वाकई, मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए

inspirational life changing: जेब से खर्च कर संवार रहे वंचित बच्चों का भविष्य, 110 बच्चों को दे रहे शिक्षा, 850 को किया शिक्षित

By: Arun lal Yadav

Published: 05 Sep 2019, 07:02 AM IST

अरुण लाल

मुंबई. विपरीत परिस्थितियों में शिक्षा की लौ प्रज्जवलित करने वाले ही सही मायने में शिक्षक दिवस जैसे विशेष दिन का अर्थ साकार करते हैं। जयपुर के प्रताप नगर में रहने वाले चतुर्वेदी दम्पती हेमराज और रेखा ने अपनी जिन्दगी को ऐसे बच्चों के लिए समर्पित कर दिया, जिनके लिए शिक्षा के मायने कुछ नहीं हैं। क्योंकि जिन हालात में वे जीते हैं, वहां दो समय की रोटी आैर तन ढकने के लिए को कपड़े जुटाने की मशक्कत रहती है। पर, जिस लक्ष्य को लेकर 2006 में चतुर्वेदी दम्पती निकले उसमें पूरी तरह से खरा उतरकर वे 850 से अधिक बच्चों के भविष्य को संवारने का काम कर चुके हैं। इतना ही नहीं,जिस मुहिम को लेकर वे दोनों निकले, उससे 100 से अधिक लोगों को और जोड़ लिया। भलाई के रास्ते में अच्छाई का साथ देने के लिए लोग जुड़ते गए और यह कुनबा मिलकर वर्तमान में 110 बच्चों की जिन्दगी संवारने का काम कर रहा है। इनमें भी 30 बच्चों के दोपहर भोजन की व्यवस्था चतुर्वेदी दम्पती अपने निजी खर्चे पर करते हैं। इन बच्चों में ज्यादातर घूमंतू जातियों के हैं, जहां दसवीं कक्षा उत्तीर्ण मिलना भी कठिन है। 13 साल के इस सफर में उन्होंने कभी किसी से मदद नहीं मांगी और अपनी कमाई के 40 लाख रुपए खर्च कर वंचित बच्चों के लिए आश्रम का निमार्ण कराया। हेमराज ने बताया, मैं अनाज का व्यापार कर परिवार के साथ सुखी जीवन जी रहा था। 2006 में किसी काम से निकला तो त्रिमूर्ति सर्कल पर मरणासन्न महिला दिखी। कोई उसे अस्पताल ले जाने को तैयार नहीं था। मैं उसे लेकर गया तब तक उसकी मौत हो गई। डॉक्टर ने बताया कि भूखे रहने से उसकी जान चली गई। मैं अंदर तक हिल गया और तय किया कि अपने शहर में किसी को भूख मरने नहीं दूंगा। काम शुरू कर किया तो बहुत समस्याएं आईं। छोटे बच्चे नशे की चपेट में थे। मुझे लगा कि बिना शिक्षा के कुछ संभव नहीं। फिर काम शुरू किया तो बहुत लोग जुड़ गए।

मुश्किलें हर कदम पर आईं, नीयत अच्छी हो तो सब ठीक

 

वाकई, मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए

रेखा चतुर्वेदी ने बताया, मैं भी समाज के लिए कुछ बेहतर करना चाहती थी। 2007 में मेरा विवाह हेमराज के साथ हुआ तो देखा कि उन्होंने बस्तियों के बच्चों को पढ़ाने का बीड़ा उठा रखा है। फिर क्या था,उनके पीछे चल पड़ी। कठिन था शुरुआत में बच्चों के अभिभावकों को समझाना, पर सकारात्मक सोच रखी तो परिणाम सामने आने लगे। एक बच्ची जो गलियों में दर-दर ठाकरें खाती थीं, आज बीएससी कर रही है। हमारे पढ़ाए 850 बच्चे जब 850 परिवारों में बदलेंगे तो आने वाली पीढि़यों का जीवन स्वतः बेहतर हो जाएगा। मेरे दो बच्चे हैं और उनकी शिक्षा की तरह अन्य बच्चों शिक्षा का भी प्रबंध कर सकें तो सच्ची मानव सेवा होगी।

शिक्षा से मिलेगा हर समस्या का समाधान

वाकई, मुश्किल नहीं है कुछ भी अगर ठान लीजिए

हेमराज ने बताया कि यहां हर बच्चे की अपनी कहानी है। इनके परिवारजन इतने डरे थे कि सरकारी अस्पताल में दवाई लेने तक नहीं जाते थे। बाद में बच्चों ने अपने माता-पिता को सरकारी अस्पताल में मिलने वाले फ्री इलाज के बारे में बताया तो उनको भी बदलाव महसूस हुआ। इसी तरह से सबको वंचित समाज को शिक्षित करना होगा। वे शिक्षा लेने नहीं आएंगे, पर हमें उन्हें शिक्षा देनी होगी, तभी भारतीय समाज की उन्नति होगी।

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