13 अगस्त 2026,

गुरुवार

Patrika Logo
home_icon

होम

इनस्टॉल ऐप

ई-पेपर

video_icon

शॉर्ट्स

profile_icon

प्रोफाइल

कब पढ़ेगा भारत? सरकारी स्कूलों के 73% बच्चे 12वीं क्लास से पहले छोड़ रहे स्कूल

Government Schools Situation: सरकारी स्कूलों से जुड़ी एक रिपोर्ट ने चिंताजनक तस्वीर पेश की है। क्या है पूरा मामला? आइए जानते हैं।
3 min read
Google source verification

भारत

image

Tanay Mishra

image

Shadab Ahmed

Aug 14, 2026

Government School

सरकारी स्कूल (Photo - ANI)

देश में सरकारी क्षेत्र में शिक्षा का दायरा बढ़ा है, स्कूलों तक पहुंच बढ़ी है, शिक्षक बढ़े हैं और छात्र-शिक्षक अनुपात भी बेहतर हुआ है। हर बच्चे तक कलम-किताब पहुंचाने के तमाम दावों और योजनाओं के बीच स्कूली शिक्षा की बेहद कड़वी और चिंताजनक तस्वीर संसद की प्राक्कलन समिति ने दिखाई है। समिति की रिपोर्ट के अनुसार प्राथमिक स्तर पर सरकारी स्कूलों (Government Schools) में दाखिला लेने वाले हर 100 बच्चों में से सिर्फ 27 ही सीनियर सैकेंडरी तक पहुंच पा रहे हैं, जबकि 73 बच्चे 12वीं क्लास से पहले ही पढ़ाई छोड़ रहे हैं। रिपोर्ट ने चेतावनी दी है कि अगर बच्चों को स्कूल में बनाए रखने की चुनौती का समाधान नहीं किया गया तो सार्वभौमिक शिक्षा का लक्ष्य केवल आंकड़ों तक सीमित रह जाएगा।

स्कूलों की संख्या में आई कमी

रिपोर्ट में 2024-25 के आंकड़ों के हवाले से कहा गया है कि प्राथमिक स्तर पर 9 लाख से ज़्यादा स्कूल होने के बावजूद उच्च माध्यमिक स्तर पर 90,866 स्कूल ही हैं। स्कूलों की संख्या में कमी आई है। बड़ी कक्षाओं में विभिन्न कारणों से स्कूलों से छात्रों के ड्रॉप आउट के कारण समस्या बढ़ सकती है। रिपोर्ट में शिक्षक प्रशिक्षण और शिक्षा की गुणवत्ता पर सवाल उठाते हुए इनमें सुधार की सिफारिश की गई है।

स्कूल घटे और शिक्षक बढ़े, लेकिन बच्चों को रोक नहीं पा रही व्यवस्था

प्राक्कलन समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि देश में स्कूली शिक्षा के कई संकेतकों में सुधार हुआ है। छात्र-शिक्षक अनुपात बेहतर हुआ है और शिक्षकों की संख्या भी बढ़ी है। इसके बावजूद माध्यमिक स्तर पर ड्रॉपआउट दर 11.5% बनी हुई है, जो बताती है कि बड़ी संख्या में बच्चे 8वीं क्लास के बाद पढ़ाई जारी नहीं रख पा रहे हैं। समिति ने बताया कि वर्ष 2014-15 से 2024-25 के बीच देश में स्कूलों की कुल संख्या 15.17 लाख से घटकर 14.71 लाख रह गई। इसके ठीक उलट, शिक्षकों की संख्या 85.62 लाख से बढक़र 1.01 करोड़ पहुंच गई।

सीखने की गुणवत्ता भी चिंता का विषय

समिति ने पाया कि कई बच्चे कक्षानुसार अपेक्षित सीखने का स्तर हासिल नहीं कर पा रहे हैं। शुरुआती कक्षाओं में पढऩे, लिखने और गणित की बुनियादी क्षमता कमजोर रहने का असर आगे की पढ़ाई पर पड़ता है और अंतत: ड्रॉपआउट बढ़ रहा है। इसी कारण समिति ने ‘निपुण भारत मिशन’ को और प्रभावी ढंग से लागू करने की सिफारिश की है, जिससे तीसरी कक्षा तक सभी बच्चों में बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक क्षमता विकसित की जा सके।

रिपोर्ट के अनुसार इसलिए पढ़ाई छोड़ रहे बच्चे

1. कमजोर बुनियादी नींव - प्राथमिक स्तर पर बुनियादी साक्षरता और संख्या ज्ञान का आधार कमजोर है।

2. स्कूलों की कमी और दूरी - प्राथमिक स्कूलों की तुलना में सीनियर सैकंडरी स्कूलों की संख्या सिर्फ 10% होने के कारण ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में बच्चों को लंबी दूरी तय करनी पड़ती है।

3. आर्थिक और सामाजिक दबाव - माध्यमिक स्तर की उम्र में आते-आते गरीब परिवारों के बच्चों (विशेषकर लडक़ों) पर मजदूरी या काम करने का दबाव बढ़ जाता है, जबकि बालिकाओं के लिए सुरक्षा और दूरी बड़ी बाधा बनती है।

4. शिक्षक प्रशिक्षण में भारी गिरावट - वर्ष 2022 में जहाँ 53 लाख से ज़्यादा शिक्षकों ने ऑनलाइन प्रशिक्षण लिया था, वहीं वर्ष 2025 में यह आंकड़ा घटकर मात्र 1.63 लाख रह गया। शिक्षक प्रशिक्षित नहीं होने से गुणवत्ता प्रभावित होती है।

बच्चों को स्कूल लाने के लिए रिपोर्ट में सिफारिश

1. 'निपुण भारत' योजना कड़ाई से लागू हो - रिपोर्ट में 'निपुण भारत' योजना कड़ाई से लागू करने की सिफारिश की गई है। शुरुआती कक्षाओं में ही बच्चे की बुनियादी समझ और पढऩे-लिखने की क्षमता को मजबूत किया जाए तो वो आगे चलकर वह पढ़ाई नहीं छोड़ेंगे।

2. मज़बूत स्टूडेंट ट्रैकिंग सिस्टम - हर बच्चे की उपस्थिति और प्रगति की रियल-टाइम डिजिटल ट्रैकिंग हो, जिससे किसी बच्चे के लगातार गायब रहने पर समय रहते कदम उठाया जा सके।

3. वार्षिक शिक्षक प्रशिक्षण लक्ष्य - शिक्षकों के ऑनलाइन और ऑफलाइन प्रशिक्षण के लिए सालाना लक्ष्य तय किए जाएं और इस प्रक्रिया को निरंतर जारी रखा जाए।