सेहत के लिए नुकसानदायक मानी जाने वाली शराब सरकार के लिए फायदे का सौदा बनती जा रही है। इसकी खपत भी बढ़ रही है और सरकार की आमदनी भी।
शराब महंगी भी है और सेहत के लिए हानिकारक भी। सामाजिक बुराई भी है और इसे बंद करने की समय-समय पर मांग भी उठती रहती है। बावजूद इसके नागौर जिले में 35 हजार से अधिक बीयर रोजाना पी जा रही है। अप्रेल से जुलाई तक का हिसाब किताब लगाएं तो लगभग 98 करोड़ करोड़ की कमाई तो सरकार कर चुकी है। शराब संभवतया एक ऐसा उत्पाद है, जिसके बाजार में आने से
पहले ही तमाम टैक्स चुकता हो जाते हैं। सूत्रों के अनुसार अप्रेल से जुलाई माह तक शराब की बिक्री से करीब दो सौ करोड़ रुपए मिले, इनमें से करीब 98 करोड़ तो सरकार के हिस्से चले गए। मतलब सरकार की शुद्ध कमाई। नागौर जिले से पूरे साल करीब पांच सौ करोड़ रुपए सरकार को इस पेटे राजस्व मिलना है। ऐसे में शुरुआती चार महीने की ताबड़तोड़ बिक्री बता रही है कि इसमें किसी तरह की मुश्किल नहीं होगी। गई तो अंग्रेजी शराब की खपत भी दो लाख लीटर से अधिक रही। देसी के साथ आरएमएल (राजस्थान मेड लिकर) देसी मदिरा की खपत अंग्रेजी शराब से चौगुनी हुई। अंग्रेजी शराब चार माह में सवा तेरह लाख लीटर बिकी तो खपत होने वाली देसी मदिरा पचास लाख लीटर से भी अधिक।
एक तो गर्मी और उस पर बदला स्वाद, लिहाजा बीयर की खपत भी बढ़ी। वर्ष 2020-21 में करीब 43 लाख तीन हजार लीटर (बीयर..650 एमएल) तो वर्ष 21-22 में करीब 54 लाख लीटर बीयर बिकी। यानी करीब डेढ़ सौ करोड़ बीयर बॉॅटल, इन दोनों सालों में बीयर से मिला सरचार्ज करीब 38 करोड़ से भी अधिक रहा, जबकि वर्ष 2022-23 में भी आंकड़ा इसके आसपास रहा। इस साल अप्रेल से जुलाई माह तक ही 45 लाख 25 हजार से अधिक बीयर की खपत रही। अभी आठ महीने बाकी हैं। निर्माण के बाद पैकिंग और गोदाम सप्लाई से बाजार में जाने वाली शराब के ना-ना प्रकार के टैक्स पहले ही चुक जाते हैं। यानी सप्लाई में कोई बोतल टूटे या चोरी हो, सरकार को इससे किसी तरह का नुकसान नहीं।
देसी की खपत चौगुनी से ज्यादा
सूत्रों का कहना है कि अंग्रेजी शराब के मुकाबले देसी मदिरा की खपत चौगुनी है। अकेले वर्ष 2020-21 में ही 82 लाख 92 हजार 900 लीटर देसी शराब बिकी तो वर्ष 2021-22 में तो देसी मदिरा इससे दस लाख अधिक लीटर बिकी। अंग्रेजी शराब की वर्ष 2020-21 में करीब अठारह लाख लीटर तो वर्ष 21-22 में करीब 23 लाख 64 हजार लीटर से अधिक की बिकवाली हुई। वर्ष 22-23 में यह आंकड़ा तीस लाख लीटर से अधिक था। मतलब देसी के मुकाबले अंग्रेजी शराब आधी भी नहीं बिक पाई।
शराबबंदी का मुद्दा भूल गए लोग
असल में शराबबंदी का मुद्दा लोग लगभग भूलते जा रहे हैं। यदा-कदा पहले शराब की दुकान खोलने को लेकर विरोध होता रहता था। पिछले दो-तीन साल से यह लगभग बंद हो चुका है। शराब यूथ के लिए फैशन बनता जा रहा है। नागौर में बढ़ते होटल/रेस्तरां बार यह बताने के लिए काफी हैं कि बदलाव की बयार चल रही है।
कुछ जगह शराबबंदी की पहल
इन सबके बीच कुछ समाज/गांव में शराबबंदी को लेकर अच्छी पहल हुई है। शराब पीने वाले पर जुर्माना अथवा सामाजिक रूप से अन्य दण्ड देने का तय किया गया है। कुछ लोग स्वयं आकर शराब पीने से परहेज करते हुए लोगों को इसके लिए प्रेरक बन रहे हैं जो समाज के लिए अच्छा संकेत है।
इनका कहना...
शराब की बिक्री तेजी से बढ़ी है। सरकार को राजस्व तो अच्छा मिला ही है, किसी तरह से इसका अवैध करोबार न हो, इसका ध्यान रखा जा रहा है। पहले चार महीने में बिकवाली पिछले साल के मुकाबले डेढ़ गुना अधिक है।
-मनोज बिस्सा, जिला आबकारी अधिकारी, नागौर