
वैज्ञानिकों ने भूलने की बीमारी का इलाज ढूंढ निकाला। विजुअल डिजाइन: ChatGPT AI.)
Alzheimers Disease Treatment Brain Protein : आम इंसान किसी भी उम्र में भूलने की बीमारी से परेशान होता है,मगर बुढ़ापे में भूल जाना एक बड़ी बीमारी होती है, जिससे बुजुर्ग अक्सर बहुत परेशान रहते हैं। अमेरिका के मशहूर सैनफोर्ड बर्नहैम प्रीबिस (Sanford Burnham Prebys) संस्थान के वैज्ञानिकों ने चिकित्सा विज्ञान के इतिहास की सबसे बड़ी खोजों में से एक को अंजाम दिया है। उन्होंने हमारे ही दिमाग के अंदर एक ऐसे 'सिक्योरिटी गार्ड' यानि प्राकृतिक प्रोटीन की पहचान की है, जो अल्जाइमर को पैदा होने से पहले ही कुचल सकता है। यह रिसर्च दुनिया भर के करोड़ों परिवारों के लिए एक नई उम्मीद की किरण लेकर आई है।
वैज्ञानिकों की रिसर्च के बाद अब बुढ़ापे में भूलने की बीमारी से पीछो छूटेगा। ( विजुअल डिजाइन: Gemini AI.)
आम तौर पर एलोपैथी और यूनानी चिकित्सा पद्धति में ब्रेन टॉनिक का जिक्र होता है, इस बीमारी में बढ़ती उम्र के साथ इंसान का शरीर कमजोर होने लगता है, यह तो हम सब जानते हैं। सबसे दर्दनाक स्थिति तब होती है, जब कोई बुजुर्ग अपनी ही पहचान, अपना घर और अपने बच्चों का नाम तक भूलने लगता है। मेडिकल की भाषा में इसे अल्जाइमर (Alzheimer's) या मनोभ्रंश (Dementia - भूलने की बीमारी) कहा जाता है। दशकों से डॉक्टर इस बीमारी के आगे बहुत मजबूर थे, क्योंकि इसका कोई पक्का इलाज नहीं था। दवाइयां सिर्फ लक्षणों को कुछ समय के लिए दबा सकती थीं, बीमारी को जड़ से खत्म नहीं कर पाती थीं।
इस चमत्कारी प्रोटीन का नाम है SORLA (सॉर्टिंग-रिलेटेड रिसेप्टर विद ए-टाइप रिपीट्स)। वैज्ञानिकों को पता चला है कि अगर दिमाग में इस प्रोटीन की मात्रा को सही रखा जाए, तो यह अल्जाइमर फैलाने वाले सबसे खतरनाक विलेन यानि टाऊ टेंगल्स (Tau Tangles) को पूरी तरह बेअसर कर देता है। यह क्रांतिकारी रिसर्च दुनिया की सबसे प्रतिष्ठित साइंस मैगजीन 'साइंस एडवांसेज' (Science Advances) में प्रकाशित हुई है। आइए इस पूरी खोज को, इसके पीछे के हैरान कर देने वाले विज्ञान को और सबसे नए साइंटिफिक अपडेट्स को बिल्कुल आसान और बोलचाल की हिंदी में समझते हैं।
इस पूरी खोज को समझने के लिए सबसे पहले हमें यह जानना होगा कि हमारे दिमाग के अंदर ऐसा क्या गलत हो जाता है, जिससे इंसान सब कुछ भूलने लगता है। हमारे दिमाग और पूरे तंत्रिका तंत्र (Nervous System) में टाऊ (Tau) नाम का एक प्रोटीन प्राकृतिक रूप से पाया जाता है। यह कोई बाहर से आया हुआ वायरस या बैक्टीरिया नहीं है, बल्कि यह हमारे दिमाग का एक बेहद जरूरी और वफादार हिस्सा है।
