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असम की 47 लाख विवाहित बांग्लाभाषी महिलाएं सांसत में

इसतरह अदालत का फैसला करीब एक करोड़ लोगों से ज्यादा को प्रभावित करनेवाला होगा।

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राजीव कुमार
गुवाहाटी: असम से संबंधित करीब 47 लाख बांग्लाभाषी (मुस्लिम) विवाहित महिलाएं अपनी नागरिकता के सवाल पर इनदिनों सांसत में हैं। इसकी वजह सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में चल रहा नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन (एनआरसी) का अपडेशन है। राज्य में बड़ी संख्या में घुसपैठ कर चुके बांग्लादेशियों को पहचानकर उन्हें वापस भेजने की प्रक्रिया के तहत एनआरसी- 1951 का अपडेशन किया जा रहा है। इसके लिए पहले से मान्य दस्तावेजों में शामिल गांवबूढा (ग्राम पंचायत प्रधान) से हासिल आवासीय प्रमाणपत्र (पंचायत सेक्रेटरी सर्टिफिकेट) हाईकोर्ट द्वारा 28 फरवरी-17 को अमान्य कर दिए जाने के कारण ऐसी विवाहित महिलाओं के समक्ष यह स्थिति उत्पन्न हो गई है जिनके पास इसके अलावा और कोई दस्तावेज नहीं है। सबकी निगाह हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में की गई अपील पर टिकी है। सुप्रीम कोर्ट में इसपर 22 नवंबर को अंतिम सुनवाई होनी है।

आखिर महिलाएं ही सांसत मे क्यों

इस सवाल का जवाब देते हुए सुप्रीम कोर्ट के वकील फुजैल अहमद अय्युबी बताते हैं कि पंचायत सेक्रेटरी सर्टिफिकेट खासतौर पर ऐसी महिलाओं के लिए ही मान्य था जो शादी के बाद ऐसे इलाके में चली जातीं हैं जहां उनका नाम किसी अन्य आवासीय दस्तावेज में नहीं होता। इसीलिए अपनी पहचान बताने के लिए वे माता-पिता के गांव आकर आवासीय प्रमाणपत्र हासिल करती रही हैं। अय्युबी 50 साल की मनोआरा बेवा सहित अन्य का केस सुप्रीम कोर्ट में लड़ रहे हैं जिनकी नागरिकता इसी आधार पर संदेहास्पद मान ली गई है और उन्हें कोकराझार के अस्थाई घुसपैठिया शिविर में डाल दिया गया है। राज्य में ऐसे पांच और शिविर ग्वालपाड़ा, तेजपुर, डिब्रूगढ, सिलचर और जोरहाट में चलाए जा रहे हैं, जहां संदिग्ध मतदाता सूची में शामिल लोगों को रखा जा रहा है।

हर महीने एक हज़ार लोगों की बढ़ोतरी
राज्य में विदेशियों की पहचान के लिए बनी पंचाट ने 2016 से पहले 80 हजार 194 लोगों को संदिग्ध माना था। उसके बाद इसमें अचानक तेजी आ गई है। हर माह करीब एक हजार लोगों की बढोतरी हो रही है। विदेशी पंचाट का गठन तब किया गया था जब 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने 1983 में गठित अवैध घुसपैठ निर्धारण पंचाट (आइएमडीटी) को असंवैधानिक माना था।

असम के लिए बांग्लादेशी घुसपैठ का मामला

राजनीतिक तौर पर काफी संवेदनशील रहा है। वर्तमान मुख्यमंत्री सर्वानंद सोनोवाल आठवे दशक में चले उस असम आंदोलन की ही उपज है, जिसका मुख्य मुद्दा बांग्लादेशी घुसपैठ रहा है। पिछले विधानसभा चुनाव में इस समस्या का समाधान करने का वादा ही उन्हें और भाजपा को सीएम की कुर्सी तक ले गया। हालांकि, एनआरसी में अपडेशन का काम पूरी तरह सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में किया जा रहा है। इस बारे में राजनीतिक बयान देने पर अदालत ने सोनोवाल को फटकार भी लगाई थी। इसीलिए अब सबकी निगाह सुप्रीम कोर्ट के रुख पर है, जहां यह तय होना है कि क्या पंचायत सेक्रेटरी सर्टिफिकेट, जिसपर राजस्व अधिकारी के भी हस्ताक्षर होते हैं, नागरिकता पंजीकरण के लिए मान्य होंगे या नहीं। अय्युबी कहते हैं, आखिर यह कौन बता सकता है कि किसी महिला के बाबूजी कौन है? जहां उसका जन्म हुआ है, उस गांव के लोग ही ऐसा कर सकते हैं। इसीलिए आवासीय प्रमाणपत्र के रूप में इसे राज्य सरकार, केंद्र सरकार, रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया और सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वीकृत माना था। हाईकोर्ट ने इसे अमान्य करते हुए एकतरह से सुप्रीम कोर्ट की भी अनेदेखी की है।'

