
stubble fires,
नरसिंहपुर. जिले में इन दिनों खेतों में उठती नरवाई की आग सिर्फ फ सल अवशेषों को नहीं जला रही, बल्कि किसानों की मजबूरी, प्रशासन की सख्ती और पर्यावरणीय चिंता के बीच टकराव को भी उजागर कर रही है। हाल ही में नरवाई जलाने को लेकर बीते सोमवार को कलेक्टर के नोटिस जारी करने के निर्देशों के चलते एक फिर किसानों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंचती नजर आ रही है।
किसानों का कहना है कि फ सल कटाई के बाद खेत में बची नरवाई को हटाना आसान नहीं होता। यदि इसे मशीनों या मजदूरी के जरिए साफ किया जाए तो खर्च कई गुना बढ़ जाता है। छोटे और मध्यम किसान पहले ही बढ़ती लागत, महंगे बीज, खाद और डीजल की मार झेल रहे हैं। ऐसे में अतिरिक्त खर्च उठाना उनके लिए संभव नहीं होता। यही वजह है कि वे मजबूरी में नरवाई जलाने का विकल्प चुनते हैं।हालांकि किसान यह भी मानते हैं कि नरवाई जलाने से मिट्टी के जरूरी पोषक तत्व नष्ट हो जाते हैं और पर्यावरण को नुकसान पहुंचता है, लेकिन विकल्प महंगे होने के कारण वे खुद को असहाय महसूस करते हैं। उनका कहना है कि यदि प्रशासन कार्रवाई करता है, तो वैकल्पिक समाधान भी उपलब्ध कराने चाहिए। उल्लेखनीय है कि इस बार जिले में करीब 1 लाख से अधिक हेक्टेयर क्षेत्र में गेहूं की खेती की गई है।कृषि विभाग के आंकड़ों के मुताबिक फसल की कटाई का पूर्णता की ओर है। ऐसे में फ सल कटाई के बाद बड़े पैमाने पर नरवाई प्रबंधन की चुनौती सामने आती है। वहीं दूसरी ओर कृषि विभाग द्वारा भी फसल अवशेष प्रबंधन के लिए हेप्पी सीडर,मल्चर मशीन सहित अन्य प्रकार के प्रदर्शन किए जाते हैं।
जिले में गेहंू की कटाई के बाद पराली के जलाने की घटनाएं अधिक सामने आती है। खासतौर पर जिन खेतों में गेहूं की कटाई हार्वेस्टर से होती है वहां पर फसल अवशेष का प्रबंधन एक बड़ी चुनौती बनता है। कृषि विभाग से मिली जानकारी के अनुसार जिले में जहां पिछले साल पराली जलाने को लेकर 372 घटनाएं सामने आई थी। वहीं इस साल अब तक 298 घटनाएं सामने आ चुकी है। इधर उपसंचालक कृषि मोरिसनाथ कहते हैं कि किसानों को पराली न जलाने और फसल अवशेष प्रबंधन को लेकर जागरूक किया जा रहा है। फिर भी इस तरह की घटनाएं सामने आने पर नोटिस जारी किए जाएंगें।
इधर दूसरी ओर भारतीय किसान संघ ने प्रशासन से पराली निष्पादन के लिए स्थाई हल निकाले जाने की मांग की है। इस संबंध में बीते सोमवार को भाकिसं के सदस्यों ने ज्ञापन भी सौंपा है। जिसमें उन्होने खासतौर पर उल्लेख किया है कि सरकार जब तक पराली निष्पादन के लिए कोई स्थायी हल न निकाल ले,तब तक इस संबंंध में किसी प्रकार की कार्रवाई न की जाए। बहरहाल स्थिति यह है कि एक तरफ प्रशासन सख्ती कर रहा है, तो दूसरी ओर किसान आर्थिक दबाव में हैं। ऐसे में जरूरत इस बात की है कि सख्ती के साथ.साथ किसानों को व्यवहारिक, सस्ते और प्रभावी विकल्प भी उपलब्ध कराए जाएं, ताकि इस समस्या का स्थायी समाधान निकाला जा सके।
Updated on:
08 Apr 2026 12:38 pm
Published on:
08 Apr 2026 12:37 pm
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