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‘लॉ’ : रेप जैसी गंभीर समस्या पर कमजोर फिल्म, पढ़ें पूरा मूवी रिव्यू

शुक्रवार को ओटीटी प्लेटफॉर्म ( OTT Platform ) पर जारी की गई 'लॉ' ( Law Movie ) में जो कुछ है, वह काफी पहले रेखा ( Actress Rekha ) की 'घर'( Ghar Movie ), जीनत अमान की 'इंसाफ का तराजू' ( Zeenat Aman Insaf ka Tarazu ) , डिम्पल कपाडिया की 'जख्मी औरत' ( Dimple Kapadia Zakhmi Aurat ) और मीनाक्षी शेषाद्रि की 'दामिनी' ( Meenakshi Seshadri Damini ) में दिखाया जा चुका है।

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'लॉ' : रेप जैसी गंभीर समस्या पर कमजोर फिल्म, पढ़ें पूरा मूवी रिव्यू

'लॉ' : रेप जैसी गंभीर समस्या पर कमजोर फिल्म, पढ़ें पूरा मूवी रिव्यू

-दिनेश ठाकुर


मुनीर नियाजी का शेर है- 'किसी को अपने अमल (कर्म) का हिसाब क्या देते/ सवाल सारे गलत थे, जवाब क्या देते।' कन्नड़ फिल्म 'लॉ' की नायिका नंदिनी (रागिनी प्रज्वल) सामूहिक बलात्कार की यातना से गुजरने के बाद आधी रात को थाने पहुंचती है तो पुलिस वाले उससे ऐसे-ऐसे अजीब सवाल पूछते हैं कि उसकी यंत्रणा और बढ़ जाती है। मसलन- 'इतनी रात को तुम घर से बाहर क्या कर रही थीं? क्या मौका-ए-वारदात के आस-पास पुलिस नहीं थी? कोई चश्मदीद गवाह था?' अब पुलिस वालों को कौन समझाए कि अगर बचाव करने वाले या गवाही देने वाले मौजूद होते तो बलात्कार होता ही क्यों। फिर नंदिनी के पिता भी थाने पहुंच कर उसके जख्मों पर नमक छिड़कते हैं- 'इस हंगामे की क्या जरूरत है। लोग क्या कहेंगे? घर चलो बेटी।' लेकिन कानून की स्नातक नंदिनी इंसाफ के लिए लड़ने का फैसला करती है। आगे वही अदालती ड्रामा, जिसमें बचाव पक्ष के वकील बलात्कार पीड़िता के चरित्र-हनन की कोशिश करते हैं। भद्दे सवालों के जरिए उसे फिर यातना से गुजारा जाता है।

शुक्रवार को ओटीटी प्लेटफॉर्म ( OTT Platform ) पर जारी की गई 'लॉ' ( Law Movie ) में जो कुछ है, वह काफी पहले रेखा ( Actress Rekha ) की 'घर'( Ghar Movie ), जीनत अमान की 'इंसाफ का तराजू' ( Zeenat Aman Insaf ka Tarazu ) , डिम्पल कपाडिया की 'जख्मी औरत' ( Dimple Kapadia Zakhmi Aurat ) और मीनाक्षी शेषाद्रि की 'दामिनी' ( Meenakshi Seshadri Damini ) में दिखाया जा चुका है। बलात्कार की शिकार महिला की मनोदशा को 'घर' में संवेदनशीलता के साथ पेश किया गया था तो ऐसे मामलों की अदालती कार्रवाई पर 'इंसाफ का तराजू' कहीं ज्यादा मुखर थी। 'लॉ' इन दोनों मोर्चों पर मात खाती है। फिल्म की पटकथा बिखरी हुई है। कई सीन इतने हास्यास्पद हैं कि फिल्म के बजाय यह टीवी के किसी अति नाटकीय क्राइम शो जैसी लगती है, जहां हर कोई बिना बात बोले चला जाता है। फार्मूलेबाजी, नारेबाजी और ड्रामे की ओवर डोज के कारण 'लॉ' बलात्कार के खिलाफ मजबूती से खड़ी होने के बजाय शुरू से आखिर तक लड़खड़ाती रहती है। रघु समर्थ का निर्देशन फिल्म की एक और कमजोर कड़ी है।

बलात्कार के मसले पर हाल ही ज्योतिका की तमिल फिल्म 'पोंमगल वंधल' का भी डिजिटल प्रीमियर हो चुका है। उसमें भी करीब-करीब वही कमजोरियां थीं, जो 'लॉ' में बार-बार उभरती हैं। पता नहीं, दक्षिण के फिल्मकार किसी संजीदा विषय को पर्दे पर पेश करते हुए इतने 'लाउड' क्यों हो जाते हैं कि कहानी बिखर-बिखर जाती है।