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तबादला नहीं, तड़प मिली: तृतीय श्रेणी शिक्षकों की जिंदगी ‘नीति के इंतजार’ में अटकी

प्रदेश के सवा दो लाख से अधिक तृतीय श्रेणी शिक्षक पिछले 7 साल से कर रहे तबादले का इंतजार, सरकारें समय-समय पर दे रही तबादला नीति बनाने के थोथे आश्वासन

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फोटो-पत्रिका

नागौर. सरकारी फाइलों में ‘नीति निर्माण की प्रक्रिया’ चल रही है, लेकिन जमीनी हकीकत में तृतीय श्रेणी शिक्षक पिछले सात साल से इंतजार और अनदेखी झेल रहे हैं। प्रदेश के सवा दो लाख से अधिक तृतीय श्रेणी शिक्षकों के लिए तबादला अब प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि मानवीय संकट बन चुका है। सवाल यह है कि जब हर सरकार शिक्षक को ‘राष्ट्र निर्माता’ कहती है, तो फिर इन्हीं शिक्षकों से जुड़े निर्णय लेने में वर्षों का समय क्यों लिया जाता है?

गौरतलब है कि प्रदेश के प्रारंभिक शिक्षा के 1.25 लाख और माध्यमिक शिक्षा के एक लाख 5 हजार तृतीय श्रेणी शिक्षक वर्षों से उसी स्कूल में सेवाएं दे रहे हैं, जहां उनकी पहली पोस्टिंग हुई थी। सरकारें बदलीं, मंत्री बदले, लेकिन तबादला नीति सिर्फ घोषणाओं तक सीमित रही। हर बार आश्वासन मिला- ‘नीति बनेगी’, ‘अन्य राज्यों का अध्ययन चल रहा है’ और हर बार नतीजा शून्य ही रहा।

नीति के नाम पर राजनीति

वर्ष 2018 और 2021 में हजारों शिक्षकों से तबादलों के नाम पर आवेदन लिए गए, लेकिन एक भी तबादला नहीं हुआ। हां, कुछ शिक्षक जो मंत्री के खास हैं या ऊंची अप्रोच रखते हैं, उन्होंने पिछले दरवाजे से डेपुटेशन जरूर करवा लिया, लेकिन तबादला नहीं हो पाया। पिछले सालों में प्रिंसिपल, व्याख्याता और वरिष्ठ शिक्षकों के तबादले तो हुए लेकिन तृतीय श्रेणी शिक्षकों को हर बार नजरअंदाज कर दिया गया। भाजपा सरकार के कार्यकाल में भी अन्य विभागों के लिए बैन हटाया गया, लेकिन शिक्षा विभाग, खासकर तृतीय श्रेणी शिक्षक इस राहत से वंचित रहे। ऐसे में शिक्षकों का सरकार से एक ही सवाल है कि यह भेदभाव क्यों और कब तक होगा?

टूटते परिवार, बढ़ता मानसिक दबाव

तबादले नहीं होने की कीमत शिक्षक और उनके परिवार चुका रहे हैं। पति-पत्नी अलग-अलग जिलों में नौकरी करने को मजबूर हैं। कई महिला शिक्षिकाएं विवाह के बाद भी ससुराल के जिले में पदस्थापन नहीं पा सकीं। 15-15 साल से अपने गृह जिले से बाहर बैठे शिक्षक आज भी घर वापसी की उम्मीद लगाए हैं। बुजुर्ग माता-पिता की बीमारी, बच्चों की पढ़ाई और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बीच शिक्षक मानसिक रूप से टूट रहे हैं।

नए साल में भी धुंधली उम्मीद

वर्ष 2026 आ गया, लेकिन पंचायतीराज चुनाव और जनगणना के कारण नए सत्र तक तबादलों की संभावना बेहद कम मानी जा रही है। यानी ‘नई शुरुआत’ का साल भी तृतीय श्रेणी शिक्षकों के लिए पुरानी पीड़ा ही दोहराएगा।

सवाल सरकार से

- क्या तृतीय श्रेणी शिक्षक तबादला नीति के हकदार नहीं? - क्या हर बार चुनाव और प्रशासनिक बहाने इंसानी जरूरतों से बड़े रहेंगे?

- आखिर कब नीति कागज से निकलकर शिक्षकों की जिंदगी तक पहुंचेगी?

जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिलता, तब तक तृतीय श्रेणी शिक्षक सिर्फ पढ़ाते नहीं रहेंगे, बल्कि नीति की बेरुखी का बोझ भी ढोते रहेंगे।

यह सरकार की नाकामी है

पिछले सात-आठ साल से तृतीय श्रेणी शिक्षक तबादलों का इंतजार कर रहे हैं, यह सरकार की नाकामी ही है कि अब तक केवल थोथे आश्वासन ही दिए गए। हमारे संगठन ने जब-जब आंदोलन किए, तब शिक्षा मंत्रियों ने आश्वासन भी दिए, लेकिन परिणाम शून्य ही रहा है। सरकार को जल्द ही नीति बनाकर शिक्षकों के तबादले करने चाहिए, ताकि उन्हें राहत मिल सके।

- अर्जुनराम लोमरोड़, जिलाध्यक्ष, शिक्षक संघ शेखावत, नागौर