
1971 के इस वीर की कहानी रोंगटे खड़े कर देगी Source- AI
Republic Day 2026 Special: सोमवार को भारत अपना 76वां गणतंत्र दिवस मनाने जा रहा है। गणतंत्र दिवस के पूरे देश खुशी दोगुनी लहर देखने को मिलती है। उस दिन भारत के लोग अपने उन वीर सपूतोंको याद करते हैं, जिनके वजह से भारत का हर एक वासी आज खुल कर जिंदगी जी रहा है। वहीं इस कड़ी में आज हम आपको भारत के एक ऐसे वर सपूत के बारे में बताने जा रहे हैं, जिसने 1971 की लड़ाई में पाकिस्तानी हथियारों से उसके ही बंकर को तबाह कर दिया था। बात है 1971 के नवंबर महीने की। पूर्वी पाकिस्तान, जो आज का बांग्लादेश में हालात बहुत खराब थे। पाकिस्तानी सेना अपने ही बंगाली नागरिकों पर अत्याचार कर रही थी। गांवों को आग लगाई जा रही थी, लोगों को मार दिया जा रहा था। लाखों बंगाली लोग जान बचाने के लिए भारत की सीमा में घुस रहे थे। बंगाल और असम में करीब 80 लाख शरणार्थी पहुंच चुके थे। यह सिर्फ शरणार्थी संकट नहीं था, बल्कि युद्ध की शुरुआत की आहट थी। सवाल यह नहीं था कि जंग होगी या नहीं, बल्कि यह था कि कब होगी।
पाकिस्तानी सेना बॉर्डर पर पूरी तरह तैयार थी, जबकि भारतीय सेना अभी तैयारी के दौर में थी। इसी बीच 20 माउंटेन डिवीजन को एक बहुत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी गई। यह डिवीजन आमतौर पर ऊंचे पहाड़ी इलाकों में तैनात रहती है, लेकिन इस बार पूर्वी पाकिस्तान की बोगुरा पोस्ट पर कब्जा करने का काम दिया गया। इसी डिवीजन में लांस नायक राम उग्रह पांडेय एक छोटे से सेक्शन की कमान संभाल रहे थे। आने वाले दिनों में उनका नाम 'मोरापारा' की लड़ाई में इतिहास बनने वाला था।
1971 में पूर्वी पाकिस्तान में बंगाली लोगों पर जुल्म हो रहे थे। पाकिस्तानी सेना ने ऑपरेशन सर्चलाइट शुरू किया था। गांव जलाए जा रहे थे, महिलाओं और बच्चों पर अत्याचार हो रहे थे। लाखों लोग भारत की तरफ भाग रहे थे। भारत ने इन शरणार्थियों को शरण दी, लेकिन यह संकट इतना बड़ा हो गया कि युद्ध टालना मुश्किल हो गया। पाकिस्तान भारत पर हमला करने की तैयारी कर रहा था। भारत ने भी अपनी सेना को अलर्ट कर दिया। पूर्वी मोर्चे पर 20 माउंटेन डिवीजन को बोगुरा और हिली इलाके पर कब्जा करने का आदेश मिला। हिली से होकर बोगुरा पहुंचने का रास्ता था, जहां पाकिस्तानी सेना मजबूत थी।
20 माउंटेन डिवीजन के तहत 202 माउंटेन ब्रिगेड काम कर रही थी। इस ब्रिगेड के कमांडिंग ऑफिसर थे ब्रिगेडियर फरहत भट्टी। ब्रिगेड में 8 गार्ड्स इन्फैंट्री बटालियन शामिल थी, जिसकी कमान लेफ्टिनेंट कर्नल शमशेर सिंह के पास थी। इसी बटालियन की डी कंपनी में लांस नायक राम उग्रह पांडेय एक सेक्शन के कमांडर थे। ये सभी जवान बहादुर थे और देश के लिए कुछ भी करने को तैयार थे।
20 नवंबर को ब्रिगेडियर फरहत भट्टी ने लेफ्टिनेंट कर्नल शमशेर सिंह को कमांड हेडक्वार्टर बुलाया। सिंह ने सैल्यूट किया और कहा, "जय हिंद!" ब्रिगेडियर ने पूछा, "तैयारी कैसी है?" सिंह ने जवाब दिया कि जवान मरने और मारने को तैयार हैं। ब्रिगेडियर ने कहा कि देश के लिए मरना नहीं, सिर्फ मारना है। मेरा कोई जवान शहीद नहीं होना चाहिए। सिंह मुस्कुराए और बोले-ऐसा ही होगा सर। ब्रिगेडियर ने चेतावनी दी कि पाकिस्तानी मजबूत हैं, हमला पहले भी कर सकते हैं। यूनिट को अलर्ट रहना होगा। सिंह ने कहा कि सर यूनिट तैयार है। इसके बाद लेफ्टिनेंट कर्नल सिंह बटालियन के जवानों से मिले। डी कंपनी में राम उग्रह पांडेय भी मौजूद थे। सिंह ने बताया कि बोगुरा पोस्ट फतह करनी है। इसके लिए हिली कस्बे पर कब्जा जरूरी है। रास्ते में खेत और दलदल हैं, मुश्किलें बहुत होंगी। फिर जोश में बोले कि क्या हम चुनौती पार कर लेंगे?" सभी जवानों ने एक साथ कहा कि इसमें कोई शक नहीं साब। हम लड़ेंगे, जीतेंगे।