आप अपने दिमाग को एक आलीशान और बेहद जटिल इमारत की तरह समझ सकते हैं। इस इमारत को खड़ा रखने के लिए मजबूत पिलर (खंभे) और बीम की जरूरत होती है। हमारे दिमाग में अरबों कोशिकाएं होती हैं, जिन्हें न्यूरॉन्स (Neurons) कहा जाता है। इन न्यूरॉन्स के अंदर बेहद बारीक नलिकाएं होती हैं, जिन्हें वैज्ञानिक माइक्रोट्यूब्यूल्स (Microtubules) कहते हैं। इन नलिकाओं का काम दिमाग के एक हिस्से से दूसरे हिस्से तक पोषक तत्व और जरूरी सिग्नल पहुँचाना होता है।
हमारा स्वस्थ टाऊ प्रोटीन इन नलिकाओं को आपस में बांधकर रखता है और उन्हें सीधा व मजबूत बनाए रखता है।
जब तक टाऊ अपना काम ठीक से कर रहा है, आपका दिमाग कंप्यूटर से भी तेज चलता है, आपकी याददाश्त मजबूत रहती है और आप नई चीजें आसानी से सीख पाते हैं।
वैज्ञानिकों ने भूलने की बीमारी अल्जाइमर और डिमेंशिया का इलाज ढूंढ निकाला। ( विजुअल डिजाइन: Gemini AI.)
जब किसी इंसान को अल्जाइमर या टाऊपैथी (Tauopathy - टाऊ प्रोटीन से जुड़ी बीमारियां) होने लगती है, तो यह सीधा-साधा टाऊ प्रोटीन अचानक अपना रास्ता भटक जाता है। यह न्यूरॉन्स की दीवारों को सहारा देना बंद कर देता है और खुद में ही रासायनिक बदलाव करके विकृत होने लगता है। यह प्रोटीन सीधा रहने के बजाय आपस में बुरी तरह से उलझने लगता है और धागे जैसे चिपचिपे गुच्छे बना लेता है। विज्ञान की दुनिया में इन्हीं उलझे हुए जहरीले गुच्छों को 'टाऊ टेंगल्स' (Tau Tangles) कहा जाता है।
जब ये टाऊ टेंगल्स दिमाग की कोशिकाओं के अंदर जमा होने लगते हैं, तो दिमाग का पूरा का पूरा कम्युनिकेशन सिस्टम ठप हो जाता है। एक न्यूरॉन दूसरे न्यूरॉन को संदेश नहीं भेज पाता। बिल्कुल वैसे ही, जैसे किसी व्यस्त हाईवे के बीच में कोई बहुत बड़ा पहाड़ टूट कर गिर जाए और सारा ट्रैफिक रुक जाए। नतीजा यह होता है कि पहले इंसान छोटी-छोटी बातें भूलता है (जैसे चाबी कहाँ रखी, सुबह क्या खाया था), और धीरे-धीरे यह जहर पूरे दिमाग में फैल जाता है, कोशिकाएं मरने लगती हैं और दिमाग सिकुड़ जाता है।
सैनफोर्ड बर्नहैम प्रीबिस के न्यूरोलॉजिक डिजीज सेंटर के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. टिमोथी हुआंग (Dr. Timothy Huang) पिछले कई सालों से इस रहस्य को सुलझाने में लगे थे। डॉ. हुआंग बताते हैं कि पिछले 15-20 सालों से वैज्ञानिकों को यह तो पता था कि सोरला (SORLA) प्रोटीन अल्जाइमर के एक दूसरे विलेन, जिसे एमिलॉयड-बीटा (Amyloid-Beta) कहते हैं, उसे बनने से रोकता है।