कोर्ट के फैसले से प्रभावित होंगे एक करोड़ लोग

गुवाहाटी हाईकोर्ट में मनोआरा का केस लड़ चुके वकील वदूद के हवाले से यह बताया गया है कि मनोआरा ने अपने पिता का नाम 1951 की एनआरसी में होने, पिता के नाम से 1965 में जमीन के दस्तावेज और उनके 1966 की मतदाता सूची में शामिल होने के सबूत दिए थे। इसके अतिरिक्त स्कूल लीविंग सर्टिफिकेट भी प्रस्तुत किया था जिसमें पिता का नाम दर्ज है। इसके बावजूद उसकी पहचान संदिग्ध मान ली गई। अय्युबी के अनुसार गांवबूढ़ा के प्रमाणपत्र का इस्तेमाल करीब 47 लाख विवाहित महिलाओं ने किया है। यदि उसे अमान्य कर दिया जाता है तो न सिर्फ उनकी बल्कि उनके बच्चों की भी नागरिकता पर सवाल खड़े हो सकते हैं। इसतरह अदालत का फैसला करीब एक करोड़ लोगों से ज्यादा को प्रभावित करनेवाला होगा।

असम में यह मुद्दा इनदिनों उबाल पर है। यह माना जा रहा है कि अवैध घुसपैठ करनेवालों के लिए गांवबूढ़ा को प्रभावित कर फर्जी प्रमाणपत्र हासिल कर लेना कोई मुश्किल काम नहीं है। अय्युबी भी यह मानते हैं कि ऐसा संभव है। इसीलए वह ऐसे दस्तावेजों को री-वेरीफाइ कराने पर जोर दे रहे हैं। उधर असम में गरमाए इस मामले में पिछले दिनों मुसलिम संगठनों ने सरकार पर आरोप लगाया था कि वह राज्य में म्यामांर जैसी स्थिति उत्पन्न कर रही है। जमीयत उलेमा हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने नई दिल्ली में यह बयान देकर विवाद को और बढा दिया है कि 'यदि 50 लाख लोगों को नागरिकता रजिस्टर से बाहर किया जाता है तो राज्य जलने लगेगा। हम या तो मारेंगे या मरेंगे।'


सुप्रीम कोर्ट में तीन विंदुओं पर विचार--
1. नागरिकता कानून के सेक्शन 6- ए को चुनौती दी गई है। इसमें तय किया जाना है कि किसी को विदेशी मानने का कटऑफ डेट 1951 हो या 25 मार्च 1971


2. नागरिकता पंजी के पुनरीक्षण का काम खत्म करने के लिए सुप्रीम कोर्ट ने 31 दिसंबर 2017 की तारीख तय की है। काम पूरा न हो पाने के कारण इसे आगे बढ़ाने की मांग


3. क्या ग्राम पंचायत द्वारा जारी आवासीय प्रमाणपत्र मान्य है या नहीं।

विदेशी पंचाट की हकीकत-
1- असम समझौते के बाद अबतक कुल 484381 मामले विदेशी न्यायाधिकरण को भेजे गए थे। इसमें से 86489 विदेशी करार दिए गए।


2- कुल 29663 को पुशबैक किया गया जबकि, 41033 फरार हैं और 833 को डिटेंशन कैंप में रखा गया है। फिलहाल पंचाट में 18798 मामले विचाराधीन हैं।


3- सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार जिला स्तर पर 500 टास्क फोर्स बनाकर घुसपैठियों की शिनाख्त करनी है। 2015 से ये टास्क फोर्सं काम कर रही है।


मुस्लिम आबादी में बेतहाशा वृद्धिः -
- 2011 की सेंसस रिपोर्ट में यह पाया गया कि असम के कुछ जिलों में मुस्लिम आबाद में बेतहाशा वृद्धि हुई है। धुबरी जिले में तो यह बढ़ोतरी 80 फीसदी तक दर्ज की गई। उसके बाद यह मुद्दा एकबार फिर से गरमा गया। जिसका राजनीतिक फायदा2016 के विधानसभा चुनाव में भाजपा को मिला। विदेशी घुसपैठ पर लंबी लडाईलड़नेवाले सोनोवाल को सीएम पद का प्रत्याशी घोषित करने करनाभी एक मास्टर स्ट्रोक था।

सोनोवाल ने बदला स्टैंडः
सोनोवाल जबतक असम गण परिषद में रहे हिंदू और मुस्लिम दोनों तरह की घुसपैठ के खिलाफ थे। लेकिन, भाजपा में शामिल होने के बाद उनका स्टैंड बदला। अब वह सिर्फ मुस्लिम घुसपैठियों को देश से खदेड़ने की बात करने लगे हैं। इस मुद्दे पर राज्य की अन्य क्षेत्रीय पार्टियां उन्हें कटघरे में खड़ा करने लगी हैं।

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