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क्या आजम खान के रिप्लेसमेंट हैं नसीमुद्दीन सिद्दीकी? विधानसभा चुनाव से पहले अखिलेश ने खेला सियासी दांव

सपा में सिद्दीकी की एंट्री को पश्चिमी यूपी में मुस्लिम नेतृत्व मजबूत करने की रणनीति माना जा रहा है। आजम खान की कानूनी मुश्किलों के बीच पार्टी नए चेहरे को आगे बढ़ा रही है।

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लखनऊ

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Anuj Singh

Feb 16, 2026

क्या सिद्दीकी बनेंगे मुस्लिम राजनीति का नया चेहरा?

क्या सिद्दीकी बनेंगे मुस्लिम राजनीति का नया चेहरा? Source- X

UP Politics: यूपी की राजनीति में इन दिनों एक बड़ा सवाल घूम रहा है। समाजवादी पार्टी के दिग्गज नेता आजम खान जेल में हैं। उनकी सेहत ठीक नहीं है और राजनीतिक भविष्य अनिश्चित लग रहा है। इसी बीच, पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने सपा जॉइन कर ली है। वे पश्चिमी यूपी में मजबूत मुस्लिम चेहरा माने जाते हैं, खासकर मुजफ्फरनगर, शामली और बागपत इलाके में। वहीं अब सवाल उठ रहे हैं कि क्या अखिलेश यादव ने आजम खान के 'पॉलिटिकल वैक्यूम' को भरने के लिए सिद्दीकी को पार्टी में लिया है? या यह आजम के लिए एक 'सॉफ्ट सिग्नल' है कि जेल से बाहर आने पर उनकी सीट और प्रभाव सुरक्षित रहेगा? राजनीतिक जानकार कह रहे हैं कि PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) को मजबूत करने के नाम पर मुस्लिम वोट बैंक को 'डायवर्सिफाई' किया जा रहा है। आइए इस मुद्दे को विस्तार से समझते हैं।

आजम खान की मौजूदा स्थिति और चुनौतियां

आजम खान समाजवादी पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं। वे यूपी की राजनीति में मुस्लिम समुदाय के बड़े चेहरे रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों से वे कानूनी पचड़ों में फंसे हैं। सितंबर 2025 में वे करीब दो साल बाद सीतापुर जेल से बाहर आए थे। उनके बेटे अब्दुल्ला आजम खान भी साथ रिहा हुए थे। बाहर आने पर आजम ने कहा था कि वे अपनी सेहत पर ध्यान देंगे और राजनीति पर बाद में सोचेंगे। लेकिन नवंबर 2025 में एक फर्जी पैन कार्ड मामले में उन्हें और उनके बेटे को सात साल की सजा हो गई। अब वे फिर जेल में हैं। उनकी उम्र 77 साल है और जेल में रहने से सेहत खराब हो गई है। सांप, बिच्छू वाली पुरानी कोठरी में रखे जाने की शिकायत भी उन्होंने की है। इसको देखते हुए 2027 के विधानसभा चुनाव में आजम की सक्रिय भूमिका मुश्किल लग रही है। रामपुर और मुरादाबाद जैसे इलाकों में उनका प्रभाव अब कमजोर पड़ रहा है। अखिलेश यादव ने उनकी रिहाई का स्वागत किया था और कहा था कि सपा सरकार आने पर उनके खिलाफ 'फर्जी' केस वापस लिए जाएंगे। लेकिन फिलहाल आजम का राजनीतिक भविष्य अनिश्चित है।

