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भारत में कहां छिपा है सबसे ज्यादा सोना? आखिर कैसे निकलता है सोना, किन राज्यों में हैं सबसे बड़े भंडार?

Gold Mines In India : जानिए भारत में सोने के खनन का इतिहास, देश की पहली बड़ी खदान (KGF) की कहानी, वर्तमान में सबसे ज्यादा सोना किन राज्यों में मिलता है और जमीन से शुद्ध सोना निकालने की पूरी वैज्ञानिक प्रक्रिया क्या है।
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Gold mines in India : जानें खदानों से कैसे निकाला जाता है सोना, PC- Patrika

भारत में सोने का रिश्ता सिर्फ आभूषण या निवेश तक सीमित नहीं है। यह देश हजारों साल पुरानी खनन परंपरा भी अपने भीतर समेटे हुए है। दिलचस्प विरोधाभास यह है कि भारत दुनिया के सबसे बड़े सोना उपभोक्ता देशों में गिना जाता है, लेकिन अपनी घरेलू ज़रूरत का ज़्यादातर सोना विदेशों से आयात करता है। घरेलू उत्पादन सीमित ज़रूर है, पर कुछ राज्यों में आज भी खदानें सक्रिय हैं, और नए भंडारों की खोज लगातार जारी है। आइए विस्तार से समझते हैं कि भारत की पहली बड़ी सोने की खदान कहां थी, आज सबसे ज़्यादा सोना कहां मिलता है, और आख़िर ज़मीन से सोना निकलता कैसे है।

भारत की पहली बड़ी सोने की खदान कहां थी?

जब भी भारत में आधुनिक स्वर्ण खनन की बात होती है, सबसे पहला नाम आता है कर्नाटक के कोलार गोल्ड फील्ड्स (KGF) का। 1880 के दशक में यहां बड़े पैमाने पर आधुनिक खनन शुरू हुआ, और इसके बाद के करीब 120 वर्षों तक यह भारत की सबसे मशहूर सोने की खदान बनी रही। इस दौरान यहां से लगभग 800 से 900 टन तक सोना निकाला गया। विभिन्न स्रोतों में यह आंकड़ा थोड़ा अलग-अलग मिलता है, पर मोटे तौर पर यह मान सकते हैं कि यह भारत की अब तक की सबसे बड़ी सोना-उत्पादक खदान रही। एक समय यह दुनिया की सबसे गहरी सोने की खदानों में गिनी जाती थी, जहां ज़मीन के भीतर हजारों मीटर गहराई तक सुरंगें बनाई गई थीं। बढ़ती लागत और घटते उत्पादन के चलते 28 फरवरी 2001 को इसे आख़िरकार बंद कर दिया गया।

हालांकि पुरातात्विक साक्ष्य बताते हैं कि दक्षिण भारत के हुत्ती, कोलार और रामगिरि क्षेत्रों में प्राचीन काल से ही सोने का खनन होता आया है। कुछ अध्ययनों के मुताबिक भारत में सोना निकालने की परंपरा 2,000 साल से भी ज्यादा पुरानी है। यानी KGF की कहानी शुरू होने से बहुत पहले से यहां के लोग सोना खोजना और निकालना जानते थे।

भारत में सबसे ज्यादा सोना किन राज्यों में मिलता है?

यहां एक जरूरी बात समझनी होगी। सोने का 'भंडार' (Reserve) और सोने का 'उत्पादन' (Production) दोनों अलग-अलग चीजें हैं। भंडार का मतलब है जमीन के नीचे मौजूद कच्चा अयस्क, जबकि उत्पादन का मतलब है जो सोना असल में खोदकर निकाला जा चुका है। उत्पादन के मामले में कर्नाटक निर्विवाद रूप से नंबर एक है। देश के कुल स्वर्ण उत्पादन का 80 प्रतिशत से ज़्यादा हिस्सा अकेले इसी राज्य से आता है। लेकिन, भंडार के लिहाज से तस्वीर थोड़ी अलग है। हाल की रिपोर्टों के अनुसार बिहार और राजस्थान में भी बड़े अनुमानित भंडार मौजूद हैं, भले ही वहां अभी बड़े पैमाने पर खनन शुरू नहीं हुआ हो।

कर्नाटक : भारत का गोल्ड कैपिटल

कर्नाटक को यूं ही "भारत का गोल्ड कैपिटल" नहीं कहा जाता। रायचूर जिले की हुत्ती गोल्ड माइंस आज भारत की एकमात्र प्रमुख सक्रिय स्वर्ण खदान है, जहां अब भी बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। कोलार गोल्ड फील्ड्स और धारवाड़ बेल्ट भी इतिहास में स्वर्ण खनन के लिए प्रसिद्ध रहे हैं। KGF भले ही 2001 में बंद हो गई हो, पर कर्नाटक आज भी देश के स्वर्ण उत्पादन में सबसे बड़ा योगदान देता है।

आंध्र प्रदेश : आंध्र प्रदेश भारत के सबसे पुराने और महत्वपूर्ण स्वर्ण क्षेत्रों में गिना जाता है। अनंतपुर जिले का रामगिरि गोल्ड फील्ड्स यहां से हर साल लगभग 700 किलो सोना देता है। इसके अलावा कुरनूल जिले के जोन्नागिरी क्षेत्र में भी हाल में एक बड़ा भंडार मिला है, जहां लगभग 50 टन सोने का अनुमान लगाया गया है और खनन शुरू भी हो चुका है। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में जोन्नागिरी परियोजना आंध्र प्रदेश को स्वर्ण उत्पादन में और आगे ले जा सकती है।

