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Weather: जलवायु परिवर्तन ने पश्चिमी विक्षोभ के चक्र को किया डिस्टर्ब, बेमौसम हो रही बारिश; नहीं हुए सावधान तो आएगी तबाही

2021 में उत्तराखंड के औली में राष्ट्रीय सीनियर अल्पाइन स्कीइंग एंड स्नोबोर्ड चैंपियनशिप का आयोजन होना था, लेकिन रद्द कर दिया गया। क्योंकि औली में दिसंबर से लेकर फरवरी तक जहां बर्फ गिरती थी वहां बर्फबारी हुई ही नहीं। अप्रैल-मई के महीने में बरसात, आंधी आखिर पर्यावरण का इशारा क्या है?

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पश्चिमी विक्षोभ

Weather: आप नार्थ ईस्ट में शिलांग गए हों तो वहां घरों में सिलिंग फैन की जरूरत लोगों को नहीं पड़ती थी। यहां तक कि वे घर बनवाते समय सिलिंग फैन लगवाना है, यह जानते ही नहीं थे। लेकिन अब वहां पर घरों में पंखे, कूलर तो चलते ही हैं, होटलों में भी AC लगने लगे हैं।

यही हाल पर्वतीय इलाकों का है जहां अब गर्मी दूर करने वाले सामान तेजी से बिक रहे हैं । यहां तक कि लद्दाख, कश्मीर और उत्तराखंड के पहाड़ों पर जहां मच्छरदानी का नाम लोग नहीं जानते थे, वहां भी मच्छर लगने लगे हैं। डेंगू या मष्तिक ज्वार जैसी बिमारियां जिनका नाम भी पहाड़ी लोग नहीं सुने थे अब वे भी पहाड़ों पर मच्छरों की तादात बढऩे के साथ दस्तक देने लगी हैं।
कुछ दिन पहले लखनऊ शहर में फिर तेदूंवा घुस आया। वन विभाग के कर्मचारी उसे खोजने में लग गए। यह पहली घटना नहीं है, जब वन्य जीव रिहायशी इलाकों में घुसने लगे हैं। यह सामान्य बात लगती है जब ठंढ के दिनों में कोहरे के कारण रास्ता भटक कर या अपने झुण्ड से बिछडक़र वन्य जीव रिहायशी इलाकों में चले आते हैं।

शहरी इलाकों में वन्य जीवों का आना सामान्य मान भी लें तो मैदानी इलाकों में रहने वाले जीव अब पहाड़ों पर नजर आने लगे हैं। अधिकांश मैदानी इलाकों में रहने वाले लंगूर अब केदारनाथ की चोटियों पर भी दिखने लगे हैं, तो वहीं अमरकंटक की पहाडिय़ों पर वन्यजीव अपना बसेरा बनाने लगे हैं।

धीरे-धीरे मैदानी इलाकों से पेड़ गायब हो रहे हैं। आखिर हमारे पेड़ कहां गायब हो रहे हैं? सरकारी कागजों पर जितनी वन भूमि मौजूद हैं उसकी हकीकत क्या है? वन भूमि क्या बंजर हो चुकी है या अतिक्रमण करके रिहायशी इलाके विकसित कर लिए गए हैं? करीब चार दशक पहले के आंकड़ों के अनुसार देश में प्रति वर्ष 13 लाख हेक्टेयर वन क्षेत्र के गायब होने की रिर्पोट जारी हुई थी।

जिसके बाद भारत सरकार ने भारतीय वन सर्वेक्षण विभाग को कहा कि वह प्रत्येक दो साल पर भारतीय हरित सम्पदा का सर्वेक्षण रिर्पोट जारी करे। वन सर्वेक्षण से न केवल वन सम्पदा की जानकारी मिलती है इससे एक बड़ी आबादी के आजीविका, आर्थिक प्रगति और पर्यावरण की भी जानकारी हासिल होती है। लगातार बदलते मौसम के मूड में जहां वन स्थिति जिम्मेदार है तो वहीं हमारी जीवन शैली से लेकर सरकारी नीतियां काफी हद तक जिम्मेदार हैं।
हिमालयी क्षेत्रों में खिलने वाले मौसमी फूल अब दुर्लभ होते जा रहे हैं। इन फूलों और जड़ी बूटियों से न केवल वहां की अर्थव्यवस्था चलती थी बल्कि पहाड़ी लोकरंग में इन वनोत्पादों का महत्व हुआ करता था। जैसे बुरांश के फूल उत्तराखंड, कश्मीर और हिमांचल की पहाडिय़ों पर मार्च अप्रैल में खिलते थे अब वे सर्दियों के दिनों में ही होने लगे हैं। जिनके जूस, चटनी और कुछ बिमारियों में दवा के रुप में इस्तेमाल किया जाता है।

तो वहीं, उत्तराखंड के गढ़वाल में इन फूलों के खिलने पर थडया चौफला नृत्य हुआ करता है। जैसे-जैसे मौसम को बुखार चढ़ रहा है, पर्यावरण के रंग विलुप्त होते जा रहे हैं। पहाड़ों में भूस्खलन से लेकर, अप्राकृतिक बरसात और अचानक बाढ़ का आना आम बात होता जा रहा है। उत्तराखंड में आए साल 2013 की त्रासदी के बाद लगभग प्रत्येक वर्ष ऐसी घटनाएं बढ़ती देखी जा रही है।

गत वर्ष चमोली में बढते तापमान के कारण बर्फ पिघल कर एक जगह इकटठा हुआ और बाद में एक पहाड़ टूटकर उसमें गिरा जिसके बाद पानी छलक कर बाहर निकला और कई गांवों को अपनी चपेट में ले लिया।
भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के आंकड़ों पर गौर करें तो साल दर साल पहाड़ी इलाकों में तापमान में बढ़ोत्तरी हो रही है। पहाड़ों से पलायन के सबसे बड़े कारणों में रोजगार और खेती का खत्म होते जाना है। मौसमी बदलावों के चलते यहां पर फसल चक्र प्रभावित हुआ है।