नसीमुद्दीन सिद्दीकी का सपा में शामिल होना

15 फरवरी को नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कांग्रेस छोड़कर समाजवादी पार्टी जॉइन कर ली। अखिलेश यादव ने लखनऊ में उनका स्वागत किया। सिद्दीकी बहुजन समाज पार्टी (BSP) के संस्थापक सदस्य थे और मायावती के करीबी माने जाते थे। वे चार बार मंत्री रहे और यूपी विधान परिषद में विपक्ष के नेता भी बने। 2017 में BSP से निकाले जाने के बाद वे 2018 में कांग्रेस में गए। लेकिन हाल ही में उन्होंने कांग्रेस छोड़ दी, क्योंकि उन्हें लगता था कि वहां उनकी अनदेखी हो रही है। सपा में शामिल होने पर सिद्दीकी ने कहा कि वे अखिलेश का बहुत सम्मान करते हैं और पार्टी को मजबूत बनाने में मदद करेंगे। उनके साथ 15 हजार से ज्यादा समर्थक और कई पूर्व विधायक भी सपा में आए। सिद्दीकी पश्चिमी यूपी के बंदा जिले से हैं और मुजफ्फरनगर-शामली-बागपत बेल्ट में उनका अच्छा प्रभाव है। वे मुस्लिम समुदाय में लोकप्रिय हैं।

क्या सिद्दीकी आजम खान के बैकअप हैं?

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि आजम खान के न होने पर सपा को एक मजबूत मुस्लिम नेता की जरूरत थी। सिद्दीकी का आना उसी कमी को पूरा कर सकता है। कई रिपोर्ट में कहा गया है कि सपा में फिलहाल आजम जैसा अनुभवी नेता मैदान में नहीं है, इसलिए सिद्दीकी जैसे बड़े मुस्लिम चेहरे का आना फायदेमंद होगा। कुछ लोग इसे आजम के 'रिप्लेसमेंट' के रूप में देख रहे हैं। लेकिन अखिलेश ने साफ कहा कि आजम उनके सम्मानित नेता हैं और उनके खिलाफ केस फर्जी हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि कि यह 'बैकअप' प्लान हो सकता है। अगर आजम की सेहत या कानूनी मुश्किलें जारी रहीं, तो सिद्दीकी पश्चिमी यूपी में मुस्लिम वोटर्स को एकजुट रख सकते हैं। लेकिन अगर आजम बाहर आए, तो सिद्दीकी उनका साथ दे सकते हैं।

राजनीतिक वैक्यूम भरने की कोशिश

आजम खान की जेल यात्रा से सपा में एक वैक्यूम पैदा हो गया है। रामपुर, मुरादाबाद जैसे मुस्लिम बहुल इलाकों में उनका जलवा था। अब सिद्दीकी का आना उस खाली जगह को भर सकता है। सिद्दीकी का बसपा बैकग्राउंड दलित-मुस्लिम गठजोड़ को भी मजबूत कर सकता है। अखिलेश की PDA रणनीति इसी पर आधारित है। PDA यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक। मीडिया से बात करते हुए सिद्दीकी ने कहा कि वे इस विचारधारा के साथ चलेंगे और 2027 में सपा सरकार बनाने में मदद करेंगे। कुछ लोग कहते हैं कि यह मुस्लिम वोट बैंक को 'डायवर्सिफाई' करने की कोशिश है। यानी एक नेता पर निर्भर न रहकर कई चेहरों को आगे करना। इससे पार्टी मजबूत होगी और बीजेपी को चुनौती मिलेगी।

मुस्लिम वोट बैंक को मजबूत करना

यूपी में मुस्लिम वोटर्स करीब 19 फीसदी हैं। सपा हमेशा उनका साथ मांगती रही है। आजम खान उस वोट बैंक के बड़े प्रतीक थे। लेकिन उनकी अनुपस्थिति से पार्टी को नुकसान हो सकता है। सिद्दीकी का आना मुस्लिम समुदाय को संदेश देता है कि सपा उनके साथ है। पश्चिमी यूपी में जहां दंगे और जातिगत तनाव रहते हैं, वहां सिद्दीकी का प्रभाव काम आएगा। कुछ विश्लेषक कहते हैं कि यह आजम के लिए 'सॉफ्ट सिग्नल' है। यानी पार्टी उन्हें नहीं भूली है, लेकिन फिलहाल दूसरे विकल्प तैयार कर रही है। BSP से आने वाले सिद्दीकी दलित वोटर्स को भी आकर्षित कर सकते हैं। कुल मिलाकर, अखिलेश की यह चाल 2027 चुनाव के लिए स्ट्रैटेजिक लगती है। लेकिन विधानसभा चुनाव से पहले सबसे बड़ा सवाल यह ही है कि क्या सिद्दीकी आजम की तरह प्रभाव पैदा कर पाएंगे?