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दिल्ली जिमखाना क्लब: जब नटवर सिंह लड़े थे अध्यक्ष का चुनाव, तीनों सेना प्रमुखों से मदद लेने का लगा था आरोप

Delhi Gymkhana Controversy: दिल्ली का जिमखाना क्लब एक बार फिर सुर्खियों में है। अंग्रेजों के दौर में शुरू हुआ यह ऐतिहासिक क्लब अब अपनी जमीन को लेकर विवाद के केंद्र में आ गया है।

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Delhi Gymkhana Club

फोटो में दिल्ली का जिमख़ाना क्लब (सोर्स: दिल्ली का जिमख़ाना क्लब वेबसाइट)

Gymkhana Club of Delhi: दिल्ली का जिमख़ाना क्लब। आजकल खूब चर्चा में है। वजह है सरकार इसकी जमीन वापस ले रही है। यह क्लब अंग्रेजों के जमाने का है। 1911 में जब अंग्रेजों ने राजधानी कलकत्ता से दिल्ली लाने का फैसला किया तभी एक क्लब की भी जरूरत महसूस की गई। पहले नॉर्थ दिल्ली में सिविल लाइंस के पास क्लब के लिए जगह दी गई। बाद में जब रायसीना हिल के पास नई दिल्ली को बसाया जाने लगा तो सफदरजंग रोड पर क्लब के लिए जमीन दी गई।

क्लब का शुरुआती कई सालों का इतिहास दर्ज नहीं है। इसकी वेबसाइट पर दी गई जानकारी के मुताबिक 1927 के बाद से क्लब का इतिहास दर्ज करना शुरू किया गया।

1947 में बंटवारे के बाद की वो फेयरवेल पार्टी

1947 में जब देश का बंटवारा हुआ तो यहां सेना के बड़े अफसरों की एक पार्टी हुई थी। बंटवारे की वजह से जो सैनिक पाकिस्तान की सेना में शामिल होने जा रहे थे, उनके सम्मान में यह विदाई पार्टी 6 अगस्त, 1947 को हुई थी। इस पार्टी के मेजबान थे ब्रिगेडियर के एम करिअप्पा (जो बाद में देश के पहले फील्ड मार्शल बने)।

'फ्रीडम एट मिडनाइट' नाम की किताब में अमरीकी इतिहासकार लैरी कॉलिंस और फ्रांसीसी लेखक डोमिनिक लापीयर ने इस पार्टी का जिक्र किया है। उन्होंने बताया है कि ब्रिगेडियर करिअप्पा डांस फ्लोर पर पहुंचे और सबसे शांत रहने की अपील की। फिर वह बोलने लगे, 'हम एक-दूसरे को अलविदा कहने के लिए जमा हुए हैं, ताकि जब हम दोबारा मिलें तो दोस्ती के उसी जज्बे के साथ मिलें, जिसने हमें हमेशा एक-दूसरे से बांधे रखा है। लंबे समय तक हमारी किस्मत एक जैसी ही रही है। हमारा इतिहास हमें हमेशा एक रखेगा। हम भाई थे, भाई रहेंगे। हमने जो बेहतरीन साल साथ में गुजारे हैं, वे कभी नहीं भूलेंगे।'

1947 में आजादी मिलने के बाद क्लब का नाम बदला

क्लब की वेबसाइट पर दी गई जानकारी के अनुसार मौजूदा जगह पर यह क्लब 3 जुलाई, 1913 से है। तब इसे 'इंपीरियल दिल्ली जिमख़ाना क्लब' कहा जाता था। क्लब के पहले अध्यक्ष थे स्पेन्सर हरकौर्ट बटलर। वह वाइसरॉय एग्जिक्यूटिव काउंसिल के सदस्य थे और 1930 तक क्लब के प्रबंधन से जुड़े रहे थे।

1947 में आजादी मिलने के बाद क्लब के नाम से 'इंपीरियल' शब्द हटा लिया गया। शुरू में यह क्लब केवल ब्रिटिश राज के बड़े सिविल व सैन्य अफसरों के लिए था। किसी भारतीय को इसमें एंट्री नहीं दी जाती थी। आजादी से दो साल पहले ही इसमें भारतीयों की एंट्री शुरू हुई।

