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यूपी में कुर्मियों का सबसे बड़ा नेता कौन? 

आखिर भाजपा अनुप्रिया को क्यों दे रही इतनी तवज्जो 

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Mahendra Pratap Singh

Jul 05, 2016

Anupriya Patel

Anupriya Patel

टिप्पणी/महेंद्र प्रताप सिंह

लखनऊ. उत्तर प्रदेश में कुर्मियों का सबसे बड़ा नेता कौन है? इन दिनों इसी बात को लेकर यहां की राजनीति में जंग छिड़ी है। कुर्मी मतों को अपने पक्ष में करने के लिए समाजवादी पार्टी ने हाल ही में कांग्रेस से बेनी प्रसाद वर्मा की घर वापसी करायी है। उन्हें राज्यसभा भी भेजा है। कांग्रेस में पूर्व केंद्रीय मंत्री आरपीएन सिंह और बसपा में लाल जी वर्मा कुर्मी नेता हैं। भाजपा में तो कुर्मी नेताओं की लंबी फौज मौजूद है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष ओम प्रकाश सिंह, स्वतंत्र देव सिंह, केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार, पूर्व सासंद और बजरंग दल नेता विनय कटियार। ये सब के सब कुर्मी जाति नेता हैं। लेकिन, लगता है इनकी जातीय पकड़ अब कमजोर हो चुकी है। शायद, इसीलिए भाजपा अब दूसरे दलों के कुर्मी नेताओं को अपने दल में शामिल कराने की फिराक में है। अपना दल सांसद अनुप्रिया पटेल पर अमित शाह की मेहरबानी इसी कड़ी का एक हिस्सा है। यह देखना दिलचस्प होगा कि कुर्मी किंग कौन बनता है?
Vinay Katiyar
उप्र की ३२ सीटों पर कुर्मियों का दबदबा
उप्र के जातीय ब्लू प्रिंट पर नजर डालें तो पूर्वांचल और सेंट्रल यूपी की करीब ३२ विधानसभा सीटें और आठ लोकसभा सीटें ऐसी हैं जिन पर कुर्मी, पटेल, वर्मा और कटियार मतदाता चुनावों में निर्णायक भूमिका निभाते रहे हैं। पूर्वांचल के कम से कम 16 जिलों में कहीं ८ तो कहीं १२ प्रतिशत कुर्मी वोटर राजनीतिक समीकरण बदलने की हैसियत रखते हैं। कानपुर, कानपुर देहात और आसपास के क्षेत्रों में कटियार और वर्मा खेती के साथ-साथ राजनीति में अच्छी हैसियत रखते हैं। राम स्वरूप वर्मा के बाद यही के रहने वाले अपना दल के संस्थापक सोने लाल पटेल राजनीति के नक्षत्र पर तेजी से चमके थे। उन्होंने तो पार्टी की बुनियाद ही कुर्मी मतों के बल पर डाली थी। उनकी असमय मृत्यु के बाद उनकी पत्नी कृष्णा पटेल और बेटी अनुप्रिया पटेल ने पार्टी को आगे बढ़ाया। विधानसभा और लोकसभा में अपने प्रत्याशियों की जीत दर्ज कर अपना दल की अहमियत को साबित भी किया। लेकिन राजनीतिक महत्वाकांक्षा व वर्चस्व की लड़ाई में आखिरकर अपना दल दो फाड़ होकर अपनी सांसे गिन रहा है।
इन जिलों में है ज्यादा प्रभाव
उत्तर प्रदेश में कुर्मी जाति संत कबीर नगर, मिर्जापुर, सोनभद्र, बरेली, उन्नाव, जालौन, फतेहपुर, प्रतापगढ़, कौशांबी, इलाहाबाद, सीतापुर, बहराइच, श्रावस्ती, बलरामपुर, सिद्धार्थ नगर, बस्ती और सेंट्रल यूपी में कानपुर,अकबरपुर, एटा,बरेली और लखीमपुर जिलों में बहुतायत पाए जाते हैं। यहां पिछड़ों में यादवों के बाद सबसे बड़ी संख्या कुर्मियों की है।
