उसी प्रकार माता सीताजी ने दो बार वनवास की यातनाएं सह कर अपने दोनों कुलों का नाम रोशन किया। ममतामयी मां ऐसी होती है जिसके दूध का ऋ ण कोई बेटा जीवन में अदा नही कर सकता। आज के युग में जो बेटे अपनी पसंद की शादियां कर महानगरों में रहे रहे हैं। उन्होंने अपने मां बाप तक को भुला दिया है। वे अपने गांवों की झोपडियां भूल गए हैं। भौतिक सुविधाएं पाने की चाहत में उनकी संवेदना कुठित हो रही है। देश की बदली परिस्थिति पर चिंता प्रकट करते हुए अपने प्रवचन में पं. मिश्र ने आगे कहा कि धर्म देश का प्राण है, धर्म बिना आचरण किए मनुष्य सच्चे सुख की कल्पना नहीं कर सकता। भारत के खोये गौरव की वापिसी के लिए लोगों को धर्म की राह पर चलने की जरूरत है, उन्होंने लोगों से भारतीय संस्कृति, सभ्यता के मूल्यों की रक्षा करने का आह्वान किया।