अल्जाइमर के दो मुख्य कारण होते हैं - पहला एमिलॉयड-बीटा के प्लाक (दिमाग के बाहर जमा होने वाला कचरा) और दूसरा टाऊ टेंगल्स (दिमाग की कोशिकाओं के अंदर का कचरा)। अब तक दुनिया की ज्यादातर दवाएं सिर्फ एमिलॉयड-बीटा को रोकने पर काम कर रही थीं और फेल हो रही थीं। लेकिन इस नई रिसर्च ने 'सिक्के के दूसरे पहलू' यानी टाऊ टेंगल्स पर सोरला के असर को खोज निकाला है।
वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में आनुवंशिक इंजीनियरिंग (Genetic Engineering) की मदद से कुछ विशेष चूहे तैयार किए। इन चूहों के अंदर इंसानी SORLA प्रोटीन की मात्रा को बहुत ज्यादा बढ़ा दिया गया था। साथ ही, इन चूहों में जानबूझकर टाऊ टेंगल्स और दिमाग सिकुड़ने वाली बीमारी भी पैदा की गई थी, ताकि यह देखा जा सके कि सोरला इस बीमारी से लड़ पाता है या नहीं। जब इस प्रयोग के नतीजे आए, तो प्रयोगशाला में काम कर रहे वैज्ञानिक खुशी से उछल पड़े। अधिक सोरला प्रोटीन वाले चूहों के दिमाग में निम्नलिखित अद्भुत बदलाव देखे गए:
वैज्ञानिकों ने भूलने की बीमारी अल्जाइमर और डिमेंशिया का इलाज ढूंढ निकाला। ( विजुअल डिजाइन: Google Gemini AI)
हमारे दिमाग और तंत्रिका तंत्र (Nervous System) में टाऊ (Tau) नाम का एक प्रोटीन होता है। यह कोई बाहरी चीज नहीं है, बल्कि हमारे दिमाग का एक जरूरी हिस्सा है। यह प्रोटीन हमारे दिमाग की कोशिकाओं (Neurons) को अंदर से सहारा देता है और उन्हें सही शेप में रखता है। आप इसे ऐसे समझ सकते हैं जैसे किसी पक्के मकान को खड़ा रखने के लिए पिलर या बीम की जरूरत होती है, वैसे ही यह प्रोटीन हमारी दिमागी कोशिकाओं की सूक्ष्म नलिकाओं (Microtubules) को मजबूत रखता है ताकि दिमाग सही से काम कर सके।
जब किसी इंसान को अल्जाइमर या टाऊपैथी (Tauopathy - टाऊ प्रोटीन से जुड़ी बीमारियां) होने लगती है, तो यह सीधा-साधा टाऊ प्रोटीन अचानक अपना रास्ता भटक जाता है। यह न्यूरॉन्स की दीवारों को सहारा देना बंद कर देता है और खुद में ही रासायनिक बदलाव करके विकृत होने लगता है। यह प्रोटीन सीधा रहने के बजाय आपस में बुरी तरह से उलझने लगता है और धागे जैसे चिपचिपे गुच्छे बना लेता है। विज्ञान की दुनिया में इन्हीं उलझे हुए जहरीले गुच्छों को 'टाऊ टेंगल्स' (Tau Tangles) कहा जाता है।
जब ये टाऊ टेंगल्स दिमाग की कोशिकाओं के अंदर जमा होने लगते हैं, तो दिमाग का पूरा का पूरा कम्युनिकेशन सिस्टम ठप हो जाता है। एक न्यूरॉन दूसरे न्यूरॉन को संदेश नहीं भेज पाता। बिल्कुल वैसे ही, जैसे किसी व्यस्त हाईवे के बीच में कोई बहुत बड़ा पहाड़ टूट कर गिर जाए और सारा ट्रैफिक रुक जाए। नतीजा यह होता है कि पहले इंसान छोटी-छोटी बातें भूलता है (जैसे चाबी कहाँ रखी, सुबह क्या खाया था), और धीरे-धीरे यह जहर पूरे दिमाग में फैल जाता है, कोशिकाएं मरने लगती हैं और दिमाग सिकुड़ जाता है।