जिमखाना क्लब को एलीट लोगों का क्लब कहा जाता है। लेकिन, पत्रकार करण थापर जो करीब 50 साल इसकी से क्लब केनेता सदस्य हैं, इस बात को सही नहीं मानते। उनका कहना है कि इसके सदस्यों में आईएफ़एस, आईएएस, आईपीएस, सैन्य अफसर, कॉर्पोरेट्स, एकेडेमिक्स, भारत और 15 अन्य देशों के 61 दूसरे क्लबों के सदस्य शामिल हैं। थापर ने अपने एक लेख में इन लोगों को 'सामान्य लोग, जो अमीर नहीं हैं, रिटायर हो चुके हैं और आज की तारीख में बहुत प्रभावशाली भी नहीं रह गए हैं' बताया है।

दो गुटों के बीच जम कर चला 'लेटर वार'

जिमख़ाना क्लब अंग्रेज अफसरों के लिए शुरू हुआ था। आजादी के बाद भी काफी समय तक यह क्लब मुख्य रूप से बड़े अफसरों के लिए ही रहा। लेकिन समय के साथ-साथ यह बदलता गया। धीरे-धीरे नेता और दूसरे वर्ग के लोग भी इसके सदस्य बनने लगे।

1980 के दशक में कई बड़े कारोबारियों की क्लब में एंट्री हुई और अफसरों से अलग, उनकी अपनी लॉबी भी बन गई। इस लॉबी की सक्रियता 1984 में हुए अध्यक्ष के चुनाव में भी दिखी। इन लोगों ने क्लब में अपना कानून चलाना शुरू कर दिया था। कार्ड-रूम में एक पॉइंट के 25 पैसे से ज्यादा दांव लगाने का नियम नहीं था, लेकिन जो रईस कारोबारी पक्के जुआरी थे, वे मनमर्जी से दांव लगाया करते थे।

1984 के चुनाव में अफसरों और कारोबारियों की लॉबी के बीच जम कर 'लेटर वार' चला। दोनों ने एक-दूसरे पर क्लब की मर्यादा तार-तार करने का आरोप लगाया। साथ ही, अपने-अपने पक्ष में वोटिंग करवाने के लिए हर हथकंडे अपनाए।

बिजनेस लॉबी की ओर से जारी एक सर्क्युलर में आरोप लगाया गया कि सेना के अफसरों के वोट लेने के लिए तीनों सेना प्रमुखों से मदद मांगी गई थी, जो देने से उन्होंने इनकार कर दिया था।

तब कुंवर नटवर सिंह अध्यक्ष का चुनाव लड़े और जीते थे। क्लब का चुनाव कोई छोटा-मोटा चुनाव नहीं माना जाता था। नटवर सिंह का यह चुनाव जीतना उतना ही विवादों में रहा था, जितना बड़ा उनका कद था। नटवर और उनकी कमिटी के साथियों पर आरोप लगे कि उन्होंने अध्यक्ष का चुनाव लड़ रहे दो प्रतिद्वंदियों पर दबाव डालने के लिए ताकत का इस्तेमाल करने से भी परहेज नहीं किया। ये दो प्रतिद्वंदी थे सुदर्शन अग्रवाल और कंवलजीत सिंह। अग्रवाल राज्य सभा के महासचिव थे, जबकि कंवलजीत सिंह दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) के सदस्य थे। दोनों ने अंततः चुनाव से अपना नाम वापस ले लिया।

नटवर सिंह विदेश मंत्रालय के सबसे बड़े अफसर रह चुके थे और राजनीति में भी झंडा गाड़ चुके थे। दबी जुबान में आरोप लगाया गया कि सुदर्शन और कंवलजीत की नाम वापसी की पीछे प्रधानमंत्री निवास का हाथ है। नटवर सिंह से जब पूछा गया तो उन्होंने खुली चुनौती दे डाली कि कोई भी चाहे तो इस आरोप को साबित कर सकता है। लेकिन, खुले आम किसी ने ऐसा आरोप नहीं लगाया। नाम वापस लेने वाले एक शख्स ने यह जरूर कहा था कि उन्हें फोन पर धमकी दी गई थी कि नाम वापस नहीं लिया तो इन्कम टैक्स की रेड डलवा देंगे।

चुनाव जीतने के लिए लगातार कॉकटेल पार्टियां दी गईं। इन पार्टियों के निमंत्रण में साफ लिखा जाता था कि पार्टी का मकसद प्रस्तावित कमिटी के सदस्यों से मेल-जोल बढ़ाना है। अंततः नटवर पैनल के 16 में से 13 सदस्यों की जीत हुई थी।