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नागौर

VIDEO…दो साल के बाद मिलेंगे नीम, जामुन व पीपल के मजबूत व सुदृण पौधे

नागौर की नर्सरियों में मदर बेड तकनीकी से टोल प्लांट तैयार करने में वनकर्मी लगे हुए हैं। दो साल बाद यह पांच से फीट होने के साथ बेहद मजबूत और सुदृण पौधे के रूप में नजर आएंगे।इन पौधों को किया जा रहा तैयारटोल प्लांट में नीम, पीपल, शीशम एवं करंज आदि की पौध तैयार की […]

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नागौर की नर्सरियों में मदर बेड तकनीकी से टोल प्लांट तैयार करने में वनकर्मी लगे हुए हैं। दो साल बाद यह पांच से फीट होने के साथ बेहद मजबूत और सुदृण पौधे के रूप में नजर आएंगे।
इन पौधों को किया जा रहा तैयार
टोल प्लांट में नीम, पीपल, शीशम एवं करंज आदि की पौध तैयार की जा रही है। विभागीय अधिकारियों का कहना है कि टोल प्लांट के पौधों के लिए कम से कम एक से दो बीघा जमीन की आवश्यकता होती है। इसके बाद चयनित क्षेत्र की मिट्टी को खेतों की तर्ज पर नम करने का काम किया जाता है। इसके बाद फिर इसमें बीज की बुआई की जाती है। बुआई के दौरान इसके तापमान, बढऩे की ग्रोथ पर पूरा ध्यान दिया जाता है। हालांकि इसमें से कुछ पौधे सूख जाते हैं तो इनको वहां से तुरन्त हटा भी दिया जाता है। इस तरह से इसकी पूरी कम से कम दो साल तक देखभाल की जाती है।
मदर बेड तकनीकी से तैयार हो रहे पौधे
जिला मुख्यालय के गोगेलाव कंजर्वेशन क्षेत्र में मदर बेड तकनीकी से पौधे तैयार किए जा रहे हैं। पौधों की देखभाल में जुटे वनकर्मी ने बताया कि मदर बेड तकनीकी से इसमें बीज डाल पौध तैयार की जाएगी। इस दौरान इनकी ग्रोथ और मिट्टी की स्थिति पर पूरी नजर रखी जा रही है। बीज के माध्यम से मदर बेड तकनीकी में छोटे पौधे विशेष देखभाल के साथ तैयार किए जा रहे हैं। पौधे की ग्रोथ पर थैलियों में मिट्टी के साथ डालकर बेड में रखा जाएगा। इसके पश्चात वितरण होने तक यह पूरी तरह से निगरानी में रहेंगे। टोल प्लांट पौधों में भी यही तकनीकी है, लेकिन इसको कम से कम दो साल तक संरक्षित करना होता है।
जिले में 10 लाख से 12 लाख पौधे तैयार होंगे
वन विभाग की नागौर जिले में कुल 11 नर्सरियां हैं। यहां पर अगले मानसूनी सीजन के लिए लगभग दस लाख से 12 लाख तक पौधे तैयार करने का लक्ष्य है। इनको तैयार करने के लिए भी मदर बेड तकनीकी की मदद ली जाएगी। इन पौधों की मदर बेड तकनीकी से जमीन में बिंजाई कर लगभग तीन इंच तक बड़े होने पर प्लास्टिक की थैलियों में लगा दिया जाएगा। फिर इनका वितरित होने से पूर्व तक प्लास्टिक की थैलियों में ही संरक्षित कर रखा जाएगा।
विशेष आकर्षण….


इनका कहना है…
मदर बेड तकनीकी दो प्रकार की होती है। एक तकनीकी में टोल प्लांट की जमीन में ही बिजाई कर उसे कम से कम से कम दो साल तक संरक्षित किया जाता है, जबकि दूसरी तकनीकी में पौधों के थोड़ा बड़े होने पर उसे प्लास्टिक थैलियों में डालकर संरक्षित किया जाता है। जिले की नर्सरियों में दोनो ही प्रकार के पौधों को तैयार करने का काम शुरू कर दिया गया है।
सुनील कुमार, उपवन संरक्षक, वन विभाग नागौर