जब किसी इंसान को अल्जाइमर या टाऊपैथी (Tauopathy) जैसी दिमागी बीमारी होती है, तो यही सीधा-साधा टाऊ प्रोटीन अचानक विलेन बन जाता है। यह अपनी सही शेप छोड़कर आपस में बुरी तरह उलझ जाता है। इन उलझे हुए जहरीले गुच्छों को ही वैज्ञानिक 'टाऊ टेंगल्स' (Tau Tangles) कहते हैं। जब ये गुच्छे दिमाग के अंदर बन जाते हैं, तो ये एक न्यूरॉन से दूसरे न्यूरॉन तक जाने वाले सिग्नल्स (संदेशों) को रोक देते हैं। नतीजा यह होता है कि इंसान की याददाश्त कमजोर होने लगती है, वह चीजें भूलने लगता है और धीरे-धीरे दिमाग की कोशिकाएं मरने लगती हैं।
वैज्ञानिकों ने प्रयोगशाला में आनुवंशिक इंजीनियरिंग (Genetic Engineering) की मदद से कुछ विशेष चूहे तैयार किए। इन चूहों के अंदर इंसानी SORLA प्रोटीन की मात्रा को बहुत ज्यादा बढ़ा दिया गया था। साथ ही, इन चूहों में जानबूझकर टाऊ टेंगल्स और दिमाग सिकुड़ने वाली बीमारी भी पैदा की गई थी, ताकि यह देखा जा सके कि सोरला इस बीमारी से लड़ पाता है या नहीं। जब इस प्रयोग के नतीजे आए, तो प्रयोगशाला में काम कर रहे वैज्ञानिक खुशी से उछल पड़े। अधिक सोरला प्रोटीन वाले चूहों के दिमाग में निम्नलिखित अद्भुत बदलाव देखे गए:
आम तौर पर टाऊ टेंगल्स एक संक्रामक जहर की तरह काम करते हैं। वे दिमाग के एक हिस्से में बनते हैं और फिर 'बीज' (Seeds) की तरह फैलकर आसपास के स्वस्थ टाऊ प्रोटीन्स को भी जहरीला बना देते हैं। लेकिन जिन चूहों में सोरला प्रोटीन का स्तर ऊंचा था, वहाँ सोरला ने इन जहरीले बीजों को चारों तरफ से घेर लिया और उन्हें नए गुच्छे बनाने से रोक दिया।
टाऊ प्रोटीन के बिगड़ने का सबसे बड़ा कारण होता है उसका हाइपरफॉस्फोराइलेशन (Hyperphosphorylation) यानी उसमें फॉस्फेट समूहों का जरूरत से ज्यादा जुड़ जाना। सोरला प्रोटीन ने इस खतरनाक रासायनिक प्रक्रिया को बीच में ही काट दिया, जिससे टाऊ प्रोटीन का हुलिया बिगड़ने से बच गया।
अल्जाइमर के आखिरी स्टेज में मरीज का दिमाग न्यूरॉन्स के मरने के कारण आकार में बहुत छोटा और सिकुड़ा हुआ हो जाता है। लेकिन सोरला की हाई डोज वाले चूहों का दिमाग बिल्कुल स्वस्थ चूहों जैसा बना रहा। उनका ब्रेन एट्रोफी (क्षय) लगभग न के बराबर हुआ।