जिसके कारण विभिन्न पर्वतीय राज्यों में अनियमित बरसात के कारण फसलों में अज्ञात बिमारियां पैदा होने लगी है और किसानों को पहली बार कीटनाशकों का प्रयोग करना पड़ रहा है। मैदानी इलाकों में बरसात की अनियमितता के चलते टयूबवेल, पंप और नहरों से सिंचाई हो जाती है लेकिन पहाड़ आज भी पूरी तरह बरसाती पानी पर निर्भर है।

मैदानी इलाकों की सेहत का थर्मामीटर पहाड़
पिछले साल पूर्वी प्रशांत महासागर में सतह पर हवा का दबाव कम होने से ला-नीना तूफान बना था, जिसके कारण दुनियां भर में तापमान में गिरावट की स्थिति बनी। भारत में भी साल 2021 में जनवरी और फरवरी में माह में शीतलहर की तेजी देखी गई थी। लेकिन उसके बाद से तापमान में बेलगाम उछाल देखा जा रहा है।

हालत यह है कि साल 2022 में शीत के बाद आने वाला वसंत (स्प्रिंग) लापता हो गया, अचानक से तापमान फरवरी के अंतिम सप्ताह में ही रफ्तार पकड़ लिया। मई-जून में पडऩे वाली गर्मी मार्च में ही हाजिर हो गई। अप्रैल के शुरुआती महीनों में मध्यप्रदेश के अमरकंटक और पंचमढ़ी जैसे इलाकों में जहां बारह महीने मौसम ठंढा रहा करता था, वहां भी मार्च में ही एसी चलाने की नौबत आ गई।

मध्यप्रदेश के जंगलों में ज्यादातर चीड़ के पेड़ जो मैदानी इलाकों में होते थे वे अब मौसमी घटनाओं के चलते ऊंचाई पर भी दिखने लगे हैं कारण कि उनको वहां भी गर्मी मिलने लगी है। मैदानी इलाकों की सेहत का थर्मामीटर हमारे पहाड़ हैं। ग्र्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के लिए मैदानी इलाकें 88 फीसद जिम्मेदार हैं।

पश्चिमी विक्षोभ या जलवायु परिवर्तन ?
पिछले तीन साल की गर्मियों को देखें तो मौसम सामान्य नहीं रहा है। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार देश के नार्थ-वेस्ट हिस्से में 30 फीसद बरसात सर्दियों में होती है जिसमें 80 फीसद से अधिक कमी देखी गई। सारे रिकार्ड तोड़ते हुए 1901 के बाद पहली बार फरवरी सबसे गर्म महीना रहा।

पश्चिमी विक्षोभा के बदलते चरित्र के कारण मौसमी बदलाव कहा जा रहा है जिसका सीधा संबंध जलवायु परिवर्तन से है। विक्षोभ के कारण मैडिटेरियन क्षेत्र में तूफानों की श्रृंखला पैदा हो जाती है। जो भारत में सर्दियों में बरसात लाने के लिए 9,000 किलोमीटर की यात्रा करते हैं। जिसके कारण रबी की फसल उगने, हिमालय में बर्फ लाने और नदियों के प्रवाह को बनाए रखने में मदद होती है।

पाकिस्तान का गेहूं आटा संकट
पश्चिमी विक्षोभ अपने 9,000 किलोमीटर की यात्रा में काला सागर, भूमध्य सागर और कैस्पियन सागर से नमी उठाते हुए आगे बढ़ता है। मजबूत पश्चिमी विक्षोभ पूर्वी हिमालय से टकरा कर बरसात करते हैं। टकराने से पहले ठंढ़ी हवाएं आती है, जो भारत में तापमान को नियंत्रित करने में मदद करती है।

यही कारण है कि इस बार शीत लहर का प्रकोप अधिक देखा गया। 20 फरवरी को गुजरात और राजस्थान के कुछ हिस्सों में अधिकतम तापमान 39 डिग्री तक पहुंच गया जिसकी वजह से भारतीय मौसम विभाग को एडवाईजरी जारी करनी पड़ी थी।

इतने अधिक तामपान में गेहूं में फूल आने से लेकर फसल पकने तापमान ज्यादा होने पर पैदावार में कमी आ जाती है। पिछली बार कमजोर पश्चिमी विक्षोभ के कारण हरियाणा, पंजाब, हिमाचल, मध्यप्रदेश और यूपी में मार्च में ही तापमान बढ़ गया और फसल का उत्पादन प्रभावित हुआ। जिसके कारण केंद्र सरकार को गेहूं के निर्यात पर प्रतिबंध लगाना पड़ा। कमोबेश यही कारण पाकिस्तान में रहा जिसके कारण उनके यहां गेहूं आटे का संकट खड़ा हो गया।

जलवायु परिवर्तन का संकट
पश्चिमी विक्षोभ कोई नई बात नहीं है। यह प्रत्येक साल ही आता है जो कई मायनों में पर्यावरण के लिए काफी फायदेमंद साबित होता है। लेकिन असली समस्या इसके अनियमितता को लेकर है, जब यह अप्रैल-मई के महीनों में शुरु हो गया है। इसके पीछे दुनियां भर में जलवायु परिवर्तन, ग्रीन हाउस गैसों में बढोत्तरी और गर्म होती पृथ्वी सहित पिघलते ग्लेशियर जिम्मेदार है। यदि दुनिया ने अपनी आदतें नहीं बदली तो संकट और भी गहरे होंगे।