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नहीं टूटा हौसला, नक्सल पीडि़त बच्चे फिर लौटे कस्तूरबा हॉस्टल

सुकमा जिले के दोरनापाल, एर्राबोर आदि इलाकों से माओवाद पीडि़त बच्चियां कस्तूरबा निकेतन बेलसोंडा की गोद में फिर लौट रही हैं। कानूनी अड़चनों की वजह से उन्हें कुछ माह पूर्व वापस भेज दिया गया था

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deepak dilliwar

Jul 22, 2016

Kasturba hostel

Kasturba hostel

ललित मानिकपुरी/महासमुंद.
सुकमा जिले के दोरनापाल, एर्राबोर आदि इलाकों से माओवाद पीडि़त बच्चियां कस्तूरबा निकेतन बेलसोंडा की गोद में फिर लौट रही हैं। कानूनी अड़चनों की वजह से उन्हें कुछ माह पूर्व वापस भेज दिया गया था। लेकिन वियोग से उनके चेहरे की मुस्कान छिन गई थी, वहीं उनके भविष्य को लेकर भी प्रश्नचिह्न खड़ा हो गया था। उनकी मुस्कान लौटाने और बेहतर भविष्य के लिए अभिभावक उन्हें अब स्वयं छोडऩे आ रहे हैं। माहभर में 53 बच्चियां यहां आ चुकी हैं, जिनमें 11 नई बच्चियां भी हैं। यहां कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय स्मारक ट्रस्ट के आश्रय और ममता भरी छांव में उनका पालन-पोषण और बेहतर शिक्षा-दीक्षा हो रही है। बच्चियां बहुत खुश हैं और कस्तूरबा निकेतन की फिजां में भी रौनक लौट आई है।


नक्सली ङ्क्षहसा और उससे उत्पन्न परिस्थितियों में अपने माता या पिता या दोनों को खो देने वाले इन बच्चों के जीवन ने अप्रैल 2010 में तब करवट ली, जब महिलाओं के लिए समर्पित कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय ट्रस्ट की उपाध्यक्ष और राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की पोती तारा गांधी भट्टाचार्य का रायपुर आगमन हुआ। माओवाद प्रभावित महिलाओं और बच्चियों की ओर उनका ध्यान दिलाए जाने पर उनके संरक्षण और शिक्षा-दीक्षा का दायित्व लेने के लिए शासन से पत्राचार और विशेष पहल की गई। परिणाम स्वरूप नवंबर 2010 में सुकमा जिले से करीब 50 बच्चियां कस्तूरबा राष्ट्रीय स्मारक ट्रस्ट बेलसोंडा लाई गईं। बाद 30 और बच्चियां आईं। महासमुंद जिला मुख्यालय से करीब 8 किमी. दूर 1946 से संचालित इस संस्था में 8वीं तक पंजीकृत विद्यालय पूर्व से संचालित है, जहां ग्राम की बच्चियों के साथ उक्त बच्चियों की शिक्षा-दीक्षा शुरू हुई। छह साल तक सब ठीक रहा।


छोटी बच्चियों को भी छोड़ गए आदिवासी

कस्तूरबा आश्रम से बच्चियों का इतना लगाव हो गया था कि वे लौटना नहीं चाहती थीं। उनके अभिभावक भी ट्रस्ट के ही आश्रय में रखने की गुहार करने लगे। नक्सल प्रभावित बच्चियों और उनके अभिभावकों की पीड़ा को महसूस करते हुए संस्था ने नया रास्ता निकाला और अब कस्तूरबा निकेतन आवासीय विद्यालय प्रारंभ किया गया है। जहां उन बच्चियों की शिक्षा-दीक्षा फिर प्रारंभ की गई है। यहां का वातावरण नक्सल पीडि़त आदिवासियों को इतना भाया कि अपनी छोटी बच्चियों को भी यहां लेकर आए। पहली कक्षा में दर्जनभर बच्चियां दाखिल की गई हैं। 46 बच्चियां प्राइमरी में, 2 नवमीं, 4 दसवीं और एक बारहवीं में है।


इस कारण भेजा गया था वापस

दरअसल इन बच्चियों को आश्रय देने के लिए किशोर बाल अधिनियम के तहत बालिका आश्रम के रूप में पंजीयन हुआ। संस्था शासन से कोई अनुदान नहीं लेती थी, लेकिन जिले में एकलौता आश्रम होने के कारण यहां समस्यामूलक बच्चियों को भी भेजा जाने लगा।


कस्तूरबा गांधी राष्ट्रीय स्मारक ट्रस्ट बेलसोंडा की संस्था प्रमुख कृष्णा दीदी ने बताया कि इन बच्चियों से हमारा और हमसेे इन बच्चियों का कितना लगाव है, इसे हम शब्दों में नहीं व्यक्त कर सकते।