
एक पीपल के पौधे से आई चेतना और लाखों पेड़ लगाकर बन गए ‘पद्मश्री हिम्मताराम भांभू’
नागौर
‘मेरे मुकाम पर रश्क करने वाले, तूने देखा ही कहां मेरा पैदल चलना’ यह शेर पीपल का पेड़ लगाने से लेकर देश का सर्वोच्च पुरस्कार पद्श्री हासिल करने वाले नागौर के ६९ वर्षीय हिम्मताराम भांभू के जीवन पर सटीक बैठता है। जिन्होंने अपने ३६ बीघा खेत को जंगल में तब्दील कर दिया। वन्य जीवों के शिकारियों के विरुद्ध स्वयं २८ मुकदमे लड़े और पर्यावरण चेतना के लिए १४७२ किमी पदयात्रा की। मात्र छठी कक्षा तक पढ़े भांभू के जीवन में ऐसे कई अध्याय हैं कि अब लोग उन्हें पर्यावरण के क्षेत्र का चलता फिरता संस्थान मानने लगे हैं। पद्म पुरस्कार प्राप्त होने के बाद उन्होंने अपने संघर्ष की कहानी राजस्थान पत्रिका से कुछ यूं साझा की।
सवाल : कैसा लग रहा है देश का सर्वोच्च पुरस्कार पाकर, क्या कभी सोचा था कि एक दिन पद्मश्री मिलेगा?
जवाब : बहुत गौरवान्वित महसूस कर रहा हूं। साथ ही अब समाज के प्रति जिम्मेदारी बढऩे का भाव भी मन में हैं। कभी सोचा नहीं था कि एक दिन प्रकृति की सेवा के प्रतिफल स्वरूप इतना बड़ा पुरस्कार मिलेगा। पुरस्कार के साथ कुछ नए संकल्प लिए हैं, जिन्हें पूरा कर समाज के लिए कुछ और कर सकूं।
सवाल : पर्यावरण के क्षेत्र पुरस्कार मिला है, कैसे हुई इस सफर की शुरुआत?
जवाब : पैतृक गांव सुखवासी में बचपन में हम संयुक्त परिवार में रहते थे। बच्चों में मैं सबसे बड़ा था। मेरी दादी नैनी देवी का सबसे प्रिय भी। वे खूब सेवा कार्य करती थी, उन्होंने मेरे हाथों एक पीपल पौधा लगवाया। जैसे जैसे वह बड़ा होता गया, मेरे मन के भीतर लगा पर्यावरण प्रेम का पौधा भी बढ़ता चला गया।
सवाल : आप सामान्य किसान परिवार से हैं, ऐसे में परिवार पालन के लिए रोजगार की चिंता सभी को रहती है। जीवन में जिम्मेदारी और जुनून के बीच कैसे संतुलन बैठाया?
जवाब : युवावस्था में गांव से आकर नागौर में बसने के बाद मिस्त्री का काम शुरू किया। वर्ष १९७६ में पार्टनरशिप में ऑटो पार्टस की दुकान खोली। लेकिन मेरा ध्यान दुकान में कम और पर्यावरण के कार्यों ज्यादा था। साइकिल उठाता और पौधरोपण के कार्यक्रम में पहुंच जाता। वन विभाग के साथ जुड़ गया। ऐसे में दुकान छोडऩी पड़ गई। बाद में एक और दुकान खोली, लेकिन वहां भी सफलता नहीं मिली। खेती और छोटे मोटे प्रापर्टी के काम से घर का खर्च चला और मैं अपने अभियान में जुटा रहता। जब पुत्र जिम्मेदार हो गया तो मैं बेफिक्र होकर अपनी मुहिम में जुट गया।
सवाल : पर्यावरण के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य क्या रहे?
जवाब : जीवन का एक ही लक्ष्य रहा कि ज्यादा से ज्यादा वृक्ष लगाने में योगदान कर सकूं। शहर के नजदीक हरिमा गांव ३६ बीघा जमीन खरीदी और वहां जंगल बनाने की ठानी। साल दर साल वहां पौधों की संख्या बढ़ी गई। एक दिन ऐसा आया जब यह एक छोटा वन खंड बन गया। वहां सैकड़ों की संख्या में वन्य जीव रहने लगे। वर्ष १९९२ से लेकर २००३ तक राजस्थान में १४७२ किमी पर्यावरण जागरूकता पैदल यात्रा निकाली। वन्य जीवों के शिकारियों के खिलाफ अपने स्तर पर २८ मुकदमे लड़े। जिनमें से १३ प्रकरण में १८ मुल्जिमों को सजा हुई। कुछ अभी भी चल रहे हैं।
सवाल : ऐसा क्या है कि लोग पौधरोपण के गुर सीखने के लिए आपको बुलाते हैं?
जवाब : कहीं भी लगाए हुए अधिक से अधिक पौधे वृक्ष बन सके इसके लिए कुछ तकनीकी बातों का ध्यान रखना होता है। जैसे कितना गहरा गड्ढा खोदना है। सिंचाई का किस प्रकार ध्यान रखना है। कहां कौनसा पौधा पनप सकता है आदि। मैं सदैव अपनी जीप में कुछ ऐसा औजार साथ रखता हूं, जो पौधरोपण में काम आते हैं। बीएसएफ सहित कई संस्थानों में अब तक करीब साढे पांच लाख पौधे लगाने में योगदान रहा है।
सवाल : रेगीस्थानी इलाके में पौधे लगाकर उनको पनपाना पत्थर से पानी निकालने जैसा है, बरसों पहले कैसे इसमें सफलता मिली?
जवाब : उन दिनों यह वाकई बहुत दुष्कर कार्य था। वर्ष १९८५-८६ में वन विभाग की अरावली योजना के तहत पौधारोपण का कार्य किया। इसका लक्ष्य डेजर्ट को हरा भरा बनाना था। परेशानियां आई लेकिन सफलता भी मिलती चली गई। जहां भी पौधारोपण होता मैं भी वन विभाग की टोली के साथ होता था। हालांकि इंदिरा गांधी नहर के पानी आने के बाद इसमें काफी सफलता मिली।
सवाल : पुरस्कार पाने के बाद अब आगे क्या विशेष कार्य करना चाहते है?
जवाब : एक संकल्प लिया है कि वर्ष २०३० तक कम से कम पांच लाख बच्चों को जागरूक कर सकूं। इसके लिए स्कूल कॉलेजों में जाकर कार्यशालाएं करनी है। उन बच्चों को यही समझाना है कि अपनी उम्र के अंकों जितने वृक्ष जीवन में अवश्य लगाएं। स्वयं सेवी संस्थाओं के साथ मिलकर स्वैच्छिक रक्तदान की तरह ही स्वैच्छिक पौध रोपण की मुहिम शुरू करनी है, ताकि हर गांव शहर में ‘ऑक्सीजोन’ तैयार हो सके।
Published on:
19 Nov 2021 06:23 pm
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