
Now the cultivator will sow Moong sap from the saline water
नागौर. जिले के काश्तकारों के लिए खुशखबरी है। कृषि अनुसंधान उपकेन्द्र के कृषि वैज्ञानिक नागौर की क्षारीय मिट्टी व पानी के अनुकूल मूंग की उन्नत हाईब्रिड बीज जीएएम फाइव को यहां की आबोहवा में ढालने में लगे हैं। इसका अपेक्षित उत्पादन हुआ तो फिर काश्तकारों को न केवल उत्पादन में बल्कि अत्याधिक आर्थिक लाभ भी मिलेगा। मूंग की बुवाई केन्द्र के 200 बीघा एरिया में की गई है, ताकि अधिकाधिक उत्पादन होने पर किसान लाभान्वित हो सके। इसके लिए कृषि क्षेत्र की नवीनतम तकनीकी का उपयोग केन्द्र के वैज्ञानिकों की ओर से किया गया है। अनुसंधान केन्द्र में देशी बाजरे के साथ ही तिल, बाजरा एवं मूंग के उन्नत हाईब्रिड बीज की उपज लहलहाएगी। बीज का अपेक्षित उत्पादन होने पर किसानों में वितरण किया जाएगा। इसमें अनुसंधान केन्द्र के वैज्ञानिकों की टीम लगी हुई है। केन्द्र के दो सौ बीघा क्षेत्र में मूंग के जीएएम फाइव बीज की बुवाई की जा रही है। अपेक्षित सफलता मिली तो फिर निश्चित रूप से यहां के किसानों के लिए लाभकारी सिद्ध होगी।
क्षारीय मिट्टी-पानी के अनुकूल है...
कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि जीएएम फाइव बीज को गुजरात के कच्छ क्षेत्र के अनुकूल विकसित किया गया था। कच्छ में मिट्टी व पानी दोनों ही क्षारीय है। यह जीएएम फोर का विकसित उत्पादित बीज है। इसे वहां की मिट्टी एवं पानी में नागौर की मिट्टी और पानी में कई समानांतर तत्व एक जैसे हंै। मिट्टी व पानी दोनों ही वहां के क्षारीय हैं। यहां की मिट्टी व पानी क्षारीय है। इसके सिंचाई लिए खारे पानी के कुओं एवं ट्यूबवेलों का बेहतर तरीके से उपयोग
किया जा सकेगा।
इस तरह की बुवाई...
कृषि वैज्ञानिकों ने बताया कि बुवाई के पूर्व मिट्टी की प्लाविंग, गोबर खाद, हेरो संयन्त्र का उपयोग करने के साथ मिट्टी को पूर्ण रूप से बुवाई के अनुकूल बनाने के लिए हर्बीसाइट एवं थायरम के अलावा पेंडर मेथलीन को पानी के साथ स्प्रे किया गया, ताकि मूंग के बीच अन्य खरपतवार या पौधा न पनप सके। बुवाई के साथ ही आवश्यतानुसार मिट्टी के अनुकूल फर्टीलाइजर का उपयोग भी कर सकते हैं। इससे उत्पादन और बेहतर हो सकेगा। बुवाई में नर एवं मादा की वैज्ञानिक पद्धति का भी ध्यान रखा गया है।
निश्चित तौर पर मिलेगा लाभ
&यह बीज न केवल नागौर की भूमि के प्राकृतिक तत्वों के अनुकूल है, बल्कि यहां के क्षारीय पानी के साथ मिलने पर भी पूरी तरह से विकसित होगा। इसका किसानों को निश्चित रूप से भरपूर लाभ मिलेगा।
डॉ. मदनमोहन कुमावत, एसोसिएट प्रोफेसर कृषि महाविद्यालय नागौर
Published on:
16 Jul 2018 11:12 am
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