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जन-जन के हित से जुड़ें विज्ञान के नाम पर धंधे

बीमारियों के मामले में वैज्ञानिक कई बीमारियों का इलाज ही नहीं मानते। कई बीमारियां ऐसी हैं जिनके इलाज के लिए कोई दवा नहीं बनी। जरूरी है...

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भारत

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Devika Chatraj

Feb 26, 2026

फोटो: पत्रिका

विज्ञान के नाम पर कई धन्धे भी चलते रहते हैं। कोई बुरी बात नहीं, परना वे जन-जन के हितों से जुड़े होने चाहिए। विशेषतः बीमारियों के मामलों में वैज्ञानिक कई बीमारियों का इलाज ही नहीं मानते। कई बीमारियां ऐसी हैं जिनके इलाज के लिए कोई दवा नहीं बनी। दमा ऐसी ही बीमारी है। एक बार मैं दमा रोग के एक शिविर में गया, तो वहां भी डॉक्टरों ने यह बात बार-बार कही कि दमा का कोई इलाज नहीं है। मैंने उस शिविर में यह प्रश्न उठाया कि जिस बीमारी का इलाज नहीं है, उसमें दवाइयां क्यों दी जाती है?

हालांकि दवाइयां देने के पीछे डॉक्टर की कोशिश होती है कि जो कुछ सूझे या संभव है, वह किया जाए, परन्तु इसका एक पहलू यह भी है कि जो भी दवा है। अलग-अलग शरीर में दवा का असर अलग-अलग हो सकता है। इसका आकलन हम लोग नहीं कर सकते परन्तु दवा के प्रभाव को तो नकारा नहीं जा सकता।

इसी प्रकार का एक प्रसंग वाइरल का है। बरसात के बाद आमतौर पर बुखार का दौर चलता है। सामान्यतया इसे मौसमी बुखार कहा जाता है। बुखार कई तरह के हैं, जिनकी पहचान हो चुकी हैं, परन्तु जिस बुखार का ठीक-ठीक निदान नहीं होता, उसे वाइरल कह दिया जाता है। मौसमी बुखार को भी वाइरल की श्रेणी में ले लिया गया। वाइरल की कोई दवा नहीं निकली, यह सभी डॉक्टर और वैज्ञानिक मानते हैं। मौसमी बुखार का सीधा सम्बन्ध मौसम से है।

बरसात के भारी मौसम में खान-पान के कारण कई विष (गैस), पेट में जमा हो जाते हैं। बरसात का दौर बन्द होने पर ये विष बुखार, उल्टी, दस्त और कई दूसरे विकारों के रूप में फूट पड़ते हैं और मौसम साफ होते ही खत्म भी हो जाते हैं इस बीच मौसमी बुखार का जो भी मरीज डॉक्टर के पास जाता है, उसे तरह-तरह की दवाइयां बता दी जाती हैं। कई तरह के टेस्ट भी लिख दिए जाते हैं।

इस दौरान लम्बा-चौड़ा कारोबार तो चलता ही है, दवाइयों से शरीर में होने वाली खराबियां भी होती हैं। मरीज और डॉक्टर दोनों ही इस तरफसे बेखबर हैं। हमें इस तरह के मामलों में कोई न कोई मर्यादा कायम करनी ही चाहिए। चिकित्सकों के संगठन यह दायित्व उठाएं तो बहुत ही अच्छा हो। विज्ञान के नाम पर धन की लूट हो रही है, अंधविश्वास फैल रहा है और न जाने क्या क्या हो रहा है परंतु मजाक भी कम नहीं हो रहा। पिछले कुछ वर्षों से अन्तरराष्ट्रीय पैमाने पर जोर-जोर से यह प्रचार किया जा रहा है कि मां का दूध गुणकारी होता है।

इसको लेकर बड़े-बड़े पोस्टर यूनेस्को की तरफ से बांटे जा रहे हैं। इससे पहले मां के दूध के बजाय बच्चों को पाउडर का दूध पिलाया जाता था। दूध का पाउडर बनाने वाली एक कम्पनी ने करोड़ों-अरबों का कारोबार कर डाला। पाउडर के दूध को बेबी फूड कहा जाता है। इसकी प्रतिक्रिया यहां तक हुई कि अफ्रीकी देशों से कम्पनी के विक्रेताओं को मार-मारकर निकाल बाहर किया। मां का दूध गुणकारी है, यह वैज्ञानिकों को तब पता चला और वे इसका प्रचार करने लगे। जो दूध बच्चे के साथ ही मां के शरीर में बनता है, उसे जानने के लिए किसी प्रयोगशाला में जाने की जरूरत क्यों हुई?

मौसमी बुखार का सीधा संबंध मौसम से है बीमारी और इसके बाद टेस्ट व दवाइयां। इन सबमें लंबा-चौड़ा कारोबार होता है। मरीज व डॉक्टर दोनों ही इस तरफ से बेखबर होते हैं। श्रद्धेय कुलिश जी ने विज्ञान के नाम पर चल रहे धंधों से जुड़े इस आलेख में सवाल उठाया कि जब कुछ बीमारियों को लाइलाज माना जाता है तो फिर चिकित्सक उन बीमारियों के लिए दवा क्यों लिखते हैं? दवाइयों के कारण शरीर को होने वाली खराबियों का जिक्र करते हुए कुलिश जी ने जो लिखा वह आज ज्यादा प्रासंगिक है।

सन्त के बाद शीत प्रधान साम उत्तरोत्तर क्षीण होने लगता है और अग्नि व की मात्रा बढ़ने लगती है। प्रायः इन्हीं दिनों शीतला माता का प्रकोप होता है। इन्हीं दिनों शीतलाष्टमी पर माता पूजने का पर्व भी मनाया जाता है। इस अवसर पर खाना-पीना भी ठंडा होता है। आज इस रोग की रोकथाम के अन्य उपाय भी उपलब्ध हैं। परन्तु इसका उपाय मुख्यतः शीतल पदार्थ सेवन ही माना गया है। अग्नि रहित मलिन कीटाणुओं के संक्रमण से ही रासभ तत्व का उद्भव होता है। पशुओं में यह तत्व गदर्भ या रासभ में प्रभुत मात्रा होता है। मादा गदर्भ का दूध भी अतीव शीतल माना गया है। शीतला माता के रोगी के लिए इसका सेवन भी करते देखा गया है।

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