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जस्टिस उज्जल भुइयां की तीखी टिप्पणी: ‘लॉयल देन द किंग’ मानसिकता से जमानत में देरी, तुच्छ FIR से बढ़ रहा अदालतों पर बोझ

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने जमानत में देरी, बढ़ते मुकदमे और मनमानी एफआईआर पर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि कानून का अतिप्रयोग और जांच एजेंसियों के प्रति अत्यधिक झुकाव से लोग वर्षों जेल में रहते हैं, जो विकसित भारत के लिए उचित नहीं है।

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भारत

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Anurag Animesh

Mar 23, 2026

Justice Ujjal Bhuyan

Justice Ujjal Bhuyan

सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस उज्जल भुइयां ने रविवार को न्यायपालिका की कार्यप्रणाली, अदालतों में बढ़ते मुकदमों के बोझ और आरोपियों को समय पर जमानत नहीं मिलने जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर बेबाक टिप्पणी की। उन्होंने कहा कि न्याय व्यवस्था के सामने आज कई गंभीर चुनौतियां खड़ी हैं, जिनका समाधान किए बिना ‘विकसित भारत’ की परिकल्पना अधूरी रहेगी। जस्टिस भुइयां ‘सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन राष्ट्रीय सम्मेलन 2026’ में ‘विकसित भारत में न्यायपालिका की भूमिका’ विषय पर संबोधित कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने न्यायपालिका के भीतर मौजूद एक मानसिकता की ओर इशारा करते हुए कहा कि कुछ लोग अब भी ‘राजा से भी अधिक वफादार’ (Loyal than the King) सिंड्रोम से ग्रस्त हैं। इस सोच के कारण जमानत के मामलों में अनावश्यक देरी होती है और कई आरोपी वर्षों तक जेल में रहने को मजबूर हो जाते हैं।

कानून का अतिप्रयोग हो रहा- जस्टिस उज्जल भुइयां


उन्होंने धनशोधन (PMLA) और गैरकानूनी गतिविधि (UAPA) जैसे गंभीर मामलों का उदाहरण देते हुए बताया कि इन मामलों में दोषसिद्धि दर पांच प्रतिशत से भी कम है। इसके बावजूद बिना पर्याप्त सबूत के गिरफ्तारियां और मुकदमे दर्ज किए जाते हैं। उन्होंने इसे कानून का सीधा दुरुपयोग नहीं, बल्कि ‘अतिप्रयोग’ करार दिया। उनका सवाल था कि बिना आरोप तय हुए और बिना चार्जशीट दाखिल किए किसी व्यक्ति को 5-6 साल तक जेल में रखना क्या न्यायसंगत है? उन्होंने स्पष्ट कहा कि ऐसी स्थिति विकसित भारत के आदर्शों के अनुरूप नहीं है।

जस्टिस ने और क्या कहा?


जस्टिस भुइयां ने अदालतों में लंबित मामलों के लिए केवल न्यायपालिका को जिम्मेदार ठहराने की प्रवृत्ति पर भी सवाल उठाया। उन्होंने कहा कि कार्यपालिका भी इसमें बड़ी भूमिका निभाती है। तुच्छ अपीलों और निराधार एफआईआर के कारण अदालतों का बोझ लगातार बढ़ रहा है। उन्होंने यह भी बताया कि आजकल सार्वजनिक प्रदर्शनों, सोशल मीडिया पोस्ट या मीम्स जैसी छोटी-छोटी बातों पर भी एफआईआर दर्ज करने का चलन बढ़ गया है। ऐसे मामलों में अक्सर जांच के लिए विशेष जांच दल (SIT) का गठन करना पड़ता है, जिससे न्यायपालिका का कीमती समय व्यर्थ होता है। उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि न्यायपालिका के भीतर कुछ लोग जांच एजेंसियों के प्रति अत्यधिक सम्मान दिखाते हैं, जिसके चलते आरोपियों को लंबे समय तक जेल में रहना पड़ता है। अंत में जस्टिस भुइयां ने इस बात पर जोर दिया कि न्याय व्यवस्था को अधिक संतुलित, संवेदनशील और जवाबदेह बनाने की आवश्यकता है, ताकि आम नागरिकों को समय पर न्याय मिल सके और न्यायपालिका पर बढ़ते बोझ को कम किया जा सके।