
सिविल लाइन्स का नाम बदलने की तैयारी में केंद्र सरकार
केंद्र सरकार देश में मौजूद औपनिवेशिक काल से जुड़े नामों और प्रतीकों को बदलने की दिशा में लगातार कदम उठा रही है। इसी कड़ी में अब सिविल लाइन्स जैसे ऐतिहासिक नाम को बदलने पर भी विचार किया जा रहा है। सरकार का मानना है कि ऐसे नाम ब्रिटिश शासन की याद दिलाते हैं और इन्हें भारतीय संस्कृति और परंपरा से जुड़े नए नामों से बदला जाना चाहिए।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2047 तक भारत को औपनिवेशिक मानसिकता से पूरी तरह मुक्त करने का लक्ष्य रखा है। इसी विजन के तहत कई जगहों, संस्थानों और प्रतीकों में बदलाव किए जा रहे हैं ताकि देश की पहचान अधिक भारतीय और आत्मनिर्भर दिखाई दे।
पिछले कुछ वर्षों में इस दिशा में कई बड़े बदलाव देखने को मिले हैं। राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ रखा गया, जिससे सत्ता और अधिकार की जगह कर्तव्य और जिम्मेदारी का संदेश दिया जा सके। इसी तरह प्रधानमंत्री कार्यालय परिसर को सेवा तीर्थ नाम दिया गया, जो शासन को सेवा भाव से जोड़ने की कोशिश को दर्शाता है। इंडिया गेट के पास ब्रिटिश काल के प्रतीक हटाकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस की प्रतिमा स्थापित की गई। रेस कोर्स रोड का नाम बदलकर लोक कल्याण मार्ग रखा गया, जो आम जनता के कल्याण की भावना को दर्शाता है।
भारतीय नौसेना के ध्वज में भी बदलाव किया गया और उसमें से सेंट जॉर्ज क्रॉस को हटाकर छत्रपति शिवाजी महाराज से प्रेरित नया प्रतीक अपनाया गया। इसके अलावा औपनिवेशिक काल के 1500 से अधिक पुराने कानूनों को भी समाप्त किया गया है, जिससे प्रशासनिक व्यवस्था को सरल और आधुनिक बनाया जा सके।
नई संसद भवन और नए सरकारी परिसर भी इसी सोच के साथ विकसित किए जा रहे हैं कि भारत अपनी पहचान को औपनिवेशिक प्रभाव से अलग कर सके और एक नई राष्ट्रीय चेतना के साथ आगे बढ़े।
अब इसी कड़ी में सिविल लाइन्स नाम पर चर्चा शुरू हुई है। यह नाम देश के कई बड़े शहरों जैसे दिल्ली, प्रयागराज और जयपुर में देखने को मिलता है। यह नाम ब्रिटिश शासन के दौरान रखा गया था और उस समय इसका संबंध प्रशासनिक अधिकारियों के रहने वाले क्षेत्रों से था।
ब्रिटिश काल में शहरों को योजनाबद्ध तरीके से अलग-अलग हिस्सों में बांटा गया था। सिविल लाइन्स वह क्षेत्र होता था जहां उच्च प्रशासनिक अधिकारी जैसे कलेक्टर, जज और कमिश्नर रहते थे। इन इलाकों में चौड़ी सड़कें, बड़े बंगले और व्यवस्थित कॉलोनियां बनाई जाती थीं। इसके अलावा क्लब, चर्च, अदालत और प्रशासनिक दफ्तर भी इसी क्षेत्र में होते थे। इसके विपरीत मिलिट्री लाइन्स सेना के लिए होती थीं और पुराना शहर स्थानीय भारतीय आबादी का क्षेत्र होता था।
सरकार का मानना है कि ऐसे नाम सिर्फ इतिहास का हिस्सा नहीं हैं, बल्कि यह मानसिकता पर भी असर डालते हैं। इसलिए इन्हें बदलकर भारतीय संस्कृति, परंपरा और स्थानीय विरासत से जोड़ने की कोशिश की जा रही है। उद्देश्य यह है कि नई पीढ़ी अपने शहरों और स्थानों को भारतीय संदर्भ में समझे और गर्व महसूस करे।
Published on:
20 Apr 2026 12:23 pm
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