Santosh Gangwar
बिखरे वोटों को सहेजने की जंग
पूर्वांचल और सेंट्रल यूपी की कुछ विधानसभा सीटों पर निर्विवाद रूप से अपना दल का अब तक वर्चस्व रहा है। लेकिन, अपना दल के दो फाड़ होने के बाद कुर्मी वोट तेजी से बिखर रहा है। यही एक बड़ी वजह है कि कुर्मी मतों को अपने पाले में करने की होड़ मची है। कुर्मी वोटों की खातिर ही कांग्रेस से बेनी प्रसाद वर्मा की समाजवादी पार्टी में वापसी हुई है। बेनी बाबू का बाराबंकी,फैजाबाद और बहराइच में आज भी अच्छा खासा प्रभाव है। प्रदेश के अन्य जिलों में बेनी के नाम पर कुर्मी वोटर समाजवादियों की साइकिल पर चढ़ते हैं या नहीं यह तो आने वाला वक्त बताएगा। लेकिन, अपना दल की टूट का फायदा उठाने में कोई भी दल पीछे नहीं है। कुर्मी के अलावा लोध या लोधी मतदाता रामपुर, ज्योतिबा फुले नगर, बुलंदशहर, अलीगढ़, महामाया नगर, आगरा, फिरोजाबाद, मैनपुरी, पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, उन्नाव, शाहजहांपुर, हरदोई, फर्रुखाबाद, इटावा, औरैया, कन्नौज, कानपुर, जालौन, झांसी, ललितपुर, हमीरपुर और महोबा जिलों में 5 से 10 फीसदी तक हैं। कमोबेश यह भी किसान जाति है। इन दोनों जातियों को सहेजने के लिए ही राजनीतिक दलों में जंग छिड़ी है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल कुर्मी किसको मानें अपना नेता
बात यही खत्म नहीं होती। पूरे प्रदेश की कुर्मी जाति का विशख्ेषण करें तो पता चलता है कि कुर्मी जाति कई वर्गों में बंटी है। इसलिए कुर्मियों का कोई एक क्षत्रप हो ही नहीं सकता। मसलन, रुहेलखंड में गंगवार कुर्मी हैं। संतोष गंगवार इनकी फसल काटते रहे हैं। कानपुर मंडल के कुर्मी कटियार और सचान हैं। यहां भाजपा की बड़ी नेता प्रेमलता कटियार हुआ करती थीं। इलाहाबाद मंडल की बात करें तो यहां कुर्मी पटेल हो जाते हैं। कभी कांग्रेस के दिग्गज नेता रामपूजन पटेल और बाद कि दिनों में अपना दल के नेता सोनेलाल पटेल यहां के कुर्मी मतदाताओं की रहनुमाई करते रहे हैं। इधर, फैजाबाद मंडल में कुर्मी वर्मा हो जाते हैं। कभी बसपा के रामलखन वर्मा और सपा के बेनी प्रसाद इनके बड़े नेता माने जाते रहे। तो पूर्वांचल में ओमप्रकाश सिंह और कांग्रेस के आरपीएन सिंह जैसे नेताओं के पीछे कुर्मी वोटर खड़े होते रहे हैं। बुंदेलखंड में उत्तम और निरंजन कुर्मी मतों का बंटवारा करते रहे हैं। इस तरह पूरे प्रदेश में कुर्मियों का एक नेता चुनना मेढकों को तौलने जैसा है। फिर भी यदि सभी दलों में सबसे बड़ा कुर्मी नेता बनने की होड़ लगी है। देखना होगा अपना दल का भाजपा में विलय कराकर अनुप्रिया पटेल के नाम पर पार्टी कितना फायदा उठा पाती है।