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चुनाव का लेखा जोखा, फर्स्ट डिवीज़न आने के लिए तरसते रहे सूबे के नगर निगम

तीनों चरणों में नगर निगम में केवल 41.26 प्रतिशत वोटिंग हुई, तो वहीं नगर पंचायत में 68.30 प्रतिशत लोगों ने मतदान किया।

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लखनऊ

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Dikshant Sharma

Nov 29, 2017

up nikay chunav

लखनऊ. सूबे में नगर निकाय चुनाव खत्म हो चुके हैं अब इंतजार है चुनाव परिणाम का। फिलहाल परिणाम कुछ भी हो लेकिन एक बात स्पष्ट है कि सूबे का कोई भी नगर निगम फर्स्ट डिवीजन नहीं आ सका। किसी भी निगम में मतदान प्रतिशत 60 के ऊपर नहीं जा सका। चुनाव आयोग से लेकर तमाम एनजीओ लगातार मतदान करने की अपील करते रहे लेकिन नतीजे सिफर ही रहें। खास बात यह रही कि जिन नगर निगमों में कांटे की टक्कर बताई जा रही थी उन्ही निगमों में सबसे कम मतदान हुए हैं। गोरखपुर में 39.23 तो राजधानी लखनऊ में 39.99 प्रतिशत वोट डले।

चुनाव एक नज़र में

कुल प्रथम चरण -कुल द्वितीय चरण -कुल तृतीय चरण - कुल मतदान %
52.59 - 49.3 - 56.77 - 52.47

पहले चरण में 52.59 प्रतिशत वोट पड़े, दूसरे में 49.3 और तीसरे में 56.7 प्रतिशत मतदान हुआ। दूसरा चरण सबसे सुस्त नज़र आया जबकि सबसे अधिक मतदान तीसरे चरण में हुआ।तीनों चरणों में नगर निगम में केवल 41.26 प्रतिशत वोटिंग हुई, तो वहीं नगर पंचायत में 68.30 प्रतिशत लोगों ने मतदान किया।


लोकसभा 2014 में लखनऊ सीट का क्षेत्र कम था। फिर भी उस चुनाव में 53.02 प्रतिशत वोट पड़े थे। विधानसभा चुनाव में भी वोट प्रतिशत अधिक रहा था। बढ़ते वोट प्रतिशत के मद्देनज़र जानकारों में चर्चा थी कि इसका सीधा फायदा भारतीय जनता पार्टी को मिलेगा और ऐसा हुआ भी। लेकिन इस बार 16 जिलों में छिड़ी महापौर की जंग में कम मतदान प्रतिशत सभी राजनीतिक दलों की चिंता बढ़ा रहा है। कम मतदान प्रतिशत होने से नतीजे अक्सर सत्ता धारी पार्टी के पक्ष में जाने की बात मानी जाती है। लेकिन चिंता का विषय जनता के बीच निकाय चुनाव का घटता महत्व है। जबकि वहीँ ग्रामीण क्षेत्रों में वोट प्रतिशत 69.59 तक गया।

इन निगमों में सबसे कम पड़े वोट

गोरखपुर- 39.23
लखनऊ- 39.99
आगरा-43.36
वाराणसी- 44.39
कानपुर- 44.92

क्या है वजह

राजनीतिक शास्त्र के प्रोफेसर कविराज ने कहा कि शहरी क्षेत्र में कम मतदान होना ये दर्शाता है कि शहरी लोग निकाय चुनावों को महत्वपूर्ण नहीं समझते। शहरी लोग अपने विचार और प्रतिक्रियां देते हैं लेकिन वोट नहीं। इसका एक कारण ये भी है कि जनता के बीच उदासीनता है। अधिकतर पार्षद जीत के बाद उनही क्षेत्रों में काम कराते हैं जहां उनके वोट पक्के होते हैं। इसलिए लोग बजाए बहार जाने के छुट्टी के दिन घर ही में रहना पसंद करते हैं।

पोलिटिकल एक्सपर्ट रूद्र प्रताप कहते हैं कि देश के अन्य राज्यों में महापौर के पास काफी अधिकार होते हैं। लेकिन प्रदेश में ऐसा नहीं है। यह भी एक कारण है कि मेयर का चुनाव करना शायद जनता महत्वपूर्ण निर्णय जैसा नहीं समझती।

वरिष्ठ पत्रकार बृजेश शुक्ल कहते हैं कि पार्षद या महापौर पद के लिए टिकट अक्सर पार्टी नेताओं के करीबियों को मिल जाता है। इस चुनाव में भी ये देखने को मिला था। इस कारण पार्टी कार्यकर्त्ता बाहर ही नहीं निकलते। राजनीतिक दलों को ये चुनौती के रूप में देखना होगा। कम वोट प्रतिशत लोकतंत्र के प्रति खोता विश्वास दर्शाता है।