हमारे दिमाग में यादें कहाँ सेव होती हैं? दो न्यूरॉन्स के बीच के खाली स्थान में, जहाँ वे आपस में केमिकल सिग्नल्स के जरिए बात करते हैं। इस बात करने वाली जगह को सिनेप्स (Synapses) कहा जाता है। अल्जाइमर सबसे पहले इन्हीं सिनेप्स को तोड़ता है। लेकिन सोरला प्रोटीन ने एक सुरक्षा कवच की तरह काम करते हुए इन सिनेप्स को टूटने से बचा लिया। चूहों की सीखने और याद रखने की क्षमता (Synaptic Plasticity) बिल्कुल नए जैसे बनी रही।
इस बात को सौ फीसदी सच साबित करने के लिए वैज्ञानिकों ने एक और प्रयोग किया। उन्होंने कुछ चूहों के शरीर से सोरला प्रोटीन बनाने वाले जीन SORL1 को पूरी तरह से डिलीट कर दिया। नतीजा बेहद खौफनाक था। सोरला के गायब होते ही टाऊ के जहर ने चूहों के दिमाग पर एकतरफा हमला बोल दिया। उन चूहों की याददाश्त पूरी तरह खत्म हो गई और उनका दिमाग बहुत तेजी से डैमेज हो गया। इससे यह साबित हो गया कि सोरला ही दिमाग का असली रक्षक है।
वैज्ञानिकों ने लैब में कुछ ऐसे चूहे तैयार किए, जिनके अंदर सोरला (SORLA) प्रोटीन की मात्रा बहुत ज्यादा बढ़ा दी गई थी। इसके जो रिजल्ट आए, उसने वैज्ञानिकों को हैरान कर दिया:
इसके उलट, जब वैज्ञानिकों ने चूहों के शरीर से सोरला बनाने वाले जीन (सोरल 1) को ही हटा दिया, तो चूहों की हालत बहुत खराब हो गई। उनके दिमाग में टाऊ का जहर तेजी से फैला और दिमागी कोशिकाओं को भारी नुकसान पहुंचा।
इस नई रिसर्च के लीडर न्यूरोलॉजिक डिजीज सेंटर के असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. टिमोथी हुआंग ) ने एक बड़ी बात बताई है। वैज्ञानिक पिछले 15-20 सालों से यह तो जानते थे कि शरीर में मौजूद सोरला (SORLA) नाम का प्रोटीन अल्जाइमर के एक दूसरे विलेन (एमिलॉयड-बीटा) को रोकता है। लेकिन यह सोरला प्रोटीन इन टाऊ टेंगल्स (उलझे हुए गुच्छों) पर कैसे हमला करता है, यह तथ्य पहली बार इस रिसर्च में सामने आया है।
इस रिसर्च के एक और प्रमुख लेखक डॉ. हुइजी हुआंग ने बताया कि जब दिमाग में सोरला प्रोटीन की कमी होती है, तो प्लेक्सिन-बी (Plexin-B) नाम के रिसेप्टर्स बहुत ज्यादा एक्टिव हो जाते हैं। इनके एक्टिव होने से दिमाग की जो हेल्पर कोशिकाएं होती हैं (जिन्हें ग्लियल कोशिकाएं कहते हैं), वे ठीक से काम करने के बजाय दिमाग को नुकसान पहुंचाना शुरू कर देती हैं।
राहत की बात यह है कि मेडिकल की दुनिया में ऐसी दवाएं पहले से मौजूद हैं जो इन प्लेक्सिन-बी रिसेप्टर्स को कंट्रोल कर सकती हैं। वैज्ञानिकों को उम्मीद है कि भविष्य में इन दवाओं की मदद से ग्लियल कोशिकाओं की इस गड़बड़ी को रोका जा सकेगा, जिससे अल्जाइमर के लक्षणों को पलटने (यानी मरीज को ठीक करने) में मदद मिल सकती है।
अल्जाइमर और डिमेंशिया के इलाज के लिए वैज्ञानिकों ने इन चरणों में की रिसर्च। ( विजुअल डिजाइन: Gemini AI.)
