इन जिलों में है ज्यादा प्रभाव
उत्तर प्रदेश में कुर्मी जाति संत कबीर नगर, मिर्जापुर, सोनभद्र, बरेली, उन्नाव, जालौन, फतेहपुर, प्रतापगढ़, कौशांबी, इलाहाबाद, सीतापुर, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थ नगर, बस्ती और सेंट्रल यूपी में कानपुर,अकबरपुर, एटा,बरेली और लखीमपुर जिलों में बहुतायत पाए जाते हैं। यहां पिछड़ों में यादवों के बाद सबसे बड़ी संख्या कुर्मियों की है।
बिखरे वोटों को सहेजने की जंग
पूर्वांचल और सेंट्रल यूपी की कुछ विधानसभा सीटों पर निर्विवाद रूप से अपना दल का अब तक वर्चस्व रहा है। लेकिन, अपना दल के दो फाड़ होने के बाद कुर्मी वोट तेजी से बिखर रहा है। यही एक बड़ी वजह है कि कुर्मी मतों को अपने पाले में करने की होड़ मची है। कुर्मी वोटों की खातिर ही कांग्रेस से बेनी प्रसाद वर्मा की समाजवादी पार्टी में वापसी हुई है। बेनी बाबू का बाराबंकी,फैजाबाद और बहराइच में आज भी अच्छा खासा प्रभाव है। प्रदेश के अन्य जिलों में बेनी के नाम पर कुर्मी वोटर समाजवादियों की साइकिल पर चढ़ते हैं या नहीं यह तो आने वाला वक्त बताएगा। लेकिन, अपना दल की टूट का फायदा उठाने में कोई भी दल पीछे नहीं है। कुर्मी के अलावा लोध या लोधी मतदाता रामपुर, ज्योतिबा फुले नगर, बुलंदशहर, अलीगढ़, महामाया नगर, आगरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, उन्नाव, शाहजहांपुर, हरदोई, फर्रुखाबाद, इटावा, औरैया, कन्नौज, कानपुर, जालौन, झांसी, ललितपुर, हमीरपुर और महोबा जिलों में 5 से 10 फीसदी तक हैं। कमोबेश यह भी किसान जाति है। इन दोनों जातियों को सहेजने के लिए ही राजनीतिक दलों में जंग छिड़ी है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल कुर्मी किसको मानें अपना नेता
बात यही खत्म नहीं होती। पूरे प्रदेश की कुर्मी जाति का विशख्ेषण करें तो पता चलता है कि कुर्मी जाति कई वर्गों में बंटी है। इसलिए कुर्मियों का कोई एक क्षत्रप हो ही नहीं सकता। मसलन, रुहेलखंड में गंगवार कुर्मी हैं। संतोष गंगवार इनकी फसल काटते रहे हैं। कानपुर मंडल के कुर्मी कटियार और सचान हैं। यहां भाजपा की बड़ी नेता प्रेमलता कटियार हुआ करती थीं। इलाहाबाद मंडल की बात करें तो यहां कुर्मी पटेल हो जाते हैं। कभी कांग्रेस के दिग्गज नेता रामपूजन पटेल और बाद कि दिनों में अपना दल के नेता सोनेलाल पटेल यहां के कुर्मी मतदाताओं की रहनुमाई करते रहे हैं। इधर, फैजाबाद मंडल में कुर्मी वर्मा हो जाते हैं। कभी बसपा के रामलखन वर्मा और सपा के बेनी प्रसाद इनके बड़े नेता माने जाते रहे। तो पूर्वांचल में ओमप्रकाश सिंह और कांग्रेस के आरपीएन सिंह जैसे नेताओं के पीछे कुर्मी वोटर खड़े होते रहे हैं। बुंदेलखंड में उत्तम और निरंजन कुर्मी मतों का बंटवारा करते रहे हैं। इस तरह पूरे प्रदेश में कुर्मियों का एक नेता चुनना मेढकों को तौलने जैसा है। फिर भी यदि सभी दलों में सबसे बड़ा कुर्मी नेता बनने की होड़ लगी है। देखना होगा अपना दल का भाजपा में विलय कराकर अनुप्रिया पटेल के नाम पर पार्टी कितना फायदा उठा पाती है।