कलक्ट्रेट/एसपी दफ्तर में गाहे-बगाहे देता है पत्र, दिला दो बेटे को राष्ट्रपति पुलिस पदक, केन्द्र सरकार ने कर दी मनाही फिर भी कह रहा है कि संघर्ष नहीं छोडृंगा, जब फैज मोहम्मद को मिला तो खुमाराम को क्यों नहीं
नागौर. बेटे कांस्टेबल खुमाराम की शहादत पर बड़ा गुमान था, पिता मोहनराम को। इन सात साल में एसपी भी बदले और कलक्टर भी पर नहीं बदला तो मोहनराम। गुढ़ा भगवान दास से करीब 35 किलोमीटर की दूरी है नागौर मुख्यालय में बने जिला कलक्ट्रेट और एसपी कार्यालय की। पिछले सात साल से कमोबेश यहीं बीता है उसकी जिंदगी का बड़ा हिस्सा।
वो बुधवार को दोपहर में यहीं जिला कलक्ट्रेट में घूम रहे थे। हाथ में एक थैला और इसमें थी खुमाराम से जुड़ी तमाम यादें या यूं कहे दस्तावेज। इन्हीं कागजों में था खुमाराम के राष्ट्रपति वीरता पुलिस पदक के प्रस्ताव खारिज करने का पत्र भी। अंग्रेजी में था, दो पत्र हिंदी में जिला कलक्ट्रेट और एसपी कार्यालय की ओर से उसके नाम जारी हुए थे। जिसमें लिखा था कि खुमाराम को राष्ट्रपति पुलिस पदक से सम्मानित नहीं किया जा सकता। अपनी जुबान से यह बात मोहनराम नहीं बता पाया, बस कागज बता दिए और निराश हो चुकी आंखें इस बात की तस्दीक कर रही थी कि वो सपना अब टूट गया जिसके लिए वो इतने दिनों से यहां चक्कर लगा रहा था। अधिकांश पुलिस वाले ही नहीं कलक्ट्रेट में लगा चपरासी तक उसे पहचानने लगा था।
रुआंसी आवाज में बोलने लगे , ज्यादा पढ़ा-लिखा तो हूं नहीं। अभी कुछ दिन पहले ही एसपी-कलक्टर को पत्र भिजवाया है। 21 अक्टूबर को शहीद दिवस है, मेरी इच्छा है कि इस शहीद दिवस पर खुमाराम को राष्ट्रपति वीरता सम्मान पदक मिले। यह पूछने पर कि अब तो मनाही हो गई, अब क्या होगा? मोहनराम बोलने लगे, फैज मोहम्मद जैसे कई पुलिसकर्मियों को मिला है तो खुमाराम को क्यों नहीं? उसने भी तो ड्यूटी में जान गंवाई, बहादुरी से वो तो लड़ा पर मैं तो अपनी बात को ढंग से समझा भी नहीं पाया। यह कहते हुए बोला, अभी तो चलता हूं, पर मेरा संघर्ष जारी रहेगा। अभी बेटी संगीता को भी आश्रित कोटे से नौकरी नहीं मिल पाई है, उसका मामला भी कोर्ट में चल रहा है। दूसरा बेटा रामेश्वर तो लग गया। पता नहीं नसीब में क्या लिखा है? बहुत कुछ खोया, राष्ट्रपति वीरता पुलिस पदक का सम्मान नहीं मिलने का बड़ा दुख है।
आनंदपाल और उसके साथियों से मुठभेड़
