
उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने महत्वपूर्ण फैसला लिया है। इलाहाबाद हाईकोर्ट और लखनऊ बेंच में सरकार की तरफ से पैरवी अब विशेष अधिवक्ता नहीं कर पाएंगे। सरकार ने लंबे समय से चली आ रही परंपरा पर रोक लगा दी है। न्यायालयों में अब सरकारी वकील ही सरकार का पक्ष रखेंगे। हालांकि विशेष परिस्थितियों में छूट दी गई है।
राज्य के महाधिवक्ता अजय मिश्रा ने शासन को प्राइवेट वकीलों की नियुक्ति के बार में बताया था। उन्होंने लेटर लिख जानकारी दी थी कि कई सरकारी विभाग और एजेंसियां प्राइवेट वकील रख रही हैं। छोटे मामलों के लिए भी लाखों में फीस दी जा रही है। इससे सरकारी खजाने पर पर भार पड़ रहा है। साथ ही पहले से नियुक्त सरकारी वकीलों का भरोसा गिरता जा रहा है।
प्रति पेशी की फीस पांच लाख रुपए
लेटर में आगे कहा गया कि सरकारी विभाग और एजेंसियां बिना कोई कारण बताए वकील नियुक्त कर रही हैं। विशेष अधिवक्ता की फीस करीब पांच लाख रुपए प्रति पेशी के हिसाब से दी जा रही है।
अगर महीने में तीन पेशी होती हैं तो विशेष अधिवक्ता को 15 लाख रुपए की फीस दी जाएगी। अगर किसी मुकदमें में कई पेशियां हुईं तो बजट बढ़ता चला जाता है। इस तरह से सरकारी खजाने पर भार बढ़ता चला जाता है।
महाधिवक्ता के लेटर पर शासनादेश जारी
यूपी सरकार को महाधिवक्ता अजय मिश्रा ने 13 दिसंबर को लेटर लिखा था। इसके आधार पर ही शासनादेश (गवर्नमेंट ऑर्डर) जारी कर दिया है। 16 दिसंबर को शासनादेश जारी हुआ था। विशेष सचिव न्याय इंद्रजीत सिंह ने शासनादेश जारी किया है। इसमें बताया गया है कि पैरवी के लिए पहले से तैनात सरकारी वकील को ही मुकदमों में लगाया जाए। इसके अलावा अगर विशेष परिस्थितियों में किसी विशेष अधिवक्ता को पैरवी के लिए तैनात किया जाता है तो तथ्यों के साथ महाधिवक्ता को बताया जाएगा।
Published on:
18 Dec 2022 06:01 pm
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