हिली भारत और पूर्वी पाकिस्तान के बीच का कस्बा था। भारतीय तरफ बस्तियां और सड़कें थीं, पाकिस्तानी तरफ धान के खेत, दलदल और छोटे गांव जैसे मोरापारा, बसुदेवपुर, चंदीपुर। पाकिस्तानी सेना ने यहां मजबूत तैयारी की थी। 205 इन्फैंट्री ब्रिगेड तैनात थी। कंक्रीट बंकर, रेलवे की पुरानी बोगियां फायरिंग पोजीशन में, कांटेदार तार, माइंस, मशीन गन, रिकॉइललेस राइफल और टैंक सब तैयार। 22 नवंबर की शाम को बॉर्डर पर तनाव चरम पर था। युद्ध किसी भी वक्त शुरू हो सकता था। प्लान था कि हिली से होकर बोगुरा पर कब्जा कर पाकिस्तानी सेना को अलग-थलग किया जाए। सबसे पहले मोरापारा गांव पर कब्जा जरूरी था। लेफ्टिनेंट कर्नल सिंह ने प्लान बताया। राम उग्रह पांडेय ने कहा कि दुश्मन कुछ भी तैयारी कर ले, हम उनके मंसूबों पर पानी फेर देंगे।
लेफ्टिनेंट कर्नल सिंह ने नक्शा दिखाया। मोरापारा लाल निशान से चिह्नित था। कहा कि आर्टिलरी पहले हमला करेगी, फिर हम आगे बढ़ेंगे। रात का अंधेरा मदद करेगा। जवानों का जोश उफान पर था। राम उग्रह ने कहा कि बहादुरी हमारी पहचान है। इस बार और पुख्ता होगी। मीटिंग खत्म हुई। राम उग्रह ने अपने सेक्शन के जवानों को इकट्ठा किया। बोले, "दुश्मन मजबूत है, लेकिन हम गार्ड्स हैं। रेंगकर जाएंगे, ग्रेनेड फेंकेंगे, एक-दूसरे को कवर देंगे। कोई पीछे नहीं रहेगा। कुछ जवान दलदल से डर रहे थे। राम उग्रह ने कहा कि आगे मैं रहूंगा। रास्ता बनाऊंगा। गिर जाऊं तो भी आगे बढ़ना।
23 नवंबर आधी रात करीब 12 बजे, युद्ध के आधिकारिक एलान से 10 दिन पहले। भारतीय आर्टिलरी ने हिली पर फायरिंग शुरू की। तोपों की गड़गड़ाहट से जमीन कांप उठी। पाकिस्तानी बंकरों पर गोले गिरे। दुश्मन ने भी जवाबी हमला किया। आग और धुआं चारों तरफ। लेकिन पाकिस्तानी बंकर टूट नहीं रहे थे। भारत का पहला हमला उम्मीद से कमजोर रहा। काफी नुकसान हुआ। रात 1 बजे हमला और तेज किया गया। 8 गार्ड्स की दो कंपनियां आगे बढ़ीं। राम उग्रह पांडेय की सेक्शन रेंगते हुए आगे जा रही थी। सबसे पहले कांटेदार तारों की बाधा आई। उसके पार बंकर थे। राम उग्रह ने वायर कटर निकाला। सभी जवान जमीन पर लेटे थे।
राम उग्रह पांडेय ने सेक्शन को कमांड दिया। वे आगे बढ़े। दुश्मन की मशीन गन से गोलीबारी हो रही थी। राम उग्रह घायल हो गए, लेकिन रुके नहीं। उन्होंने हैंड ग्रेनेड से तीन दुश्मन बंकर उड़ाए। कई पाकिस्तानी सैनिक मारे गए। उनकी बहादुरी से भारतीय जवान आगे बढ़ सके। लेकिन लड़ाई में राम उग्रह गंभीर रूप से घायल हो गए और शहीद हो गए। यह 24 नवंबर 1971 की बात है। उनकी बहादुरी के लिए उन्हें मरणोपरांत महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। यह भारत का दूसरा सबसे बड़ा वीरता पुरस्कार है। लांस नायक राम उग्रह पांडेय ने 29 साल की उम्र में देश के लिए सर्वोच्च बलिदान दिया। उनकी कहानी आज भी प्रेरणा देती है कि कैसे एक साधारण जवान असाधारण बहादुरी दिखा सकता है।
हिली की लड़ाई नवंबर 1971 में शुरू हुई और दिसंबर में पूरी हुई। 8 गार्ड्स और अन्य यूनिटों ने मोरापारा और हिली पर कब्जा किया। यह 1971 के युद्ध की महत्वपूर्ण जीत थी, जिसने बांग्लादेश की आजादी का रास्ता आसान बनाया। राम उग्रह पांडेय जैसे वीरों की कुर्बानी से भारत ने पूर्वी पाकिस्तान को आजाद कराया।
Updated on:
24 Jan 2026 11:36 am
Published on:
24 Jan 2026 11:17 am

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