गैंगस्टर आनंदपाल सितम्बर 2015 को अपने दो साथियों के साथ परबतसर में पेशी के दौरान भाग छूटा था। उसके साथी तो कुछ समय में पकड़े गए पर आनंदपाल का सुराग नहीं लग रहा था। ऐसे में 21 माचज़् 2016 को नागौर कंट्रोल रूम में आनंदपाल के एक गाड़ी में होने की सूचना मिली तो नाकाबंदी कराई गई। नागौर की क्यूआरटी टीम के खुमाराम के साथ कांस्टेबल अशोक कुमार, रामसुख, हरेंद्र, श्रीपाल और गोविंदराम ने इस संदिग्ध वाहन का पीछा किया। कालड़ी तिराहा, गुढ़ा भगवानदास में आनंदपाल और उसके साथियों के फायरिंग कर नागौर की तरफ जाने की सूचना मिली तो गुढ़ा भगवानदास के समीप बदमाशों ने पुलिसकमिज़्यों पर फायरिंग शुरू कर दी। इस फायरिंग में खुमाराम शहीद हो गया था। तब उसके परिवारों को नियमों के अनुसार पुलिस मुख्यालय से सहयोग दिया गया। बावजूद इसके तब से उसको राष्ट्रपति पुलिस पदक दिए जाने की मांग चल रही थी।
लम्बी कवायद के बाद टूटी उम्मीद
तत्कालीन एसपी अनिल परिस देशमुख के बाद आए अन्य पुलिस अधीक्षक भी बार-बार इस संदर्भ में पुलिस मुख्यालय का ध्यान दिलाते रहे। हालांकि राज्य सरकार की ओर से केन्द्रीय गृह मंत्रालय को खुमाराम संबंधी प्रस्ताव चार अप्रेल 2017 को ही भेज दिया गया था। उसके बाद बस पत्र जारी होते रहे, इधर शहीद के पिता मोहनराम कलक्टर/एसपी के पास चक्कर काटते रहे। करीब पौने सात साल बाद यह उम्मीद भी टूटकर बिखर गई।
साथी भी कर रहे हैं गैलेन्ट्री अवॉर्ड का इंतजार
खुमाराम के साथी कांस्टेबल हरेंन्द्र डूडी, अशोक कुमार, श्रीपाल, गोविंदराम और चालक रामसुख को मार्च 2016 में तत्कालीन पुलिस महानिदेशक मनोज भट्ट ने गैलेन्ट्री अवार्ड देने की घोषणा की थी। 25 जुलाई 2016 को गैलेन्ट्री अवार्ड का यह प्रस्ताव अजमेर रेंज आईजी के पास पहुंचा, जहां से चार दिन बाद इसे जयपुर भेजा गया। खास बात यह कि करीब डेढ़ साल बाद इन पांचों जवानों को प्रमोशन तो नहीं मिला, हां बतौर इनाम के दस-दस हजार रुपए इनके खाते में डाल दिए गए। 27 जुलाई 2018 को तत्कालीन नागौर एसपी अनिल परिस देशमुख ने दोबारा गैलेन्ट्री प्रमोशन की फाइल अजमेर रेंज आईजी के पास भिजवाई, जहां से यह 17 मई 2018 को जयपुर पुलिस मुख्यालय भेजी गई। इसके बाद तीन साल से अधिक का अरसा यूं ही गुजर गया, न कोई चिठ्ठी न संदेश। जून 2021 में नागौर के तत्कालीन एसपी अभिजीत सिंह ने इन पांचों का एक बार फिर प्रस्ताव भिजवाया। सेवानिवृत्ति से पहले तत्कालीन डीजी एमएल लाठर ने इसके लिए आश्वस्त भी किया था, लेकिन मामला आगे नहीं बढ़ा
अब शहीद की बहन का मामला अदालत में
सूत्रों का कहना है कि शहीद खुमाराम की बहन संगीता को नौकरी मिलना लगभग तय हो चुका था। आश्रित कोटे में उसे नौकरी मिलनी थी, उसका दूसरा भाई रामेश्वर कुछ समय पूवर अध्यापक में चयनित हो गया। बताया जाता है कि अब नियमों के फंसे पेंच ने संगीता को नौकरी देने से मना कर दिया। इसके लिए उसने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया है।