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उत्तराखंड की बर्फ पिघलने से यूपी के 11 जिलों में भुखमरी की नौबत क्यों?

Alaknanda River Valley in Uttarakhand भारत के राज्य उत्तराखंड में अलकनंदा नदी घाटी के ग्लेशियर के तेजी से पिघलने के कारण गंगा नदी में पानी की कमी होने की संभावना अब बढ्ने लगी है। जिसका असर उत्तर प्रदेश, बिहार समेत कई राज्यों में हो सकता है। खास तौर पर उनपर इसका असर ज्यादा पड़ेगा जिनकी आजीविका नदी के पानी पर डिपेंड है। इसमें उत्तर प्रदेश के लगभग 11 जिलों में सिंचाई पर सीधा असर देखने को मिलेगा।

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लखनऊ

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Dinesh Mishra

Mar 09, 2022

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File Photo of Meting Glacier in Ganga and Alaknanda River Valley in Uttarakhand

उत्तराखंड से निकालने वाली जलधारा आगे बदलकर गंगा नदी परिवर्तित होती है, जिसका अधिकांश पानी अलकनंदा से आता है। जियोकाटरे जर्नल में प्रकाशित शोध रिपोर्ट 'इनवेंटर ऑफ ग्लेशियर्स 'के अनुसार, अलकनंदा ग्लेशियर क्षेत्र में पिछले 50 साल यानी 1968 से 2020 के दौरान 59 वर्ग किलोमीटर में फैला ग्लेशियर पिघल गया है। अलकनंदा के कुल ग्लेशियर क्षेत्र में यानी 50 साल के दौरान आठ प्रतिशत की कमी आ गयी है। ग्लेशियर क्षेत्र में कमी तभी आती है जब ग्लेशियर पिघलने की दर बर्फ बनने की दर से अधिक होती है। ग्लेशियर का क्षेत्र यहां हर साल 11.7 मीटर की दर से कम होता जा रहा है। वैज्ञानिकों का कहना है कि अगर अलकनंदा का ग्लेशियर क्षेत्र इतनी ही तेजी से कम होता रहा तो गंगा नदी में पानी की कमी हो सकती है।

वहीं उत्तर प्रदेश में गंगा किनारे बसे कुछ जिले जैसे कानपुर, कन्नौज, उन्नाव, गाजीपुर, बलिया, प्रयागराज में हालात बहुत ज्यादा खराब हैं. यहाँ लोगों की जीवनी कृषि आधारित ज़्यादातर है। जहां पानी की कमी हुई तो निश्चित तौर पर हालात में सुधार हो पाना मुश्किल हो जाएगा।

शोधकर्ताओं ने कहा कि 1968 से 2020 के बीच सर्दी के मौसम का तापमान यहां हर साल 0.03 डिग्री सेल्सियस बढ़ा, जिससे ग्लेशियर पिघलने की गति तेज हो गयी। शोधकर्ताओं ने 1968 से सभी उपग्रहीय तस्वीरों का अध्ययन करके और साइट पर जाकर यह रिपोर्ट तैयार की है। उन्होंने साथ ही यह बताया कि इस अवधि में ग्लेशियरों की संख्या भी बढ़की 98 से 116 हो गयी। हालांकि, उनका कहना है कि यह कोई खुशी की बात नहीं है। यह प्राकृतिक है। उन्होंने कहा कि ग्लेशियर एक पेड़ की तरह होता है और उससे कई शाखायें निकलती हैं। अलकनंदा में भी ऐसा ही हुआ है और इसकी वजह जलवायु है।

गौरतलब है कि गत साल भी नेचर में प्रकाशित एक शोध रिपोर्ट में तेजी से पिघलते ग्लेशियरों का भारतीय नदियों पर पड़ने वाले असर की चर्चा की गयी थी। शोध में कहा गया था कि 2000 से 2019 के बीच ग्रीन लैंड और अंटार्कटिक को छोड़कर अन्य ग्लेशियर में 267 गीगाटन बर्फ पिघला। रिपोर्ट में कहा गया कि अलास्का, अइसलैंड और आल्पस में सबसे तेजी से ग्लेशियर पिघले लेकिन हिंदुकुश और हिमालय में भी स्थिति खराब है।

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