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Nagori bull: 20 लाख तक पहुंच जाती है नागौरी बैलों की कीमत, फिर भी खरीदने से डर रहे पशुपालक, जानिए क्यों

नागौर में आयोजित राज्य स्तरीय श्री रामदेव पशु मेले में नागौरी नस्ल के बैलों की खरीद के लिए देशभर से पशुपालक पहुंचे हैं। मांग तो पहले जैसी ही है, लेकिन सुरक्षित परिवहन और अनुमति प्रक्रिया को लेकर पशुपालकों में चिंता बनी हुई है।

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नागौरी बैल। फोटो- पत्रिका

नागौर। जिला मुख्यालय पर आयोजित विश्व प्रसिद्ध राज्य स्तरीय श्री रामदेव पशु मेले में हरियाणा, पंजाब, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश सहित देश के कई अन्य राज्यों से पशुपालक नागौरी बैलों की खरीद के लिए पहुंचे हैं। नागौरी नस्ल की कद-काठी, ताकत, चाल और सुंदरता के कारण यहां के बैलों की मांग आज भी उतनी ही है, जितनी पहले थी।

खेती में सबसे उपयुक्त बैल

खेती में भले ही मशीनों का उपयोग बढ़ गया हो, लेकिन गन्ने और धान की खेती में सबसे उपयुक्त बैल ही हैं और उनमें भी सबसे उपयुक्त नागौरी नस्ल है। परिवहन में विभिन्न परेशानियां आने के बावजूद मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, हरियाणा, पंजाब सहित अन्य राज्यों के किसान यहां मेले में बैल खरीदने आते हैं। इस बार भी आए हैं, लेकिन उनके मन में एक ही चिंता है कि खरीदे गए बैलों को सुरक्षित तरीके से अपने-अपने राज्यों तक ले जा पाएंगे या नहीं।

सरकारी तंत्र से शिकायत

मेले में आए कई पशु व्यापारियों का कहना है कि नागौरी बैलों की कीमत और विशेषता को दूसरे राज्यों के पशुपालक समझते हैं, लेकिन सरकारी तंत्र अभी भी पीछे है। पशुपालकों के लिए सुरक्षित परिवहन, स्पष्ट अनुमति प्रक्रिया और मेले के दौरान सहयोगात्मक माहौल तैयार किया जाए, तो न केवल पशुपालकों को राहत मिलेगी, बल्कि गोवंश की दशा भी सुधर सकती है। नागौर का पशु मेला एक बार फिर देशभर में अपनी अलग पहचान बना सकता है, बशर्ते सरकार अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से समझे और उसे निभाए।

बैलों की दौड़ में नागौरी नस्ल का कोई सानी नहीं

मेले में आए पशुपालकों का कहना है कि नागौरी बैल आज भी पारंपरिक खेती की रीढ़ हैं। विशेष रूप से गन्ने और धान की खेती में इनकी उपयोगिता किसी भी आधुनिक साधन से अधिक है। इसके साथ ही पंजाब और हरियाणा में आयोजित होने वाली बैलों की दौड़ में भी नागौरी नस्ल ने अपनी अलग पहचान बनाई है।

प्रतियोगिताओं में जीतने वाले नागौरी बैलों की कीमत लाखों रुपए तक पहुंच जाती है। हरियाणा से आए पशुपालक स्वरूपसिंह ने बताया कि दौड़ में प्रथम आने वाले बैलों की कीमत 15 से 20 लाख रुपए तक होती है। यही कारण है कि दूसरे राज्यों के पशुपालक नागौर मेले का बेसब्री से इंतजार करते हैं।

सुरक्षित परिवहन का मिले आश्वासन

पंजाब से आए पशुपालक गुरपाल सिंह और मध्यप्रदेश के छिंदवाड़ा से आए पशुपालकों ने बताया कि नागौरी नस्ल के बैल देशभर में अपनी ताकत और दमखम के लिए प्रसिद्ध हैं। उनका कहना है कि यदि सरकार मेले के आयोजन के साथ-साथ बैलों के परिवहन की पुख्ता व्यवस्था कर दे, तो खरीदारों की कमी नहीं है।

रास्ते में आने वाली परेशानियों के डर से पशुपालकों ने यहां आना कम कर दिया है। यदि परिवहन की प्रभावी व्यवस्था हो जाए, तो नागौर का पशु मेला एक बार फिर पुराने गौरव को प्राप्त कर सकता है। वर्तमान में स्थिति यह है कि मेले में बैलों की खरीद तो हो रही है, लेकिन परिवहन और अनुमति को लेकर स्पष्ट दिशा-निर्देश नहीं होने से पशुपालक असमंजस में हैं।

सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान

नागौर जिले के पशुपालकों का कहना है कि नागौरी बैल सिर्फ एक पशु नहीं, बल्कि क्षेत्र की सांस्कृतिक और आर्थिक पहचान हैं। वर्षों से नागौर और आसपास के क्षेत्रों में नागौरी नस्ल का संरक्षण और संवर्धन किया जाता रहा है, लेकिन समय के साथ नीतियों की अस्पष्टता और परिवहन संबंधी बाधाओं के कारण पशुपालकों को नुकसान उठाना पड़ रहा है। खरनाल के प्रेमसुख जाजड़ा ने बताया कि यदि सरकार गोवंश संरक्षण को लेकर वास्तव में गंभीर है, तो उसे जमीनी स्तर पर ठोस कदम उठाने होंगे।

नागौरी नस्ल के बैल की विशेषता

नागौरी नस्ल के बैल अपनी बेजोड़ ताकत, घोड़े जैसी फुर्ती और लंबी कार्यक्षमता के लिए जाने जाते हैं। इनका रंग सफेद या हल्का स्लेटी होता है, कद ऊंचा, माथा घोड़े जैसा उभरा हुआ, पैर लंबे होते हैं और ये बिना थके 12-13 घंटे तक काम कर सकते हैं, जो इन्हें खेती और ढुलाई के लिए बेहतरीन बनाता है। साथ ही इनका स्वभाव भी शांत होता है।

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