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‘संविधान साथ लेकर चलते हैं, पढ़ते नहीं’, विपक्षी दलों पर भड़के कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल

Arjun Ram Meghwal: परिसीमन को लेकर केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने विपक्ष पर तंज कसा है। उन्होंने कहा कि परिसीमन संवैधानिक अनिवार्यता है और 2026 के बाद इसे किया जाना है।
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भारत

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Rahul Yadav

Aug 13, 2026

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कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल (फोटो - आईएएनएस)

Arjun Ram Meghwal on Delimitation 2026: केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने गुरुवार को परिसीमन के मुद्दे पर विपक्ष पर निशाना साधा है। उन्होंने कहा कि परिसीमन संवैधानिक अनिवार्यता है और 2026 के बाद इसे किया जाना है। मेघवाल ने विपक्षी नेताओं पर तंज कसते हुए कहा कि वे संविधान साथ लेकर चलते हैं लेकिन उसमें लिखी बातों को पढ़ते नहीं हैं।

परिसीमन संवैधानिक अनिवार्यता है

मेघवाल ने कहा कि संविधान में लोकसभा सीटों को 2026 तक फ्रीज रखने का प्रावधान है। इसके बाद परिसीमन की प्रक्रिया होनी है। उन्होंने कहा परिसीमन एक संवैधानिक अनिवार्यता है। वे निश्चित रूप से संविधान को अपने साथ लेकर चलते हैं, लेकिन वास्तव में यह नहीं पढ़ते कि उसमें क्या लिखा है।

केंद्रीय मंत्री ने कहा कि जब संविधान में यह प्रावधान लिखा है कि 2026 के बाद परिसीमन होना है तो इसे किया जाना जरूरी है।

दक्षिणी राज्यों को किस बात की चिंता?

परिसीमन को लेकर खास तौर पर दक्षिणी राज्यों में चिंता जताई जा रही है। इन राज्यों को आशंका है कि अगर भविष्य में जनसंख्या के आधार पर लोकसभा सीटों का पुनर्वितरण किया गया तो उनकी संसद में मौजूदा हिस्सेदारी कम हो सकती है।

दक्षिणी राज्यों ने पिछले कुछ दशकों में जनसंख्या नियंत्रण के क्षेत्र में बेहतर प्रदर्शन किया है। ऐसे में उनका तर्क है कि केवल जनसंख्या को आधार बनाकर सीटों का पुनर्वितरण करने से उन्हें राजनीतिक नुकसान हो सकता है।

क्या है परिसीमन?

परिसीमन का मतलब लोकसभा और राज्य विधानसभा क्षेत्रों की सीमाओं का नए सिरे से निर्धारण करना है। इसका आधार जनसंख्या होती है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों में आबादी का अंतर बहुत ज्यादा न हो। संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत प्रत्येक जनगणना के बाद संसद निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्समायोजन के लिए कानून बना सकती है।

1971 की जनगणना के बाद क्यों फ्रीज हुईं सीटें?

भारत में 1952, 1962 और 1972 में परिसीमन की प्रक्रिया हुई थी। इसके बाद 1976 के 42वें संविधान संशोधन के जरिए 1971 की जनगणना के आधार पर लोकसभा सीटों की संख्या को फ्रीज कर दिया गया। इसका एक प्रमुख उद्देश्य उन राज्यों को राजनीतिक नुकसान से बचाना था जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण के उपायों को प्रभावी ढंग से लागू किया था। इसके बाद 2001 के 84वें संविधान संशोधन के जरिए राज्यों के बीच सीटों के आवंटन पर यह रोक 2026 के बाद तक बढ़ा दी गई।

2008 में भी हुआ था परिसीमन

2008 में परिसीमन की प्रक्रिया हुई थी, लेकिन इसमें राज्यों के बीच लोकसभा सीटों के मौजूदा वितरण को बदलने के बजाय 1971 की जनगणना के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं को दोबारा तय किया गया था। अब 2026 के बाद होने वाले परिसीमन को लेकर राजनीतिक बहस तेज हो गई है। केंद्र सरकार इसे संवैधानिक प्रावधान के तहत जरूरी बता रही है, जबकि दक्षिणी राज्यों समेत विपक्ष के कई दल इसके संभावित राजनीतिक प्रभावों को लेकर सवाल उठा रहे हैं।