
शहीदों की शहादत का हो रहा अपमान, राष्ट्रीय पर्वों में भी नहीं किये जाते याद
महोबा. चेहरों पर फक्र ओर दिलों मैं मायूसी वीर सपूतों के परिजनों की यही है कहानी जी हां बुंदेलों की वीर धरती के सपूतों ने अपना शौर्य एवं पराक्रम का लोहा हमेशा से ही दुश्मनों को मनवाया। कारगिल युद्ध में यहां के जगदीश यादव जैसे भारत माता के सच्चे देशभक्तों ने दुश्मनों की राह मैं काटे बिछाये ओर युद्ध में विजयश्री हासिल कर देश प्रदेश और महोबा जिले का नाम रोशन किया। तो वहीं दंतेवाड़ा में नक्सलियों से लोहा लेते समय महोबा के एक ओर लाल राकेश चौरसिया ने अपने प्राण न्योछावर कर दिए। दोनों वीर सपूतों के परिजनों ने देशभक्ति के लिए उनका हौसला तो बढ़ाया जिसका शहीदों के परिजनों के चेहरों मैं फक्र दिखता है। लेकिन उनके परिवार के लोग शासन प्रशाशन की उपेक्षा से आहत है। कहते हैं उनके बेटे भाई ने देश की खातिर अपने प्राण न्योछावर कर दिए लेकिन बदले में उन्हें अनदेखी ओर उपेक्षा के जख्म मिले हैं। जिससे साफ हो गया है कि शहीदों के परिजन आज भी बदहाली का जीवन जीने को मजबूर है कहते हैं। ना ही कोई सरकारी मदद मिली और ना ही कोई नौकरी। ऐसे में सिर्फ और सिर्फ वीर जवानों की यादों के सहारे जीवन काट रहे हैं।
महोबा जिले के पचपहरा गांव में रहने वाले वीर सपूत जगदीश यादव ने 2 जून 1999 को कारगिल युध्द में पाकिस्तान से लड़ाई के दौरान दुश्मनों को सबक सिखाते हुए भारत माता का सिर गर्व से ऊंचा किया था। देश की खातिर अपनी जान न्योछावर करने वाले वीर सपूत की पत्नी को भारत सरकार की सहायता राशि मिली। जिससे बाद जगदीश की पत्नी गांव छोड़ झांसी में रहने लगी। मगर आज जगदीश यादव की मां की आंखें किसी राष्ट्रीय पर्व आते ही नम हो जाती हैं। जगदीश यादव की मां कहती हैं कि देश की खातिर मेरे बेटे ने प्राणों की बलि दी है। जरूरत पड़ी तो में अपने दो और बेटों को देश की सेवा में भेज दूंगी। अब तो जगदीश की तस्वीर ही सीने में लगाकर रोते रहते हैं। मगर आज दुख होता कि देश की खातिर मरते दम तक संघर्ष किया जिसकी समाधि स्थल पर कोई प्रशासनिक नुमाइंदा दो फूल तक चढ़ाने को आगे नहीं आता है।
महोबा के दूसरे वीर सपूत की कहानी भी अलग नहीं है। दंतेवाड़ा में नक्सलियों से मोर्चा लेने के दौरान वीर सपूत और सीआरपीएफ में तैनात राकेश चौरसिया को नक्सलियों ने बड़ी ही बेदर्दी से निशाना बनाया था। राकेश चौरसिया, जो 2009 में छत्तीसगढ़ में नक्सली हमले में शहीद हो गये थे। तब से अभी तक 9 साल बाद भी इनका परिवार किसी भी सरकारी सुविधा, आर्थिक मदद से वंचित है और हद तो यह है शहीद राकेश चौरसिया का स्मारक आधा अधूरा पड़ा है और उनकी मूर्ति भी नही स्थापित की जा सकी है। देश के लिए शहादत देने वाले को मरने के बाद भी सम्मान नहीं मिल पा रहा है। परिवार के भरण पोषण की जिम्मेवारी राकेश के कंधों पर थी। छोटी बहन की शादी को लेकर राकेश हमेशा परेशान रहता था। राकेश छुट्टियां बिताने के लिए जब भी घर पहुंचता तो मां से बहन की शादी करने की बात कह बूढ़े मां बाप का दिल जीत लेता था। मगर तभी अचानक राकेश की शहादत की खबर मिलते ही परिजनो में कोहराम मच गया। मां बाप की आंखों का तारा ऐसे भी कभी ओझल हो जाएगा यह कभी सपने भी नहीं सोच था अब आंखों में आंसू सैलाब बनकर निकलते हैं ओर राकेश को याद कर सोचते रहते हैं। भारत सरकार की मदद मिली राष्ट्रति एपीजे अब्दुल कलाम ने वीरता पुरस्कार से सम्मानित किया था। मगर उत्तर प्रदेश सरकार से आज तक कोई भी मदद नही मिली है। अमर शहीद राकेश के समाधि स्थल को परिवारिक सहयोग से किसी तरह बनवाया गया है। जिला प्रशासन ने कोई मदद नही की है।
Published on:
15 Aug 2018 09:05 am
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