झारखंड : खनिज संपदा से समृद्ध झारखंड में भी सोने के संभावित भंडार मौजूद हैं। सिंहभूम बेल्ट से देश के कुल सोने का करीब 11 प्रतिशत हिस्सा आता है, हालांकि यहां अभी बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उत्पादन शुरू नहीं हुआ है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (GSI) और अन्य एजेंसियां यहां लगातार खोज और सर्वेक्षण का काम कर रही हैं।

राजस्थान : राजस्थान की पहचान आमतौर पर तांबा, जस्ता और संगमरमर जैसे खनिजों से रही है, लेकिन हाल के वर्षों में बांसवाड़ा, उदयपुर और भीलवाड़ा जिलों में सोने के महत्वपूर्ण भंडार भी पहचाने गए हैं। दिलचस्प बात यह है कि भंडार के लिहाज़ से राजस्थान देश के अग्रणी राज्यों में गिना जाता है, हालांकि व्यावसायिक उत्पादन अभी उतने बड़े पैमाने पर शुरू नहीं हुआ है।

छत्तीसगढ़ : छत्तीसगढ़ का सोनाखान क्षेत्र लंबे समय से सोने के भंडारों के लिए जाना जाता रहा है। यहां भी कई जगह स्वर्ण खनिजों की मौजूदगी दर्ज की गई है और भविष्य में खनन की संभावनाओं पर लगातार अध्ययन जारी है।

इनके अलावा बिहार का भी ज़िक्र ज़रूरी है। हालांकि वहां अभी वाणिज्यिक खनन शुरू नहीं हुआ, पर अनुमानित अयस्क भंडार के लिहाज़ से बिहार को देश में शीर्ष स्थान पर बताया जाता है। यानी भविष्य में अगर वहां खनन शुरू होता है, तो देश का स्वर्ण मानचित्र काफी बदल सकता है।

आखिर जमीन से सोना निकलता कैसे है?

फिल्मों में अक्सर सोने की बड़ी-बड़ी चमकदार डलियां दिखाई जाती हैं, लेकिन असल प्रक्रिया इससे बिल्कुल अलग और कहीं ज़्यादा जटिल है। ज़्यादातर मामलों में सोना चट्टानों के भीतर बेहद कम मात्रा में मिलता है। कई बार एक टन चट्टान से महज़ 1 से 5 ग्राम तक ही सोना प्राप्त होता है।

चरण 1: सबसे पहले अयस्क की खोज

सबसे पहले भूवैज्ञानिक और वैज्ञानिक यह पता लगाते हैं कि ज़मीन के नीचे सोना कहां मौजूद है। इसके लिए भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण, सैटेलाइट इमेजरी और आधुनिक भू-भौतिकीय तकनीकों का इस्तेमाल होता है। जब किसी इलाके में संभावना नज़र आती है, तब ड्रिलिंग करके नमूने निकाले जाते हैं और प्रयोगशाला में उनकी जांच की जाती है।

चरण 2: खदान तैयार करना और खनन

सोने की पुष्टि होने के बाद खदान विकसित की जाती है। सड़कें, बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं बनानी पड़ती हैं। इसके बाद गहराई के हिसाब से खनन का तरीका तय होता है।

ओपन पिट माइनिंग: यदि सोना ज़मीन की सतह के करीब हो, तो भारी मशीनों और विस्फोटकों की मदद से बड़े गड्ढे बनाकर अयस्क निकाला जाता है। यह तरीका अपेक्षाकृत सस्ता और तेज होता है।

अंडरग्राउंड माइनिंग: यदि सोना गहराई में हो, तो सुरंगें बनाकर खनन किया जाता है। KGF जैसी खदानों में हज़ारों मीटर गहराई तक सुरंगें बनाई गई थीं। यह प्रक्रिया ज़्यादा जटिल और महंगी होती है, पर गहराई में मौजूद सोने तक पहुंचने का यही एकमात्र रास्ता है।

चरण 3: चट्टानों को पीसना

निकाले गए अयस्क को प्रोसेसिंग प्लांट में ले जाया जाता है, जहां क्रशर और मिलिंग मशीनों की मदद से उसे बारीक पाउडर में बदल दिया जाता है, ताकि सोने के कण अलग करने लायक तैयार हो सकें।

चरण 4: सोने को अलग करना

अब कई रासायनिक और भौतिक तकनीकों से सोने को बाकी खनिजों से अलग किया जाता है:

  • ग्रेविटी सेपरेशन में सोने के भारी कणों को हल्के पदार्थों से अलग किया जाता है।
  • फ्लोटेशन तकनीक में रसायनों की मदद से सोना युक्त कणों को सतह पर लाया जाता है।
  • साइनाइड लीचिंग में विशेष रासायनिक घोल से सोना अयस्क से अलग किया जाता है।

इन प्रक्रियाओं के बाद सोने का सांद्र (Concentrate) मिलता है, जिसमें सोने की मात्रा पहले से कहीं अधिक हो जाती है।

चरण 5: शुद्धिकरण

सोने का सांद्र को अत्यधिक तापमान वाली भट्ठियों में पिघलाकर अशुद्धियां हटाई जाती हैं। कई चरणों की रिफाइनिंग के बाद लगभग 99.9 प्रतिशत शुद्ध सोना तैयार होता है, जिसे गोल्ड बार, सिक्कों या अन्य उत्पादों के रूप में ढाला जाता है।

सोना निकालना इतना मुश्किल क्यों है?

सोने की खनन प्रक्रिया आसान नहीं है। इसके लिए भारी निवेश, आधुनिक तकनीक, प्रशिक्षित श्रमिक और वर्षों की मेहनत चाहिए होती है। कई बार लाखों टन चट्टानों की खुदाई के बाद भी अपेक्षाकृत कम मात्रा में ही सोना प्राप्त होता है। यही वजह है कि सोना आज भी दुनिया की सबसे मूल्यवान धातुओं में गिना जाता है।