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Manto Movie Review: सआदत हसन मंटो से जुड़े अनछूए पहलुओं को उकेरती है फिल्म, जबरदस्त बायोपिक

मंटो ने अपनी कहान‍ियों में समाज के ऐसे मुद्दों को उठाया जिसके कारण उनपर काफी मुकदमे हुए।

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manto

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फिल्म : मंटो

डायरेक्टर: नंदिता दास

स्टार कास्ट: नवाजुद्दीन सिद्दीकी ,रसिका दुग्गल, ताहिर राज भसीन, ऋषि कपूर, दिव्या दत्ता, रणवीर शौरी, नीरज कबि, जावेद अख्तर

अवधि: 1 घंटा 56 मिनट

सर्टिफिकेट: U/A

रेटिंग: 3 स्टार


एक लंबे अर्से से 20वीं सदी के मशहूर लेखक सआदत हसन मंटो की बायोपिक का इंतजार किया जा रहा था। मंटो ने अपनी कहान‍ियों में समाज के ऐसे मुद्दों को उठाया जिसके कारण उनपर काफी मुकदमे हुए। उनकी कहानियों की बेबाकी काफी लोगों को पचती नहीं थी। उसी विवादित लेखक की कहानी नंद‍िता दास ने पर्दे पर फिल्माया है। मूवी में मंटो का किरदार निभा रहे हैं दिग्गज एक्टर नवाजुद्दीन सिद्दीकी। साथ ही रस‍िका दुग्‍गल, परेश रावल, ऋषि कपूर और ताहिर राज भसीन भी अहम भूमिकाओं में हैं। निर्देशक नंदित दास ने मंटो के जीवन के सिर्फ चार सालों को लगभग 2 घंटे की इस फिल्म में दर्शाया है।

कहानी
फिल्म की कहानी 1946 के बॉम्बे से शुरू होती है जहां उर्दू शायर और लेखक सआदत हसन मंटो (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) अपनी पत्नी सफिया (रसिका दुग्गल) और बेटी निधि के साथ रहते है। मंटो का ख्याल हमेशा से ही सबसे जुदा है, जिसकी वजह से कभी उसकी फिल्म के प्रोड्यूसर (ऋषि कपूर) से बहस हो जाती है तो कभी फिल्म इंडस्ट्री के दोस्तों से नोक-झोक हो जाती है। इतना ही नहीं राइटर ग्रुप के दोस्तों जैसे इस्मत चुगताई (राजश्री देशपांडे) से भी इनका अंदाज काफी जुदा रहता है। इस्मत और मंटो के ऊपर लेखन के माध्यम से लाहौर में अश्लीलता फैलाने का केस चल रहा होता है। उसी दौरान भारत का बंटवारा हो जाता है। जिसकी वजह से बॉम्बे को बेइंतेहा प्यार करने वाले मंटो को सबकुछ छोड़ कर पाकिस्तान जाना पड़ता है। पाकिस्तान में मंटो को अपने लिखे गए 'ठंडा गोश्त' कहानी के लिए केस झेलना पड़ता है और अंततः कहानी में कुछ दिलचस्प मोड़ आते हैं।

एक्टिंग
जो लोग मंटो को पहले से जानते हैं उन्हें यह मूवी बेहद पसंद आएगी। साथ ही नए दर्शकों के लिए भी यह फिल्म एक सही बायोपिक के रूप में बनाई गई है। एक्टिंग की दृष्टि से नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने मंटो के व्यक्तित्व को पर्दे पर एकदम से जिंदा कर दिया है। नवाजुद्दीन ने मंटो की प्रतिभा, हाज़िरजवाबी, और खुद के साथ आत्मघातपन और दर्दनाक दुर्दशा को पूरी ईमानदारी से पेश किया है। साथ ही रसिका दुग्गल ने मंटो की पत्नी के रूप में अच्छा काम किया है। साथ ही फिल्म को काफी अच्छे तरीके से दर्शाया गया है। आजादी के समय को नंदिता दास ने उस समय प्रयोग में आने वाले उपकरणों और वेशभूषा के साथ-साथ सभी जरुरी बातो का ध्यान रखते हुए दिखाया है।

कमजोर कड़ी
फिल्म की कहानियां एक दूसरे के साथ नहीं बिठा पाती हैं। फिल्म का पहला हिस्सा थोड़ा धीमा है। हालांकि दूसरा हिस्सा रफ्तार पकड़ लेता है।