इस ऐतिहासिक रिसर्च में सैनफोर्ड बर्नहैम प्रीबिस संस्थान के क्रिस्टीना हुआन शी, वेंकी यांग, जुआन सी. पिना-क्रेस्पो, जे भटनागर और स्क्रिप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट के कियांग जिओ ने मिलकर काम किया है। इस पूरे प्रोजेक्ट को अमेरिका के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ (NIH), नेशनल कैंसर इंस्टीट्यूट और नेशनल इंस्टीट्यूट ऑन एजिंग से फंडिंग मिली है।
वैज्ञानिकों के लिए सबसे बड़ी खुशखबरी यही है। डॉ. टिमोथी हुआंग का कहना है कि दुनिया में पहले से ही ऐसी कई विशेष दवाएं (Targeted Drugs) मौजूद हैं, जो प्लेक्सिन-बी रिसेप्टर्स को ब्लॉक या कंट्रोल कर सकती हैं। इसका मतलब यह हुआ कि अल्जाइमर के इलाज के लिए हमें शून्य से शुरुआत करके कोई नई दवा बनाने में 20 साल बर्बाद करने की जरूरत नहीं है। हम मौजूदा दवाओं का ही एक नया कॉम्बिनेशन तैयार कर सकते हैं, जो ग्लियल कोशिकाओं की इस अतिसक्रियता और सूजन को तुरंत रोक दे। यह अल्जाइमर के लक्षणों को रिवर्स करने यानी मरीज को वापस सामान्य जिंदगी में लाने का सबसे शॉर्टकट और पक्का रास्ता हो सकता है।
एक तरह से देखा जाए तो यह नई रिसर्च एमिलॉयड प्लाक को पीछे छोड़ते हुए आगे बढ़ी है। अब तक दुनिया भर में अल्जाइमर के जितने भी इलाज या दवाएं खोजी जा रही थीं, वे सभी मुख्य रूप से एमिलॉयड प्लाक को साफ करने या रोकने पर केंद्रित थीं। लेकिन इसके बावजूद डॉक्टरों को पूरी सफलता नहीं मिल पा रही थी।
सैनफोर्ड बर्नहैम प्रीबिस की इस नई खोज ने अल्जाइमर के 'सिक्के के दूसरे पहलू' यानि विषाक्त टाऊ टेंगल्स (Tau Tangles) पर ध्यान केंद्रित किया है। वैज्ञानिकों ने पाया कि दिमाग में पाया जाने वाला SORLA प्रोटीन न केवल एमिलॉयड-बीटा के संचय को दबाता है, बल्कि कोशिकाओं के अंदर बनने वाले घातक टाऊ टेंगल्स को भी रोकता है। यानी यह खोज एमिलॉयड प्लाक से आगे बढ़कर दिमाग को सीधे अंदर से बचाने की दिशा में एक बड़ा कदम है।
वैज्ञानिक अब प्रयोगशाला में एक बेहद जटिल प्रयोग करने जा रहे हैं। वे इंसानी न्यूरॉन्स और इंसानी ग्लियल कोशिकाओं को लेकर, उन्हें जीवित चूहों के मस्तिष्क के अंदर प्रत्यारोपित (Transplant) करेंगे। इसके बाद चूहों के दिमाग के अंदर ही एक 'इंसानी दिमागी माहौल' तैयार होगा। फिर वैज्ञानिक सोरला प्रोटीन के अलग-अलग म्यूटेशन्स (उत्परिवर्तनों) का अध्ययन करेंगे। इससे डॉक्टरों को यह बिल्कुल सटीक रूप से पता चल जाएगा कि इंसानी शरीर में सोरला की कितनी मात्रा रखनी है और किस दवा से इसे एक्टिवेट किया जा सकता है।
सैनफोर्ड बर्नहैम प्रीबिस की यह खोज सिर्फ एक थ्योरी या कागजी रिसर्च नहीं है, बल्कि यह अल्जाइमर के खिलाफ लड़ी जा रही जंग में एक 'टर्निंग पॉइंट' है। अब तक दुनिया एमिलॉयड प्लाक को हटाने के पीछे भाग रही थी, लेकिन इस रिसर्च ने सीधे दिमाग की आंतरिक संरचना को बचाने का तरीका ढूंढ निकाला है। अगर सब कुछ वैज्ञानिकों की प्लानिंग के मुताबिक रहा, तो अगले कुछ सालों में हमारे पास एक ऐसी थेरेपी या दवा होगी, जो हमारे शरीर के अंदर ही सोरला (SORLA) प्रोटीन की ताकत को बढ़ा देगी। ऐसा होने पर बुढ़ापे में याददाश्त जाना हमेशा-कहावत बनकर रह जाएगा और डिमेंशिया जैसी भयानक बीमारी का नामोनिशान मिट जाएगा। विज्ञान की यह छलांग वाकई मानवता के लिए किसी वरदान से कम नहीं है!
Updated on:
20 Jul 2026 06:02 pm
Published on:
20 Jul 2026 05:21 pm
