
Cotton is being sold for three hundred rupees a kg in this market.
नागौर. सर्दी की दस्तक के साथ ही बाजार में रूई की मांग बढ़ गई है। मांग बढऩे के साथ ही इनकी कीमतों में भी दस से पंद्रह प्रतिशत का इजाफा हुआ है। विशेषकर पाली से आने वाली रूइयां तो प्रति किलो 300 किलोग्राम के हिसाब से बिक रही है। रूइयों से भरी रजाइयों की कीमत पर भी बढ़ी कीमतों का असर पड़ा है। व्यवसायियों की माने तो हालांकि बाजार में 50 रुपए प्रति किलो से रूई मिलना शुरू हो जाती है, लेकिन बेहतर रजाइयां बनाने के लिए दो सौ से तीन सौ रुपए प्रति किलो के हिसाब से ली तो फिर सर्दी में इसका फायदा मिलेगा।
जाड़े की ठंडक का अहसास होने के साथ ही अब रजाइयां बनवाने के लिए लोग घरों से बाहर निकलने लगे हैं, लेकिन इस बार रूइयों के भाव उनको हैरान करने लगे हैं। गत वर्ष की अपेक्षा इस बार बढ़े हुए दाम के कारण रूइयों की खरीद में दिलचस्पी कम दिखा रहे हैं। हालांकि खरीदारों की फेरहिस्त में 300 रुपए प्रति किलो की दर से खरीद करने वाले भी शामिल हैं, लेकिन ज्यादातर लोग पचास, साठ, 80 व सौ रुपए प्रति किलो की दर से बिकने वाली रूइयां ही खरीद रहे हैं। शहर के काजियों का चौक में इसकी करीब आधा दर्जन दुकानें हैं। यह वह वो दुकानें जहां पर नई या पुरानी रूइयों से रजाइयां बनाई जाती हैं। हालांकि इसकी दुकानें अन्य जगहों पर भी हैं, लेकिन बनाने का काम ज्यादातर केवल यही पर किया जाता है। दुकानदारों की माने तो लोग पुरानी रजाइयों की रूइयां निकलवाकर उन्हीं पुरानी रूई की रजाइयां बनवाने में भी खासी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। व्यसायियों का मानना है कि जीएसटी के दायरे में आने से भी इसकी दर बढी है। कारण है कि अच्छी रूइयां एवं रूइयों से बनी रजाइयां नोखा एवं पाली से मंगाई जा रही है। खासकर पाली की रूई की गुणवत्ता में बेहतर होने के कारण इस बार तीन सौ रुपए प्रति किलो की दर से बिक रही है। इसके अलावा रजाइयां बनाने में प्रयुक्त होने वाले सामानों दरें भी बढ़ी है।
रजाइयों की कीमत रुइयों पर पर निर्भर
दुकानदारों का कहना है कि रजाइयां एक हजार से लेकर अधिकतम रेंज तक उपलब्ध है। कई लोग रूइयां खरीद कर रजाइयां बनवाते हैं तो वह फिर थोड़ी मंहगी पड़ जाती है। मसलन पचास रुपए प्रति किलो की दर से रूइयों की खरीद कर रजाइयां बनी तो इसकी दर कम रहेगी, लेकिन यह भी खरीदार पर ही यह निर्भर रहता है कि कितनी लंबी एवं चौड़ी रजाइयां बनवाना चाहता है। खरीदारों के हिसाब से भी बनी रजाइयां रहती है। इनकी दर भी रूइयों के हिसाब से रहती है। पिछली बार लोगों की मांग के अनुसार नोखा व पाली रुइयां मंगाने के साथ ही जयपुरिया रजाई भी मंगाकर दी गई थी। अब यह ग्राहक की पसंद व उसके बजट पर निर्भर रहता है कि वह कौन सी वेराइटीज लेना चाहता है।
लोगों को बेहतर गुणवत्ता देने का प्रयास करते हैं
काजियों का चौक में दुकानदार इस्लामुद्दीन बताते हैं कि वह पिछले कई सालों से रजाइयों को बनाने का कारोबार कर रहे हैं। दरें तो ऊपर नीचे होती रहती हैं। इस बार भी दरें तो बढ़ी हैं, लेकिन इतनी ज्यादा नहीं बढ़ी है कि खरीद के पहुंच से बाहर हो। इसके बाद भी वह लोगों को नई व पुरानी रुइयों से बनने वाली रजाइयों की गुणवत्ता के बारे में विस्तार से जानकारी देते हैं। ताकि खरीद के बाद लोगों को कोई शिकायत न रहे। उन्होंने कहा कि अभी तो सर्दी की शुरुआत हुई है, लेकिन पंद्रह से बीस दिनों के अंतराल में इसका कारोबार बेहतर होने की पूरी उम्मीद है।
बाजार में बढ़ी हलचल: कोविड-19 ने खत्म कर दिया था बाजार
रजाइयों बाजार माने-जाने वाले काजियों का चौक में लंबे समय के बाद गुरुवार को दुकानों पर खरीदारों की हलचल नजर आई। कई दुकानों पर रजाइयों का मोलभाव करने के साथ ही रूइयों की खरीद करते ग्राहक नजर आए। बाजार का सन्नाटा टूटने से दुकानदार उत्साहित नजर आए। व्यसायियों की माने तो पिछले दो सालों के अंतराल में रजाइयों का कारोबार पूरी तरह से शून्य रहा। पहले से स्टॉक किया गया माल में काफी खराब हो गया। कुछ बचा तो भी वह केवल अपने रिश्तेदारों या घरवालों के काम में रजाइयां बनाने के लिए काम में आई। कारण सर्दियों के साथ दबे पांव आए कोविड-19 ने खरीदारों में दहशत भर दी थी। जिसके चलते एक भी रजाइयां उस दौरान वह लोग नहीं बना पाए
नागौर. बाजार में काजियों का चौक में बढ़ी हलचल
Published on:
10 Nov 2022 10:13 pm
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