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क्या जानवर इंसानों से पहले जान लेते हैं मौसम का हाल? जानिए चींटियों, मोर, मेंढकों के संकेत और विज्ञान

Weather Forecast Alert By Animals: क्या आपने कभी नोटिस किया कि टिटहरी पक्षी जब जोर-जोर से चिल्लाती है टी, ट्यू, ट्यू ट्यू, टी, ट्यू, ट्यू.... और नॉनस्टॉप बोलती जाती है। इसकी आवाज ही नहीं, बल्कि कहा जाता है कि जब टिटहरी पेड़ के बजाय जमीन पर अंडे देती है, तो यह संकेत है कि इस बार अच्छी बारिश होगी और यह कई बार खबर भी बन जाती है। आसमानी संकेतों से पहले धरती के जीव संकेत दे देते हैं कि मौसम बदलने वाला है। आपको जानकर हैरानी होगी कि इसके सबूत विज्ञान और इतिहास दोनों में मिलते हैं... क्या इस बार आपने देखा है चींटियों को सफेद सा कुछ लेकर कतार में जाते हुए या मेंढकों को तेज आवाज में टर्राते हुए?
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भारत

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Sanjana Kumar

Jul 20, 2026

Weather Forecast by animals

Weather Forecast by animals: मौसम विभाग के लिए आज भी जिज्ञासा और शोध का विषय है मौसम बदलने से पहले नजर आने वाला उनका व्यवहार। रोचक खबर बताएगी इस बार बारिश कम या ज्यादा (AI Generated Creative)

Weather Forecast By Animals: इस बार लोग अच्छी बारिश का इंतजार कर रहे हैं। लेकिन बारिश है कि कभी आती है, कभी तरसाती है। मौसम वैज्ञानिकों अकेले नहीं, बल्कि लोगों और किसानों को भी चिंता है कि बारिश कम हो रही है। इन लोगों और कुछ किसानों का कहना है कि टिटहरी की आवाज कम गूंजी और न ही कहीं से खबर आई कि टिटहरी ने जमीन पर अंडे दिए हैं। वहीं मेंढकों के टर्राने के तेज स्वर भी इस बार कम ही सुनाई दिए हैं। अब आदिवासी अंचलों में, कुछ ग्रामीण इलाकों में लोगों का मानना है कि इस बार बारिश कम होगी। जबकि विज्ञान के मुताबिक एल नीनो ने मानून को प्रभावित किया है।

क्या कहते हैं मौसम विशेषज्ञ

भारतीय मौसम विभाग के पूर्व मौसम वैज्ञानिक शैलेंद्र नायक कहते हैं बारिश आने से पहले चींटियों का कतार बनाकर ऊंची जगहों की ओर जाना, मोरों का पंख फैलाकर नाचना, मेंढकों का अचानक तेज आवाज में टर्राना, गायों का एक साथ बैठ जाना या पक्षियों का असामान्य ढंग से उड़ना, भारत के गांवों में सदियों से लोग इन संकेतों को मौसम बदलने की सूचना मानते रहे हैं। खास तौर पर आदिवासी लोगों के बीच यह ट्रेंड आसानी से देखा जा सकता है।

बड़ा सवाल क्या यह लोक विश्वास है या विज्ञान भी

अब सवाल यह है कि क्या यह केवल लोकविश्वास है या इसके पीछे विज्ञान भी छिपा है? दिलचस्प बात यह है कि आधुनिक मौसम विज्ञान के आने से बहुत पहले मनुष्य के पास मौसम का अनुमान लगाने के लिए यही प्राकृतिक संकेत थे। आज भी कई वैज्ञानिक मानते हैं कि कुछ जानवर वातावरण में होने वाले सूक्ष्म बदलावों को इंसानों से पहले महसूस कर लेते हैं। हालांकि यह किसी मौसम विभाग की तरह सटीक भविष्यवाणी नहीं होती, बल्कि जैविक संवेदनशीलता का परिणाम मानी जाती है।

जब मौसम विभाग नहीं था, तब प्रकृति ही थी मौसम की किताब

भारत सहित दुनिया की लगभग सभी प्राचीन सभ्यताओं में किसान और चरवाहे जानवरों के व्यवहार को देखकर खेती और यात्रा का समय तय करते थे। भारतीय लोक परंपराओं में कहा जाता था, चींटियां अंडे उठाकर ऊपर की ओर जाती नजर आएं, तो भारी बारिश की संभावना है। अगर मोर नाचें तो, मानसून करीब है। मेंढकों का सामूहिक रूप से तेज आवाज निकालना भी इस बात का संकेत माना जाता था कि बारिश आने वाली है। वहीं अबाबील (Swallow) पक्षी जमीन के पास उड़ने लगें, तो बारिश आ सकती है।

