
Sadhvi Binduprabha said in a discourse on Thursday at Jaimal Jain Poushdashala that there is a lack of equanimity these days.
नागौर. जयमल जैन पौषधशाला में गुरुवार को साध्वी बिंदुप्रभा ने प्रवचन में कहा कि आजकल समभाव का अभाव है। इसी समभाव को स्वभाव बनाने से विभाव दूर हो जाता है। जो साधक विषमता से समता की ओर बढ़ता है, वही विकृति को संस्कृति में बदलता है। विषमता विष और समता अमृत है। समता से जीव अमर पद को प्राप्त कर वीतराग बन जाता है। किसी भी परिस्थिति में हर समय समभाव में रहना चाहिए। यह समत्व की साधना जीवन की शांति का एक अद्भुत मंत्र है। कर्म सिद्धांत को जानने वाला साधक समभाव में सहज आगे बढ़ सकता है। संचालन संजय पींचा ने किया। प्रवचन प्रश्नों के उत्तर मंजूदेवी ललवानी, संगीता ललवानी, सुशीला नाहटा एवं कल्पना ललवानी ने दिए। विजेताओं को सूरजदेवी, मदनलाल सुराणा की ओर से पुरस्कृत किया गया। रीता ललवानी के तेले तप की तपस्या का बहुमान पांचीदेवी ललवानी ने चार उपवास की बोली लेकर किया। आगंतुकों के भोजन का लाभ निर्मलचंद चौरडिय़ा ने लिया। इस मौके पर बिरजादेवी ललवानी, लीला लोढ़ा, लीला बैद, कंचनदेवी ललवानी आदि उपस्थित थे।
फोटो नंबर सात-नागौर. जयमल जैन पौषधशाला में प्रवचन सुनते श्रावक
प्रभु कृपा की प्राप्ति के लिए खुद को समर्पित करना पड़ता है
नागौर. रामद्वारा केशवदास महाराज बगीची बख्तसागर में भागवत कथा पर प्रवचन करते हुए महंत जानकीदास ने भगवान श्री कृष्ण की महिमा का वर्णन करते हुए कहा कि भगवान की प्राप्ति के लिए पागल होना पङता है। कहने का अर्थ है खुद को भगवान के समक्ष प्रत्येक प्रकार से समर्पित करना।जीव परमात्मा के लिए जब तक पागल नहीं होगा तब तक भगवान का दर्शन नहीं होता है। भक्ति से ही मरण सुधरता है। भक्ति से विहीन ज्ञान और योग धोखा देता है। जिस ज्ञान में भक्ति का साथ नहीं ह,ै वह ज्ञान मरण को बिगड़ता है। शरीर जब बिगड़ जाता है तो वह जीव ज्ञान को भूल जाता है । आठ दश वर्ष का बालक भी जानता है कि शरीर से आत्मा भिन्न है। भक्ति के बिना योग धोखा देता है। हम जब तक प्राणायाम करते हैं तब तक मन शांत रहता है। प्राणायाम छोडऩे के बाद मन चंचल हो जाता है। योग और ध्यान भक्ति से ही सफल होते हैं। इस दौरान सत्यनारायण सेन, कालूराम पार्षद ,अक्षय कुमार ,बाबूलाल तेली ,दयाराम तेली, मदनलाल कच्छावा ,धनराज रांकावत, भंवर दास वैष्णव, सत्यनारायण सांखला आदि मौजूद थे।
फोटो नंबर 16-नागौर. रामद्वारा केशवदास महाराज बगीची बख्तसागर में भागवत कथा पर प्रवचन करते हुए महंत जानकीदास
मन का निरोध करना ही मुक्ति कहलाती है
नागौर. रामपोल सत्संग भवन में रामनामी महंत मुरलीराम महाराज के सानिध्य में चल रहे चतुर्मास कार्यक्रम में श्रीमद् भागवत कथा पर प्रवचन करते हुए संत रमताराम ने कहा कि आत्मा निराकार और स्वतंत्र बंधन मुक्त ही है लेकिन मन के कारण वह आबद्ध हो जाती है भगवान तो मृत्यु के पूर्व ही मुक्ति देते हैं। प्रभु प्रेम में ह्रदय का द्रवित होना ही तो मुक्ति है। प्रभु प्रेम में संसार को भूलना ही तो मुक्ति है। मृत्यु के बाद ही नहीं मृत्यु के पूर्व भी मुक्ति मिल सकती है। जो मृत्यु के पहले ही मुक्ति नहीं पा सकता है। उसे मृत्यु के बाद मुक्ति मिलना बड़ा कठिन है। जीवन में से विरोध और वासना के जाते ही अपने आप निरोध हो जाता है। मुक्ति कब मिलती है। शरीर के मरने से मुक्ति नहीं मिलती। मन के मरने से मुक्ति मिलती है। मन का निरोध ही मुक्ति है। कथा में भगवान की अनेक बाल लीलाओं का, श्रवण कराया गया। संत मुरलीराम महाराज ने कहा कि मुुक्ति की अभिलाषा पूर्ति भी प्रभु की कृपा ही से मिलती है। इसके लिए भक्त को अपना समर्पण प्रभु के समक्ष करना पड़ता है। समर्पण अर्थात खुद को प्रभु की भक्ति में समाहित करना। मुक्ति का आशय मृत्यु से नहीं होता है। यह तो आत्मा के जरा व मरण के बंधन की मुक्ति के साथ प्रभु कृपा को सदा के लिए प्राप्त करना होता है। कई बार लोग इसका आशय ही समझ नहीं पाते हैं। इसे समझने के लिए प्रभु की भक्ति को समर्पित भाव से करने के लिए खुद के अस्तित्व को भूलना होगा। मैं के भाव को त्याग कर सर्वत्र प्रभु भाव का आत्मिक एहसास करना होगा। इस दौरान कथा में बाल संत रामगोपाल, साध्वी मोहिनी बाई नंद किशोर बजाज नंदलाल प्रजापत, मनोज कुमार शमार्, मनोज प्रजापत, शिव प्रसाद टांक, आनंद, गिरधारीलाल शारण, कांतिलाल कंसारा, रामअवतार शर्मा, मनोज शारण आदि मौजूद थे। चातुर्मास सत्संग समारोह का समापन 17 सितंबर को होगा।
Published on:
02 Sept 2021 10:46 pm

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