
सपा-बसपा गठबंधन के संकेत, अखिलेश बोले रिश्ते मजबूत, यूपी में बढ़ी सियासी हलचल (फोटो सोर्स : WhatsApp News Group)
Akhilesh Yadav SP BSP Alliance: उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बार फिर सियासी हलचल तेज हो गई है। समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के संभावित गठबंधन को लेकर चर्चाएं जोर पकड़ रही हैं। इन अटकलों को तब और बल मिला जब सपा प्रमुख अखिलेश यादव ने कहा कि “बसपा और सपा के रिश्ते मजबूत हो रहे हैं।” उनके इस बयान को आगामी चुनावों की रणनीति और विपक्षी एकजुटता की दिशा में महत्वपूर्ण संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
लखनऊ में आयोजित ‘पीडीए होली मिलन’ कार्यक्रम ने इस चर्चा को नई दिशा दे दी। पार्टी के मुताबिक इस कार्यक्रम में 15,000 से अधिक लोगों ने सपा की सदस्यता ग्रहण की। इसमें विभिन्न सामाजिक वर्गों के प्रतिनिधि शामिल थे। कार्यक्रम के दौरान नसीरुद्दीन सिद्दीकी और राजकुमार पाल जैसे प्रमुख चेहरों ने सपा की सदस्यता ली, जिसे पार्टी ने सामाजिक आधार के विस्तार के रूप में प्रस्तुत किया। अखिलेश यादव ने मंच से कहा कि पीडीए,पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक की एकजुटता ही प्रदेश में प्रगतिशील राजनीति की असली ताकत है। उन्होंने कहा कि सामाजिक न्याय और बराबरी की राजनीति को आगे बढ़ाने के लिए व्यापक गठजोड़ की आवश्यकता है।
सपा और बसपा का गठबंधन कोई नया प्रयोग नहीं है। वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में दोनों दलों ने साथ मिलकर चुनाव लड़ा था। हालांकि बाद में यह गठबंधन टूट गया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि मौजूदा परिस्थितियों में विपक्षी दलों के बीच तालमेल की जरूरत पहले से अधिक महसूस की जा रही है। भाजपा के मजबूत संगठन और संसाधनों के सामने विपक्षी दलों की एकजुटता ही प्रभावी रणनीति साबित हो सकती है। अखिलेश यादव के हालिया बयान को इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि बसपा की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन सपा के भीतर यह संदेश दिया जा रहा है कि सामाजिक और राजनीतिक रिश्ते बेहतर हो रहे हैं।
अपने संबोधन में अखिलेश यादव ने कहा कि प्रगतिशील राजनीति की नींव सामाजिक एकता में निहित है। उन्होंने कहा कि अगर पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक समुदाय एक मंच पर आ जाएं तो प्रदेश की राजनीति की दिशा बदल सकती है।उन्होंने कहा कि हमारा उद्देश्य समाज को जोड़ना है, तोड़ना नहीं। जब समाज जुड़ेगा तभी विकास और न्याय संभव होगा। यह संदेश सीधे तौर पर भाजपा की राजनीति के विरोध में सामाजिक समरसता और समावेशी राजनीति की पैरवी के रूप में देखा गया।
अखिलेश यादव ने अपने भाषण में शंकराचार्य से जुड़े हालिया विवाद का जिक्र करते हुए मुख्यमंत्री Yogi Adityanath पर परोक्ष रूप से निशाना साधा। उन्होंने कहा कि धर्म और राजनीति को अलग रखना चाहिए और धार्मिक संस्थाओं के सम्मान का ख्याल रखना चाहिए। उन्होंने बिना नाम लिए कहा कि सत्ता में बैठे लोगों को परंपराओं और आस्था का सम्मान करना चाहिए, न कि उन्हें राजनीतिक लाभ के लिए इस्तेमाल करना चाहिए। राजनीतिक हलकों में इसे मुख्यमंत्री पर सीधा हमला माना गया, हालांकि अखिलेश ने संयमित भाषा का इस्तेमाल किया।
सपा इस समय संगठन को मजबूत करने के अभियान में जुटी है। पार्टी का दावा है कि बड़ी संख्या में युवाओं और विभिन्न सामाजिक वर्गों के लोग पार्टी से जुड़ रहे हैं। पीडीए होली मिलन’ कार्यक्रम को इसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है। पार्टी सूत्रों के अनुसार, आने वाले महीनों में प्रदेश के विभिन्न जिलों में ऐसे कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सपा अपने सामाजिक आधार को व्यापक करने में सफल रहती है और बसपा के साथ तालमेल बन जाता है, तो प्रदेश की राजनीति में बड़ा बदलाव संभव है।
अखिलेश यादव ने अपने भाषण में विपक्षी एकजुटता की भी वकालत की। उन्होंने कहा कि लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए विपक्ष की भूमिका महत्वपूर्ण है। उन्होंने कहा कि जब विपक्ष मजबूत होता है, तब लोकतंत्र मजबूत होता है। हमें मिलकर काम करना होगा। यह बयान राष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है, जहां विभिन्न विपक्षी दल भाजपा के खिलाफ साझा रणनीति बनाने की कोशिश में हैं।
हालांकि गठबंधन की संभावनाएं चर्चा में हैं, लेकिन इसके सामने कई चुनौतियां भी हैं। दोनों दलों के बीच पिछले अनुभव, नेतृत्व का प्रश्न और सीटों के बंटवारे जैसे मुद्दे अहम होंगे। इसके अलावा, बसपा की रणनीति अक्सर स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ने की रही है। ऐसे में औपचारिक गठबंधन की दिशा में ठोस कदम उठाना आसान नहीं होगा। फिर भी, सपा के हालिया संकेत बताते हैं कि पार्टी संभावनाओं के दरवाजे खुले रखना चाहती है।
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Published on:
16 Feb 2026 02:56 pm
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