
खजवाना. कच्चे चमङे से पगरकी तैयार करता कारीगर।
राजवीर रोज
हस्त कला के दम पर पूरे देश में विशेष पहचान रखने वाला खजवाना का जूती उद्योग सरकारी संरक्षण के अभाव में दम तोड़ने लगा है। लम्बी चलने व मजबूत आकार के कारण किसान वर्ग की पहली पसंद बनकर उभरा खजवाना का यह उद्योग आधुनिकता के साथ वेंटीलेटर पर चला गया है।
एक जमाना था जब जयपुर और जोधपुर राज्य के लोग पैदल चलकर खजवाना जूती खरीदने आया करते थे। आए भी क्यों न इस जूती की खासियत ही कुछ ऐसी ही थी कि एक बार बनवाने के बाद यह कई साल चलती थी और दिखने में भी बहुत आकर्षक लगती थी। किसान परिवार के लोगों को खेती के काम के दौरान ऐसी ही जूती की तलाश रहती थी जो लम्बी भी चले और दिखने में भी सुन्दर हो। नई जूती को स्थानीय भाषा में पगरखी व मोजड़ी कहते हैं। जबकि पूरानी जूती को खुल्डा के नाम से पुकारा जाता है।
वर्ष 1950 के करीब जिले के बड़ीखाटू कस्बे से विस्थापित होकर खजवाना पहुंचे रेगर समाज के लोगों ने खजवाना में जूती उद्योग की शुरूआत की। उस समय खजवाना की जूती की तूती बोलती थी। जोधपुर दरबार के कई राजवी व दरबारी यहां की जूती मंगवाकर पहनते थे, लेकिन समय के साथ चमड़ा उद्योग पर आधुनिकता का साया छाने लगा। पिछले एक दशक से इस उद्योग से जुड़े हस्तशिल्प कारीगरों की आजीविका पर संकट खड़ा हो गया है। नई पीढी पुश्तैनी काम को छोड़कर सब्जी बेचने को मजबूर हो गई है।
ऐसे तैयार होती है नागौरी जूती
नागौरी जूती बनाने के लिए गुजरात से कच्चा चमड़ा खरीदा जाता है। उस कच्चे चमड़े को 10 से 15 दिन तक नमक के पानी में भीगोकर रखते हैं। उससे चमड़ा मुलायम हो जाता है। मुलायम चमड़े पर कंटाला नामक सूखी झाड़ी को पीसकर बनाया पाउडर छिड़ककर चार से पांच दिन के लिए छोड़ दिया जाता है। उसके बाद छूरी से चमड़े के बाल उतारे जाते हैं। बाल उतारने के बाद बाजरे के आटे से बनी राबड़ी में चमड़े को भिगोया जाता है। चार से पांच दिन भीगने के बाद चमड़े में चमक आ जाती है तथा चमड़े की उम्र भी बढ़ जाती है।
अब इस चमड़े काे फिर से पानी में भीगोकर बबूल की पीसी हुई छाल (रांग) छिड़कते हैं। इससे एक सप्ताह में चमड़ा गहरा रंग ले लेता है। इस प्रक्रिया को कसाव देना कहा जाता है। अंत में चमड़े पर अरंडी का तेल लगाकर छोड़ दिया जाता है जिसे तेलछाब करना कहते हैं। इस प्रकार यह चमड़ा जूती बनाने के लिए तैयार हो जाता है। अब इस चमड़े से रेगर समाज के पुरुष पगरकी तैयार करते हैं व महिलाएं कशीदा निकालती है। यह सम्पूर्ण कार्य बिना किसी मशीन की सहायता से होता है। इसलिए इसमें मेहनत बहुत अधिक लगती है। जिसके मुकाबले आमदनी बहुत कम मिलती है।
संरक्षण नहीं मिला तो लुप्त हो जाएगा हस्तकला उद्योग
मोजड़ी जूती बनाने वाले जस्साराम, मदनराम, धन्नाराम, खेताराम, भींयाराम व पांचाराम रेगर बताते हैं कि 1950 में खजवाना के 35 परिवार इस उद्योग में लगे हुए थे। अधिक मेहनत के बावजूद कम मजदूरी के चलते नई पीढी पुश्तैनी धन्धे को छोड़ रही है। वर्तमान में 35 में से केवल सात परिवार जूती बनाने का काम कर रहे हैं, लेकिन खास बात यह है कि इस समाज की तीसरी पीढी में केवल एक व्यक्ति है जो पुश्तैनी धन्धा सीखकर इसे आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। अगर इस उद्योग को सरकारी संरक्षण नहीं मिला तो बहुत जल्द यह उद्योग खजवाना से समाप्त हो जाएगा।
इसलिए प्रसिद्ध है खजवाना की जूती
खजवाना की जूती शुद्ध चमड़े की बनी हुई होती है। इसमें किसी प्रकार की कोई मिलावट नहीं होती है। साथ ही यह पूरी तरीके से हाथ से निर्मित है। पूरी प्रक्रिया में कहीं भी मशीन का उपयोग नहीं होता है। इसलिए यह जूती लम्बे समय तक चलती है। आकार में भी कोई परिवर्तन नहीं होता। कशीदेदार जूती दिखने में भी बहुत सुन्दर लगती है। मारवाड़ के पारम्परिक पहनावे धोती-कुर्ता पर जब जूती पहनी जाती है तो मारवाड़ी व्यक्ति अपने पूर्ण किरदार में नजर आता है।
कारीगरों की जुबानी...
बहुत मेहनत से पति-पत्नी मिलकर दो दिन में एक जूती तैयार कर पाते हैं। एक जोड़ी जूती में मुश्किल से 300 से 400 रुपए की बचत हो पाती है। ऐसे में घर के खर्चे निकालना मुश्किल हो रहा है। सरकार अगर मदद करे तो हम इस धन्धे को व्यापक स्तर पर कर सकते हैं।
खेताराम रेगर
कारीगर
कम मजदूरी के कारण बच्चे इस काम में रुचि नहीं ले रहे हैं। ऐसे ही चलता रहा तो खजवाना की जूती का केवल नाम रह जाएगा। अभी सही समय है इस हस्त उद्योग को बचाने का। काम करने के लिए हम तैयार हैं।
मदनलाल रेगर कारीगर
खजवाना की जूती के अलावा कभी दूसरी जूती नहीं पहनी। एक बार शहर से खरीद ली थी लेकिन इस जूती के मुकाबले वह आधे समय भी नहीं चल पाई। अब तो इस जूती की आदत लग गई है।
रामाराम लामरोड़
बुजुर्ग, ग्रामीण
Published on:
08 Nov 2023 03:58 pm

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