2300 साल पहले पहले मिलता है उल्लेख

यूनानी दार्शनिक अरस्तू ने भी लगभग 2300 साल पहले अपनी प्रसिद्ध पुस्तक मेट्रोलोजिका (Meteorologica) में पशु-पक्षियों के व्यवहार और मौसम के संबंध का उल्लेख किया था। रोमन विद्वान प्लिनी द एल्डर (Pliny the Elder) ने भी अपनी पुस्तक नेचुरल हिस्ट्री (Natural History) में ऐसे कई उदाहरण दर्ज किए हैं। कहा जा सकता है कि मौसम और जानवरों के संबंध की चर्चा हजारों वर्षों से मानव सभ्यता का हिस्सा रही है।

आखिर क्या महसूस कर पाते हैं जानवर?

वैज्ञानिकों के अनुसार जानवरों के पास कई ऐसी जैविक क्षमताएं होती हैं, जो इंसानों की तुलना में अधिक संवेदनशील होती हैं। इसलिए वे महसूस कर सकते हैं।

  • वायुदाब (Air Pressure) में बदलाव
  • आर्द्रता (Humidity) का बढ़ना
  • तापमान में सूक्ष्म परिवर्तन
  • हवा की दिशा बदलना
  • पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र में बदलाव
  • कम आवृत्ति (Infrasound) वाली ध्वनियां
  • यही कारण है कि वातावरण में बदलाव शुरू होते ही उनका व्यवहार बदल सकता है।

चींटियां क्यों बदल देती हैं अपना रास्ता?

चींटियां जमीन के अंदर रहती हैं। जब मिट्टी में नमी बढ़ने लगती है और उन्हें बिल में पानी भरने की आशंका होती है, तो वे अंडों और लार्वा को सुरक्षित स्थानों पर ले जाने लगती हैं।
इसी वजह से गांवों में इसे बारिश का संकेत माना जाता है।

मोर का नाचना केवल खुशी नहीं है, ये भी बारिश का संकेत

भारतीय संस्कृति में मोर का नाचना केवल उसकी खुशी भर नहीं, बल्कि बारिश का प्रतीक माना जाता है। वैज्ञानिक बताते हैं कि मानसून से पहले बढ़ती आर्द्रता और प्रजनन काल, दोनों कारणों से मोर अधिक सक्रिय होकर पंख फैलाता है। इसलिए मोर का नाचना बारिश के मौसम से जुड़ा दिखाई देता है। हालांकि वैज्ञानिक यह भी कहते हैं कि हर बार मोर का नाचना बारिश की गारंटी नहीं होता।

मेंढकों की आवाज क्यों बढ़ जाती है?

बारिश का मौसम मेंढकों के प्रजनन का समय होता है। आर्द्रता बढ़ते ही नर मेंढक मादा को आकर्षित करने के लिए तेज आवाज निकालते हैं। इसलिए बारिश से पहले उनकी आवाज अचानक बढ़ जाती है।

पक्षी नीचे-नीचे क्यों उड़ते हैं?

बारिश से पहले हवा में नमी बढ़ जाती है और वायुदाब घटता है। ऐसी स्थिति में छोटे उड़ने वाले कीट नीचे आ जाते हैं। उन्हें पकड़ने के लिए अबाबील या टिटहरी जैसे पक्षी भी जमीन के पास उड़ने लगते हैं। इसी आधार पर यूरोप और भारत दोनों में इसे बारिश का संकेत माना जाता रहा है।

क्या गाय और भैंस भी मौसम पहचानती हैं?

कई पशुपालकों का अनुभव है कि बारिश से पहले गाय-भैंस जल्दी बैठ जाती हैं या झुंड बनाकर खड़ी रहती हैं। वैज्ञानिक इसे पूरी तरह सिद्ध नियम नहीं मानते, लेकिन कुछ शोध बताते हैं कि वायुदाब और तापमान में बदलाव पशुओं की गतिविधियों को प्रभावित कर सकते हैं।

क्या मधुमक्खियां भी देती हैं संकेत?

