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पपीता बना रहा किसानों को मालामाल, जानें खेती का तरीका और लाभ

पूर्वांचल में पपीते की खेती करके किसान खासा लाभ उठा रहे हेैं। कम लागत में अच्छा मुनाफा देने वाले इस फल से किसान अपना भविष्य संवार रहे हैं। यहां जानें इसके खेती का तरीका।

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लखनऊ

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Suvesh shukla

Nov 29, 2023

Papaya cultivation make farmers rich give more profit at lower cost

यूपी के पूर्वांचल में गोरखपुर के किसान अब पपीते की खेती कर मालामाल हो रहे हैं। बेलीपार स्थित कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) की पहल ने कृषकों को इसकी खेती करने के लिए प्रेरित किया है। अगर वैज्ञानिक ढंग से इसकी खेती को बड़े स्तर से किया जाए तो यह बड़ा मुनाफा दिला सकता है।

साल भर बना रहता है बाजार में
जानकर बताते हैं कि पपीता एक ऐसा फल है जिसकी उपलब्धता लगभग 12 माह रहती है। लेकिन हम बाजार से जो पपीता लेते हैं वह आमतौर पर दक्षिण भारत या देश के अन्य राज्यों से आता है। औषधीय गुणों से भरपूर होने के नाते इसकी मांग भी अच्छी है। इन्हीं संभावनाओं के मद्देनजर गोरखपुर के कुछ किसान बेलीपार स्थित कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एस पी सिंह की मदद से पपीते की खेती कर रहे हैं।


कम लागत में अच्छा मुनाफा
गोरखपुर के पिराइच स्थित उनौला गांव के धर्मेंद्र सिंह और बांसगांव तहसील के माहोपार निवासी दुर्गेश मौर्य भी ऐसे ही किसानों में से हैं। धर्मेंद्र बताते हैं कि एक एकड़ की खेती में करीब 1 लाख रुपए की लागत आई थी। वहीं 1.5 लाख रुपए की शुद्ध बचत हुई थी। उनके मुताबिक ठंड में फसल की बढ़वार रुक जाती है और अधिक गर्मी में फूल गिरने की समस्या आती है। बाकी समय में पपीते की खेती संभव है।

ऊंची जमीन खेती के लिए उपयोगी
केवीके के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. एस. पी. सिंह के मुताबिक पूर्वी उत्तर प्रदेश में जहां जमीन ऊंची है, जल निकासी का बेहतर प्रबंध है, वहां पपीते की खेती संभव है। साल भर इसकी मांग को देखते हुए आर्थिक रूप से भी यह उपयोगी है।

डॉ.एसपी सिंह के मुताबिक पपीता की अच्छी खेती के लिए उचित जल निकास वाली बलुई दोमट भूमि बेहतर रहती है। पूर्वांचल के बांगर इलाके में ऐसी जमीन उपलब्ध है। पौधों की अच्छी वृद्धि के लिए 22 से 26 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान उचित होता है।

साल में दो बार लगते हैं पौधे
पपीता के पौधों का रोपण साल में दो बार अक्टूबर व मार्च में किया जाता है। रोपण के दौरान लाइनों और पौधों के बीच दो-दो मीटर की दूरी रखनी चाहिए। इस तरह से रोपण में प्रति एकड़ करीब 1000 पौधों को लगाया जा सकता है।

इस तरह लगाएं पपीते के पौधे को
कृषि विशेषज्ञ बताते हैं कि मानक दूरी पर 60-60 सेंटीमीटर आकार के गड्ढे खोदकर उनको 15 दिन खुला छोड़ दें। इसके बाद हर गड्ढे में 20 किग्रा सड़ी गोबर खाद, एक किग्रा नीम की खली, एक किग्रा हड्डी का चूरा, 5 से 10 ग्राम फ्यूराडान अच्छी तरह मिलाकर गड्ढे को भर दें। जब पौधे नर्सरी में 15 से 20 सेंटीमीटर ऊंचाई के हो जाए तब इसकी रोपाई करें।

उचित मात्रा में करें उर्वरक का उपयोग
उर्वरक के रूप में 250 ग्राम नाइट्रोजन, 250 ग्राम फॉस्फोरस और 500 ग्राम पोटाश की मात्रा को चार भागों में बांटकर रोपाई के बाद पहले, तीसरे, पांचवे एवं सातवें महीने में प्रयोग करें। इसके अलावा सूक्ष्म पोषक तत्व बोरान एक ग्राम/लीटर एवं जिंक सल्फेट 5 ग्राम/ली की दर से पौधा रोपण के चौथे व आठवें महीने में छिड़काव करें। वहीं आवश्यकतानुसार सिंचाई करते रहें।

एक बार रोपण करने पर देगा इतने सालों तक फल
कृषि वैज्ञानिक बताते हैं कि पपीता के एक पौधे से साल में औसतन 40 से 50 किलोग्राम फल मिलता है। इस प्रकार प्रति एकड़ लगभग 400 से 500 कुंटल फल पैदावार एक साल में होती है, जिससे 1 साल में 4 से 5 लाख रुपए का मुनाफा मिल सकता है। एक बार रोपण किए गए पौधे 3 सालों तक अच्छे फल देते हैं।

रोगों से करें इस तरह बचाव
पपीता विषाणु जनित मोजैक रोग के प्रति खासा संवेदनशील होता है। रोग लगे पौधों की पत्तियां गुच्छे जैसी हो जाती हैं। इसके बचाव के लिए डाइमेथोएट 2 ग्राम प्रति लीटर की दर से प्रतिमाह छिड़काव करना चाहिए।

इसी तरह पदगलन रोग से भी फसल को खासा नुकसान पहुंचना संभव है। रोगग्रस्त पौधों की जड़ और तना सड़ने से पेड़ सूख जाता है। इसके रोकने के लिए पपीता के बगीचे में जल निकास का उचित प्रबंध होना चाहिए एवं कार्बनडाजिम व मेंकोजेब 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से घोल बनाकर पौधों के तने के पास जड़ में छोड़ना चाहिए।

विटामिन और मिनरल्स से है भरपूर
आयुर्वेद के जानकार बताते हैं कि पपीता के फलों में विटामिन ए प्रचुर मात्रा में पाया जाता है जो कि आम के बाद दूसरे स्थान पर है इसके अलावा विटामिन सी और मिनरल्स लवण भी पाए जाते हैं।

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