिर का अपना एक अलग महत्व है। नवरात्रि के दिनों में तो इस मंदिर की महत्ता अपने आप में खास बन पड़ती है। उनका कहना है कि वे करीब 35 साल से इस मंदिर की सेवा कर रहे हैं, लेकिन आज तक इस बात का पता नहीं लग सका है कि रात के अंधेरे मे जब मंदिर को धुल करके साफ कर दिया जाता है और सुबह जब गर्भगृह खोला जाता है, उस समय मंदिर के भीतर ताजे फूल मिलते है, जो इस बात को साबित करता है, कोई अदृश्य रूप मे आकर पूजा करता है। अदृश्य रूप मे पूजा करने वाले के बारे मे कहा जाता है कि महाभारत के अमर पात्र अश्वस्थामा मंदिर मे पूजा करने के लिये आते हैं।
Published on:
30 Sept 2019 07:30 am
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