बारिश से पहले मधुमक्खियां अक्सर जल्दी अपने छत्तों में लौट आती हैं, क्योंकि तेज बारिश में उड़ना उनके लिए जोखिम भरा होता है। मधुमक्खी पालक आज भी इस व्यवहार को ध्यान से देखते हैं।

समुद्र के जीव भी बदल देते हैं व्यवहार

मछुआरे सदियों से बताते आए हैं कि तूफान से पहले कुछ मछलियां गहरे पानी में चली जाती हैं। कुछ समुद्री पक्षी भी तेज हवाओं से पहले अपना रास्ता बदल लेते हैं। हालांकि अलग-अलग प्रजातियों में यह व्यवहार अलग होता है।

क्या विज्ञान इन मान्यताओं को स्वीकार करता है?

इस सवाल पर शैलेंद्र नायक कहते हैं कि इस बात को पूरी तरह से सच नहीं माना जाना चाहिए, लेकिन वे यह भी कहते हैं कि आंशिक रूप से इसे माना जा सकता है। कई शोध बताते हैं कि जानवर वातावरण में होने वाले बदलावों के प्रति अत्यंत संवेदनशील होते हैं। लेकिन यह कहना कि कोई जानवर हर बार मौसम की बिल्कुल सही भविष्यवाणी कर सकता है, वैज्ञानिक रूप से सही नहीं है। और इसे मौसम विभाग का विकल्प भी नहीं माना जा सकता।

आज भी वैज्ञानिक क्या करते हैं?

आज मौसम विभाग उपग्रह, डॉप्लर रडार, समुद्री बुआ, मौसम केंद्र और सुपरकंप्यूटर का उपयोग करता है। फिर भी जीव वैज्ञानिक यह अध्ययन करते रहते हैं कि क्या जानवरों के व्यवहार को आधुनिक मौसम मॉडल के साथ जोड़कर भविष्य में बेहतर पूर्वानुमान विकसित किए जा सकते हैं। यूरोप, जापान और अमेरिका में इस विषय पर लगातार शोध जारी हैं। कुछ शोधों में एनिमल-बोर्ने सेंसर्स और बायोकौस्टिक्स जैसी तकनीकों का उपयोग भी किया जा रहा है। इससे पर्यावरण और जलवायु संबंधी जानकारी जुटाई जा रही है। हालांकि अभी तक जानवरों के व्यवहार को सीधे मौसम के पूर्वानुमान मॉडल का हिस्सा नहीं बनाया गया गया है।

लोकज्ञान को पूरी तरह नकारा नहीं जा सकता

भारत के कई आदिवासी समुदाय आज भी जंगलों में पक्षियों, कीड़ों और पशुओं के व्यवहार के आधार पर मौसम का अनुमान लगाते हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि इस पारंपरिक ज्ञान (Traditional Ecological Knowledge) को वैज्ञानिक परीक्षण के साथ समझना जरूरी है। कई बार स्थानीय अनुभव ऐसे संकेत पकड़ लेते हैं, जिन्हें आधुनिक उपकरण बाद में दर्ज करते हैं।

यहां जानिए मौसम के वो रोचक संकेत, जिन पर लोग आज भी नजर रखते हैं

  • चींटियों का अंडे उठाकर ऊपर जाना
  • मोर का बार-बार नाचना
  • मेंढकों का सामूहिक टर्राना
  • अबाबील का नीचे उड़ना
  • मधुमक्खियों का जल्दी लौटना
  • गायों का झुंड बनाकर बैठना
  • ड्रैगनफ्लाई (व्याध पतंग) का नीचे उड़ना

मौसम का हाल जानने के लिए इंसान की पहली पाठशाला प्रकृति ही थी। आधुनिक विज्ञान ने हमें उपग्रह और रडार दे दिए हैं, लेकिन सदियों पुराने लोकज्ञान में छिपे कई संकेत आज भी वैज्ञानिकों की जिज्ञासा का केंद्र बने हुए हैं। जानवर मौसम का भविष्य नहीं जानते, लेकिन वे वातावरण में होने वाले छोटे से छोटे बदलाव को अपनी तीव्र इंद्रियों से इंसानों से पहले महसूस कर लेते हैं। यही वजह है कि अक्सर मौसम बदलने से पहले उनका बदला हुआ व्यवहार दिखाई देता है। शायद इसी कारण भारतीय गांवों में आज भी जब कोई मोर नाचता है या चींटियां कतार बनाकर घर बदलती हैं, तो लोग अनायास ही आसमान की ओर देख लेते हैं। क्या आपके यहां भी है ऐसी कोई मान्यता जो बता देती है इस बार कैसी होगी बारिश, कैसा रहेगा मौसम?