
अमीर देशों में बढ़ रहा अकेलापन (सांकेतिक इमेज-AI)
UNFPA Report: आज के डिजिटल युग और भागदौड़ भरी लाइफ में अकेलापन (Loneliness) बढ़ रहा है। पश्चिमी यूरोप और अमेरिका जैसे अमीर देशों में युवा अपने भविष्य को लेकर चिंतित हैं। युवा चाहकर भी पार्टनर नहीं खोज पा रहे हैं। अमीर देशों में 25 से 39 साल वाला हर चौथा युवा सिंगल है। संयुक्त राष्ट्र (UN) की वैश्विक रिपोर्ट में यह जानकारी सामने आई है। डिजिटल तकनीक और सोशल मीडिया ने लोगों को पहले से अधिक जोड़ने का दावा किया था, लेकिन वास्तविकता इसके उलट दिखाई दे रही है।
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (UNFPA) की नई वैश्विक रिपोर्ट बताती है कि दुनिया के कई विकसित और अमीर देशों में युवाओं के बीच अकेलापन तेजी से बढ़ रहा है। पश्चिमी यूरोप, अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में 25 से 39 वर्ष की आयु का हर चौथा युवा सिंगल है। अधिकांश युवा जीवनसाथी और परिवार बनाना चाहते हैं, लेकिन आर्थिक चुनौतियां, सही साथी की कमी और बदलती सामाजिक प्राथमिकताओं के कारण वे ऐसा नहीं कर पा रहे हैं।
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष द्वारा जारी 'Lives, Choices and Futures' रिपोर्ट में 73 देशों के 1,08,926 युवाओं का सर्वे किया गया। इनमें 18 से 39 वर्ष की आयु के 55,626 महिलाएं और 53,300 पुरुष शामिल थे। अध्ययन में भारत समेत अमेरिका, कनाडा, जापान, जर्मनी, फ्रांस, ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश, ब्राजील, केन्या और कई अन्य देशों के युवाओं की राय शामिल की गई।
UNFPA की रिपोर्ट के अनुसार, 25 वर्ष की उम्र पार करने के बाद युवाओं की प्राथमिकताएं तेजी से बदलती हैं। वे मनोरंजन के लिए सोशल मीडिया पर समय बिताने के बजाए करियर, नौकरी, पढ़ाई और वित्तीय भविष्य पर अधिक ध्यान देने लगते हैं। यही कारण है कि रिश्तों को लेकर उनकी सोच भी अधिक व्यावहारिक हो गई है।
सर्वे में शामिल अधिकांश युवाओं ने कहा कि वे जीवन साथी और बच्चे चाहते हैं, लेकिन उन्हें उपयुक्त पार्टनर नहीं मिल पा रहा। करीब 16 प्रतिशत युवाओं ने बताया कि वे अपनी इच्छा से अकेले रहना पसंद करते हैं, जबकि लगभग 25 प्रतिशत युवा ऐसे हैं जो सिंगल हैं, हालांकि वे रिश्ते में आना चाहते हैं।
रिपोर्ट बताती है कि अकेले रहने के पीछे सबसे बड़ा कारण आर्थिक असुरक्षा है। महंगे घर, बढ़ती जीवन-यापन लागत, रोजगार की अनिश्चितता और वित्तीय दबाव युवाओं को शादी या परिवार बनाने से रोक रहे हैं। करीब 50.6 प्रतिशत युवाओं ने कहा कि उन्हें अपनी पसंद का और भरोसेमंद जीवन साथी नहीं मिला।
वहीं, 41.6 प्रतिशत लोगों ने स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं, पुराने रिश्तों में मिले धोखे या भावनात्मक तनाव को रिश्तों से दूरी बनाने का कारण बताया। विशेषज्ञों का मानना है कि आज के युवा किसी सामाजिक या पारिवारिक दबाव में शादी नहीं करना चाहते। वे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानसिक संतुलन को भी उतना ही महत्व देते हैं, जितना कि पारिवारिक रिश्तों को।
UNFRA रिपोर्ट के अनुसार, सिंगल युवाओं में पुरुषों की संख्या अधिक है। वैश्विक स्तर पर करीब 30 प्रतिशत पुरुष सिंगल हैं, जबकि महिलाओं में यह आंकड़ा 19.3 प्रतिशत है। क्षेत्रवार आंकड़ों में पश्चिम एवं मध्य अफ्रीका के 32.3 प्रतिशत पुरुष तथा पूर्वी यूरोप और मध्य एशिया के 31.7 प्रतिशत पुरुष सिंगल हैं। वहीं, पश्चिम एवं मध्य अफ्रीका में 25.3 प्रतिशत महिलाएं अकेले जीवन जी रही हैं। इससे स्पष्ट होता है कि दुनिया के कई हिस्सों में पुरुषों के लिए उपयुक्त जीवन साथी ढूंढना अधिक कठिन हो रहा है।
दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में रिश्तों को लेकर सोच में बड़ा अंतर है। अरब और खाड़ी देशों में करीब 65.7 प्रतिशत युवा सीधे शादी करने को प्राथमिकता देते हैं। वहां लिव-इन रिलेशनशिप का समर्थन बहुत कम है और सिंगल युवाओं की संख्या केवल 3.5 प्रतिशत के आसपास है। इसके विपरीत पश्चिमी यूरोप, अमेरिका, कनाडा और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में 70 प्रतिशत से अधिक लोग लिव-इन रिलेशनशिप का समर्थन करते हैं। हालांकि दुनिया के अधिकांश देशों में इस विषय पर राय बंटी हुई है। लगभग 36 से 38 प्रतिशत लोग लिव-इन के पक्ष में हैं, जबकि 34 से 36 प्रतिशत लोग इसका विरोध करते हैं।
वैश्विक स्तर पर ऑनलाइन डेटिंग बढ़ी है, लेकिन स्कूल और कार्यस्थल अब भी पहली पसंद बनी हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक, करीब 32.8 प्रतिशत युवा स्कूल, कॉलेज और कार्यस्थल को जीवन साथी खोजने की सबसे अच्छी जगह मानते हैं। वहीं, 31 प्रतिशत युवा ऑनलाइन प्लेटफॉर्म और डेटिंग ऐप्स का इस्तेमाल कर रहे हैं।
लगभग 30 प्रतिशत लोग दोस्तों और व्यक्तिगत नेटवर्क के जरिए पार्टनर ढूंढते हैं, जबकि 24.2 प्रतिशत युवा पार्टियों, क्लब, हॉबी क्लास, कैफे और सामाजिक आयोजनों में जीवन साथी की तलाश करते हैं। आकड़ों से साफ है कि डिजिटल प्लेटफॉर्म का प्रभाव बढ़ा है, लेकिन आमने-सामने की पहचान और भरोसे वाले रिश्ते आज भी अधिक महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं।
दुनिया के कई देशों में युवा चाहकर भी माता-पिता नहीं बन पा रहे हैं। जापान, दक्षिण कोरिया, इटली, फिनलैंड, सिंगापुर, कनाडा, स्पेन, फ्रांस, जर्मनी, ऑस्ट्रेलिया और कई अन्य देशों में 35 से 39 वर्ष की आयु के बड़ी संख्या में लोग आर्थिक और सामाजिक कारणों से बिना बच्चों के हैं।
पश्चिमी देशों में अधिकांश युवा औसतन 1.9 से 2.2 बच्चे ही चाहते हैं, जबकि पश्चिम एवं मध्य अफ्रीका में लोग 3.5 से 4.3 बच्चों वाले बड़े परिवार को प्राथमिकता देते हैं। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि वैश्विक स्तर पर पुरुष औसतन 2.62 बच्चे चाहते हैं, जबकि महिलाएं 2.43 बच्चे चाहती हैं। केवल पश्चिम एवं मध्य अफ्रीका ऐसा क्षेत्र है जहां महिलाएं पुरुषों से अधिक बच्चे चाहती हैं।
सर्वे में यह भी सामने आया कि छोटे बच्चों की मां के फुल-टाइम नौकरी करने को लेकर दुनिया के कई देशों में अब भी पारंपरिक सोच कायम है। वैश्विक स्तर पर केवल 14.3 प्रतिशत लोग चाहते हैं कि छोटे बच्चों वाली महिलाएं पूर्णकालिक नौकरी करें, जबकि 26.5 प्रतिशत लोग छोटे बच्चों के पिता के फुल-टाइम काम करने पर कोई आपत्ति नहीं जताते। अरब और खाड़ी देशों में करीब 42 प्रतिशत लोग छोटे बच्चों वाली महिलाओं के फुल-टाइम नौकरी करने के खिलाफ हैं।
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की वैश्विक रिपोर्ट में भारत को सकारात्मक सोच वाले देशों में शामिल किया गया है। करीब 83 प्रतिशत भारतीय युवाओं ने अपने भविष्य को लेकर सकारात्मक दृष्टिकोण व्यक्त किया। इसके विपरीत ट्यूनीशिया, ब्राजील, बोत्सवाना और बांग्लादेश के युवाओं में भविष्य को लेकर निराशा अपेक्षाकृत अधिक देखी गई।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह रिपोर्ट केवल रिश्तों में बदलाव की कहानी नहीं है, बल्कि यह बताती है कि आर्थिक परिस्थितियां, रोजगार, आवास, मानसिक स्वास्थ्य और सामाजिक बदलाव अब युवाओं के निजी जीवन और परिवार बनाने के फैसलों को भी गहराई से प्रभावित कर रहे हैं। आने वाले वर्षों में सरकारों और समाज के लिए यह एक महत्वपूर्ण सामाजिक और जनसांख्यिकीय चुनौती बन सकती है।
Updated on:
19 Jul 2026 09:46 pm
Published on:
19 Jul 2026 09:34 pm
